मोहन उप्रेती उत्तराखण्ड के अमर लोकगायक



    मोहन उप्रेती उत्तराखण्ड के अमर लोकगायक 






 मोहन उप्रेती उत्तराखण्ड के अमर लोकगायक 



भारत के उत्तराखंड राज्य में स्थित कुमाऊं क्षेत्र अपनी प्राकृतिक सुंदरता, सांस्कृतिक धरोहर, और अद्वितीय लोक संगीत के लिए विश्वविख्यात है। इस सांस्कृतिक संपदा को समृद्ध करने में जिन महापुरुषों का नाम सबसे प्रमुखता से लिया जाता है, उनमें से एक हैं मोहन उप्रेती। कुमाऊं के इस महान लोकगायक और नाट्यकर्मी ने न केवल लोक संगीत को सहेजा, बल्कि इसे नई पीढ़ियों तक पहुंचाने में अद्वितीय योगदान  दिया।

प्रारंभिक जीवन और संगीत से जुड़ाव




 मोहन उप्रेती उत्तराखण्ड के अमर लोकगायक 


मोहन उप्रेती का जन्म 1928 में अल्मोड़ा जिले के एक छोटे से गाँव में हुआ था। बचपन से ही उन्हें संगीत और कला में गहरी रुचि थी। कुमाऊं की पारंपरिक लोकधुनें, भन्कौरी, हुड़क्या, और झोड़ा-चांचरी जैसे लोकगीतों का उनके जीवन पर गहरा प्रभाव पड़ा। ग्रामीण जीवन से गहरे जुड़े होने के कारण, उप्रेती ने अपने प्रारंभिक वर्षों में ही कुमाऊं के लोकगीतों और लोकनाट्यों को आत्मसात कर लिया। उनकी संगीत प्रतिभा और लोक संगीत के प्रति समर्पण ने उन्हें जल्द ही एक अद्वितीय पहचान दिलाई।

कुमाऊंनी लोकसंगीत में भूमिका 




 मोहन उप्रेती उत्तराखण्ड के अमर लोकगायक 

मोहन उप्रेती ने कुमाऊंनी लोकसंगीत को न केवल संग्रहित किया, बल्कि उसे व्यापक मंच पर प्रस्तुत किया। उनके सबसे प्रसिद्ध गीतों में से एक है "बेड़ू पाको बारोमासा", जिसे कुमाऊं का सबसे लोकप्रिय लोकगीत माना जाता है। यह गीत कुमाऊं की धरती, उसके लोगों और उनके जीवन की सादगी को दर्शाता है। इस गीत के माध्यम से मोहन उप्रेती ने न केवल कुमाऊं के लोगों को अपनी संस्कृति के प्रति गर्व महसूस कराया, बल्कि इस क्षेत्र के संगीत को राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय मंचों तक भी पहुंचाया। 
उनकी संगीत साधना केवल लोकगीतों तक सीमित नहीं थी, बल्कि उन्होंने नाटकों के माध्यम से भी कुमाऊंनी संस्कृति को उजागर किया। उनके नाट्य प्रस्तुतियों में संगीत का विशेष महत्व था, और वे अपने नाटकों में लोकधुनों और लोकगीतों का अत्यधिक उपयोग करते थे। इस प्रकार, उन्होंने कुमाऊंनी लोकसंगीत को एक नई ऊंचाई तक पहुंचाया।

मोहन उप्रेती का नाट्यकला में योगदान





 मोहन उप्रेती उत्तराखण्ड के अमर लोकगायक 

मोहन उप्रेती केवल लोकगायक ही नहीं थे, बल्कि एक कुशल नाट्यकर्मी भी थे। उन्होंने अपने जीवन के एक महत्वपूर्ण हिस्से को नाट्यकला के प्रति समर्पित किया। उनके नाटकों में सामाजिक संदेश होते थे, जो लोगों को जागरूक करते थे और उन्हें सोचने पर मजबूर करते थे। उन्होंने अपने नाटकों के माध्यम से समाज में फैली बुराइयों, अंधविश्वासों और शोषण के खिलाफ आवाज उठाई। उनके नाटकों में संगीत और नाटक का अद्वितीय मिश्रण देखने को मिलता था, जो दर्शकों को गहराई से प्रभावित करता था।

उनके द्वारा लिखे और निर्देशित नाटक "इप्टा" में काफी लोकप्रिय हुए। इप्टा के माध्यम से उन्होंने भारतीय लोक कला को आधुनिक रंगमंच के साथ जोड़ने का प्रयास किया। उनका मानना था कि लोक कला केवल मनोरंजन का साधन नहीं है, बल्कि यह समाज को दिशा देने और लोगों को जागरूक करने का एक महत्वपूर्ण माध्यम भी है।

लोकसंगीत को शास्त्रीय संगीत से जोड़ने का प्रयास





 मोहन उप्रेती उत्तराखण्ड के अमर लोकगायक 


मोहन उप्रेती ने कुमाऊंनी लोकसंगीत को शास्त्रीय संगीत से जोड़ने का भी प्रयास किया। उन्होंने कई ऐसे प्रयोग किए जिसमें लोकधुनों को शास्त्रीय संगीत की बंदिशों के साथ प्रस्तुत किया गया। इसके परिणामस्वरूप, कुमाऊंनी लोकसंगीत को न केवल उत्तराखंड में, बल्कि देशभर में भी सराहा गया। उन्होंने संगीत के माध्यम से एक सेतु का निर्माण किया, जो पारंपरिक लोकसंगीत और आधुनिक संगीत प्रेमियों के बीच संवाद स्थापित करता है।

मोहन उप्रेती की राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय पहचान

मोहन उप्रेती की प्रतिभा ने न केवल कुमाऊं क्षेत्र में, बल्कि पूरे भारत में और अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर भी पहचान बनाई। उन्होंने भारत के कई बड़े मंचों पर कुमाऊंनी लोकसंगीत प्रस्तुत किया। उनका "बेड़ू पाको बारोमासा" गीत तो इतना लोकप्रिय हुआ कि इसे भारत के राष्ट्रपति और अन्य विशिष्ट हस्तियों के सामने भी प्रस्तुत किया गया। इसके अलावा, उन्होंने विदेशों में भी कई प्रस्तुतियां दीं, जिससे भारतीय लोकसंगीत को वैश्विक पहचान मिली।

उनके योगदान के लिए उन्हें कई सम्मानित पुरस्कारों से नवाजा गया। उन्होंने अपनी संगीत साधना के साथ-साथ समाज के प्रति भी अपनी जिम्मेदारियों को निभाया। उनके कार्यों को देखते हुए उन्हें उत्तराखंड राज्य के सांस्कृतिक धरोहर के संरक्षक के रूप में भी देखा जाता है

मोहन उप्रेती का  अमर योगदान और विरासत

1987 में मोहन उप्रेती का निधन हो गया, लेकिन उनका योगदान आज भी जीवित है। उनके द्वारा प्रस्तुत किए गए गीत और नाट्य प्रस्तुतियां आज भी लोगों के दिलों में बसी हुई हैं। उनकी विरासत को उनकी संस्था, “मोहन उप्रेती लोक सांस्कृतिक संस्थान” के माध्यम से आगे बढ़ाया जा रहा है। यह संस्था कुमाऊंनी लोकसंगीत और नाट्यकला को सहेजने और बढ़ावा देने का काम कर रही है।

आज के युवा कलाकार भी मोहन उप्रेती के योगदान से प्रेरणा लेकर कुमाऊंनी लोकसंगीत और नाट्यकला में नए प्रयोग कर रहे हैं। उनकी संगीत साधना और नाट्यकला के प्रति समर्पण ने उन्हें सदियों तक जीवित रखने वाला नाम बना दिया है।

निष्कर्ष

मोहन उप्रेती न केवल एक महान लोकगायक थे, बल्कि एक अद्वितीय नाट्यकर्मी और सांस्कृतिक धरोहर के संरक्षक भी थे। उन्होंने अपने जीवन का अधिकांश समय कुमाऊं की लोक संस्कृति को संरक्षित करने और उसे नई पीढ़ी तक पहुंचाने में बिताया। उनके योगदान ने कुमाऊंनी लोकसंगीत को एक नई पहचान दिलाई और इसे राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर प्रसिद्धि दिलाई।  उनकी कला और संगीत की धरोहर आने वाली पीढ़ियों के लिए प्रेरणास्रोत बनी रहेगी। मोहन उप्रेती के जीवन और उनके योगदान को याद करते हुए, यह कहा जा सकता है कि वे कुमाऊं की संस्कृति के सबसे बड़े संवाहक थे। उनकी लोकसंगीत और नाट्यकला के प्रति समर्पण ने उन्हें हमेशा के लिए अमर कर दिया है।

                                                                                 धन्यवाद 

                                                                   A.K.Gudiyal.Uttarakhandi


Uttarakhand Gyan

i am a blog writer uttarakhand folk lifestyle, folk culture, tradition, dress, ornaments, folk modesty, customs, folk songs, folk dances, rituals, lifestyle, farming, animal husbandry, mutual brotherhood, sense of cooperation and dedication towards each other,

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