
प्रहलाद मेहरा उत्तराखण्ड के कुमाउनी लोकगीतों के सुप्रसिद्ध गायक
भारत
के उत्तराखण्ड राज्य का कुमाउनी लोकसंगीत अपनी मिठास, सादगी और जीवन की गहराईयों के कारण
संपूर्ण विश्व में जाना जाता है। इस क्षेत्र की लोकधुनों में पहाड़ों की खुशबू, संस्कृति की छाप और जनजीवन का
प्रतिबिंब साफ दिखाई देता है। कुमाउनी लोकगीतों को जीवंत रखने वाले कुछ प्रमुख
नामों में से एक हैं प्रहलाद मेहरा। वे कुमाऊं के उन महान कलाकारों में से हैं
जिन्होंने अपने सुमधुर गीतों और संगीत के माध्यम से इस क्षेत्र की सांस्कृतिक
धरोहर को न केवल जीवंत रखा,
बल्कि उसे नई ऊंचाइयों तक पहुंचाया।
आज के इस ब्लॉग में हम प्रहलाद मेहरा के जीवन, संगीत शिक्षा, और उनके कुमाउनी लोक संगीत में दिए गए
अभूतपूर्व योगदान पर विस्तार से चर्चा करेंगे।
जन्म और प्रारंभिक जीवन
प्रहलाद
मेहरा का जन्म उत्तराखण्ड के कुमाऊं मंडल के अल्मोड़ा जिले में एक छोटे से गांव
में हुआ था। उनका जन्म 20वीं शताब्दी के मध्य में हुआ, जब उत्तराखण्ड के गांवों में पारंपरिक
कुमाउनी संगीत का बोलबाला था। उनके गांव का वातावरण प्राकृतिक सुंदरता और
सांस्कृतिक विविधता से भरपूर था, जिसने
उनके मन में संगीत के प्रति गहरी रुचि जागृत की।
प्रहलाद
मेहरा के पिता का नाम स्व. गोविंद मेहरा और माता का नाम स्व. बृजेश्वरी देवी था।
उनका परिवार साधारण कृषक परिवार था, जहां
संगीत और सांस्कृतिक परंपराओं का खास स्थान था। बचपन से ही उन्होंने अपने
माता-पिता से कुमाउनी लोकगीतों को सुना और गाना सीखा। उनकी पारिवारिक पृष्ठभूमि ने
उन्हें संगीत के प्रति गहरे रूप से प्रेरित किया।
प्रारंभिक
शिक्षा और संगीत की ओर रुझान
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| प्रहलाद मेहरा उत्तराखण्ड के कुमाउनी लोकगीतों के सुप्रसिद्ध गायक |
प्रहलाद
मेहरा ने अपनी प्रारंभिक शिक्षा गांव के ही विद्यालय से प्राप्त की, लेकिन उनका झुकाव हमेशा से ही संगीत की
ओर रहा। बचपन से ही वे अपने गांव में होने वाले धार्मिक और सांस्कृतिक आयोजनों में
हिस्सा लेते थे। उनके गांव में पारंपरिक वाद्ययंत्रों की ध्वनियों और लोकगीतों की
मधुरता ने उन्हें गहरे रूप से प्रभावित किया।
प्रहलाद
मेहरा को संगीत की औपचारिक शिक्षा नहीं मिली थी, लेकिन उनकी प्रतिभा और कड़ी मेहनत ने उन्हें इस क्षेत्र में महारत
हासिल करने में मदद की। उन्होंने अपने गुरुजनों से शास्त्रीय संगीत की कुछ
प्रारंभिक शिक्षा ली, लेकिन उनका असली प्रेम कुमाउनी
लोकगीतों के प्रति था। उन्होंने अपने जीवन के शुरुआती दिनों में ही समझ लिया था कि
लोकसंगीत में अपार संभावनाएं हैं, और
उन्होंने इस क्षेत्र में अपनी यात्रा को समर्पित कर दिया।
संगीत
यात्रा की शुरुआत
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| प्रहलाद मेहरा उत्तराखण्ड के कुमाउनी लोकगीतों के सुप्रसिद्ध गायक |
प्रहलाद
मेहरा की संगीत यात्रा बेहद साधारण तरीके से शुरू हुई। उन्होंने गांवों के
छोटे-छोटे कार्यक्रमों, मेलों और सांस्कृतिक उत्सवों में गाना
शुरू किया। धीरे-धीरे उनके गायन की मधुरता और उनके गीतों की गहराई ने लोगों को
प्रभावित करना शुरू कर दिया। उनके गीतों में पहाड़ों की संस्कृति, परंपराओं और जीवन की सादगी का चित्रण
होता था, जो सीधे लोगों के दिलों को छू जाता था।
प्रहलाद
मेहरा का पहला बड़ा गीत "बेड़ू पाको बारामासा" (जो कुमाऊंनी लोकसंगीत का
एक अमर गीत है) ने उन्हें पहचान दिलाई। इस गीत में कुमाऊं के पहाड़ों, वृक्षों और मौसम का वर्णन बहुत ही
सुंदर तरीके से किया गया है। यह गीत आज भी उत्तराखण्ड के घरों, मेलों और सांस्कृतिक आयोजनों में गाया
जाता है। इसके बाद,
"मेरा लाला ब्याह
मा मांगल", "तू होली तेरी बाजुली" और
"मेरा घाघरा" जैसे गीतों ने भी उन्हें व्यापक पहचान दिलाई।
पारिवारिक
जीवन
प्रहलाद
मेहरा का पारिवारिक जीवन साधारण था। उनका विवाह एक साधारण कुमाऊंनी परिवार की
महिला से हुआ और उनके बच्चे भी उनके संगीत से प्रेरित थे। परिवार में संगीत की
परंपरा और लोकसंगीत के प्रति समर्पण हमेशा बना रहा। उनके बच्चों ने भी संगीत की
धरोहर को आगे बढ़ाने का प्रयास किया। मेहरा जी अपने परिवार के प्रति बेहद समर्पित
थे और अपने जीवन में संघर्षों के बावजूद संगीत और परिवार के बीच संतुलन बनाए रखा।
कुमाउनी
लोकसंगीत में योगदान
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| प्रहलाद मेहरा उत्तराखण्ड के कुमाउनी लोकगीतों के सुप्रसिद्ध गायक |
प्रहलाद
मेहरा का कुमाउनी लोकसंगीत में योगदान अतुलनीय है। उन्होंने कुमाऊंनी गीतों को न
केवल जीवित रखा, बल्कि उसे एक नई दिशा दी। उनके गीतों
में उत्तराखण्ड के आम जीवन,
प्रेम, विछोह, संघर्ष, और सांस्कृतिक धरोहर की झलक मिलती है। उन्होंने अपने गीतों में उस
समय की समाजिक और सांस्कृतिक परिस्थिति को दर्शाया और उसे संगीत के माध्यम से
लोगों के दिलों तक पहुंचाया।
उनकी
आवाज़ में इतनी मधुरता और भावुकता थी कि उनके गीत सुनने वाले श्रोताओं के दिलों
में गहरी छाप छोड़ जाते थे। उनके गीतों में पारंपरिक कुमाउनी धुनों का बहुत ही
सुंदर उपयोग किया गया था,
जो श्रोताओं को उत्तराखण्ड के पहाड़ों
की यात्रा पर ले जाता था। उनके संगीत का प्रभाव केवल उत्तराखण्ड तक सीमित नहीं था, बल्कि उनके गीतों को पूरे भारत में
पसंद किया गया।
संगीत
का स्वरूप और शैली
प्रहलाद
मेहरा के गीतों की सबसे खास बात यह थी कि वे सादगी और गहराई से भरपूर होते थे।
उनके गीतों के बोल सीधे दिल को छू जाते थे, और
उनकी आवाज़ में पहाड़ों की सादगी और लोगों के जीवन की कठिनाइयों का प्रतिबिंब साफ
नजर आता था। उनकी गायकी की शैली पारंपरिक कुमाउनी संगीत पर आधारित थी, जिसमें शास्त्रीय संगीत के रागों का
प्रभाव भी साफ दिखाई देता था।
उनके
गीतों में ढोल, दमाऊं, हारमोनियम, और बांसुरी जैसे पारंपरिक वाद्ययंत्रों
का उपयोग किया जाता था, जो कुमाउनी संगीत की पहचान हैं। इन
वाद्ययंत्रों के साथ उनकी मधुर आवाज़ का मेल उनके गीतों को और भी खास बना देता था।
उनके गीतों की धुनें सरल लेकिन प्रभावशाली थीं, जो
श्रोताओं को तुरंत अपनी ओर आकर्षित कर लेती थीं।
प्रहलाद मेहरा के प्रसिद्ध
गीत
प्रहलाद
मेहरा के कई प्रसिद्ध गीत हैं, जो
आज भी उत्तराखण्ड के लोगों के दिलों में बसे हुए हैं। उनके कुछ प्रमुख और लोकप्रिय
गीत इस प्रकार हैं:
1-"बेड़ू
पाको बारामासा" यह गीत उत्तराखण्ड का एक प्रतीकात्मक गीत बन गया है, जो कुमाऊं की संस्कृति और जीवनशैली को
दर्शाता है।
2-"मेरा
लाला ब्याह मा मांगल" यह एक पारंपरिक विवाह गीत है, जो उत्तराखण्ड के विवाह समारोहों में
गाया जाता है।
3-"तू
होली तेरी बाजुली" यह एक प्रेम गीत है, जिसमें
उत्तराखण्ड के युवाओं की प्रेम कहानियों का चित्रण किया गया है।
4-"मेरा
घाघरा" यह गीत कुमाऊंनी महिलाओं की पारंपरिक वेशभूषा और उनके सांस्कृतिक
महत्व को दर्शाता है।
संघर्ष
और जीवन की कठिनाइयाँ
प्रहलाद
मेहरा का जीवन भी अन्य लोक कलाकारों की तरह संघर्षों से भरा हुआ था। संगीत के
क्षेत्र में पहचान बनाना और अपने परिवार का भरण-पोषण करना उनके लिए कभी-कभी कठिन
हो जाता था। आर्थिक तंगी और संसाधनों की कमी के बावजूद उन्होंने अपने संगीत के
प्रति समर्पण और जुनून को बनाए रखा।
उनका
यह संघर्ष और समर्पण ही था जिसने उन्हें उत्तराखण्ड के लोकसंगीत में एक प्रमुख
स्थान दिलाया। वे जीवन भर अपने संगीत के माध्यम से लोगों के दिलों में बसे रहे और
अपने गीतों के माध्यम से समाज में अपनी पहचान बनाए रखी।
सम्मान
और पहचान
प्रहलाद
मेहरा के योगदान को उत्तराखण्ड के लोकसंगीत में सदैव याद किया जाएगा। उन्हें उनके
संगीत योगदान के लिए कई सम्मानों से नवाजा गया। उत्तराखण्ड सरकार और अन्य
सांस्कृतिक संगठनों ने उनके अभूतपूर्व योगदान के लिए उन्हें मरणोपरांत कई
पुरस्कारों से सम्मानित किया।
आज
भी उनके गीत उत्तराखण्ड के मेलों, उत्सवों
और सांस्कृतिक आयोजनों में गाए जाते हैं। उनके गीत न केवल कुमाऊं की संस्कृति को
जीवित रखते हैं, बल्कि नई पीढ़ी को भी अपनी सांस्कृतिक
जड़ों से जोड़ते हैं।
निष्कर्ष
प्रहलाद
मेहरा कुमाउनी लोकसंगीत के अनमोल धरोहर हैं। उनका जीवन और उनका संगीत उत्तराखण्ड
की संस्कृति, सभ्यता और लोककला का प्रतीक है।
उन्होंने अपने गीतों के माध्यम से कुमाऊंनी संस्कृति को न केवल संजोया, बल्कि उसे एक नई दिशा दी। उनकी आवाज़
में जो मधुरता और भावुकता थी, वह
श्रोताओं को सीधे दिल से जोड़ती है।
प्रहलाद
मेहरा का कुमाउनी लोकसंगीत में योगदान सदैव अमर रहेगा और उनके गीत हमें हमेशा अपनी
सांस्कृतिक धरोहर की याद दिलाते रहेंगे।
धन्यवाद
A.K.Gudiyal.Uttarakhandi


