उत्तराखंड का लोकजीवन पहले कैसा रहा होगा ?
![]() |
| उत्तराखंड का लोकजीवन पहले कैसा रहा होगा ? |
कई सदियों पूर्व उत्तराखंड के लगभग 50 से 55 हजार किमी के विस्तृत क्षेत्र में नगरों के नाम केवल तीन कस्बे हुआ करते थे हरिद्वार,श्रीनगर और अल्मोड़ा बाकी सभी छोटे बड़े गांव हुआ करते थे। उत्तराखंड के दक्षिण पश्चिमी भाग में स्थित कुलिंद राज के राज्य के प्रसंग में यहां पर कर केवल चार प्रकार के लोकजीवन का जिक्र मिलता है इनमे ग्रामीण लोकजीवन,नगरीय लोकजीवन तीर्थीय लोकजीवन और आश्रमीय लोकजीवन का जिक्र मिलता है। अगर आवासीय नजरिये से देखें तो इसमे लोगों के दो प्रकार के वर्ग थे । जो कि स्थाई निवासी और पशुपालक लोग थे, इनमे कुछ लोग केवल अपने ही निवास पर पशुपालन करते थे इसके अलावा एक ऐसा पशुपालक वर्ग था जोकि अपने पशुओं को ऋतु परिवर्तनके साथ एक स्थान से दूसरे स्थानों तक चराने के ले जाते थे और जहाँ रात हो जाती थी वहीं बसेरा कर लेते थे ।
![]() |
| उत्तराखंड का लोकजीवन पहले कैसा रहा होगा ? |
उत्तराखंड लोकजीवन के व्यवसाय
स्थायी निवास करने वाले लोग अपने आवासीय क्षेत्रों में कृषि एवम पशुपालन किया करते थे। और कुछ लोग हिमालयी औषधियों,रत्नों एवम सुवर्ण आदि व्यापार के नजरिये से निचले प्रदेशों में परब्रजन भी किया करते थे । इससे पिछले समयों में यहां के लोकजीवन का वास्तविक रूप क्या रहा होगा इस सन्दर्भ में अभी तक कोई भी लिखित सामग्री उपलब्ध नहीं हो सकी परन्तु अपने पूर्वजों से सुनने को मिली कुछ बातों से यह निष्कर्ष निकलता है कि उत्तराखंड में पिछले कई समयों में इन दूर दराज के पर्वतीय क्षेत्रों मे रहने वाले लोगों की जीवनशैली एवम जीवन पद्धति की गति कितनी मन्द और स्थिर रही होगी कि इनमे परिवर्तन के लिये या तो समय का अभाव था,या इनके पास कोई प्रेरणा ही नहीं रही होगी। क्योंकि यहां के लोगों के जीवन एवम समस्त क्रिया कलापों का मूल आधार कृषि और पशुपालन था। और कृषि एवम पशुपालन इन्हीं दो स्रोतों से ही संचालित हो जाया करती होगी। पूर्वजों के कथनानुसार इनके जीवन की सारी आवश्यकताएं इन्ही दो मूलाधारों पर चल जाया करती थी ।क्योकि यहां के भोटिया व्यवसायी लोग लत्ता कपड़ा,भांडे बर्तन गुड़ तेल सभी कुछ स्थानीय स्रोतों से उपलब्ध हो जाता था लत्ते कपड़े के लिए लोग भेड़ बकरियों से प्राप्त ऊन को खेतों में उगाई कपास की रुई को या भांग के रेशों को कातकर बनवा लिया करते थे खेतों में उगे गन्ने को कोल्हू में अटेर कर लोहे के कटाहों में उबालकर गुड़ शक्कर बना लिया करते थे और अधिकतर मीठे का काम तो शहद से भी चल जाता था केवल नमक के लिए ही अन्य लोगों पर निर्भर होना पड़ता था।
उत्तराखंड लोकजीवन की सुख सुविधाएं
परन्तु प्रारम्भिक दशकों में यहां के दूर दराज के ग्रामीण क्षेत्रों के निवासियों को जीवन की वो सुख सुविधाएं नहीं मिलती थी जोकि मैदानी भूमि केनिवासी तथा यातायात की सुविधाओं वाले गंगा यमुना के नजदीक क्षेत्रों में रहने वालों को मिलती थी। परन्तु परिवार बढ़ते गए ऑरिनक जीवन संघर्षमय होता गया ,धीरे धीरे लोग निर्धन होने लगे तब परिवार में सबके लिए अन्न वस्त्र की व्यवस्था कठिन हो गयी ।ऐसी स्थिति मे केवल बच्चों को छोड़कर सभी बड़े लोग सुबह पौ फटने से से लेकर शाम देर तक अपनी दिनचर्या यानी खेतीबॉडी ,पशुपालन के कामों में व्यस्त हो जाते थे । पहाड़ी पथरीली भूमि में कृषि उत्पादों की कमी के कारण अधिकतर लोग दूध दही,वन्य उत्पाद फलों शाकों,एवम कन्दमूलों से ही अपने पेट भरा करते थे। परतु यहां निर्धनता के बीच पलने वाला गरीब से गरीब कभी कोई भूखा नहीं सोया यहां के खेतों एवम वनों में कई खाद्य पदार्थ मिल जाया करते थे कि अन्न के अभाव में भी सभी अपने पेट की भूख मिटा लिए करते थे और वन्य खाद्य पदार्थ एवम अपनी खेती बाड़ी में उगे फल सब्जियों,दाल आदि खाने के कारण ये लोग निरोग एवम स्वस्थ रहा करते थे।
![]() |
| उत्तराखंड का लोकजीवन पहले कैसा रहा होगा ? |
उत्तराखंड लोकजीवन का जीवनचक्र एवम दिनचर्या
उत्तराखंड लोकजीवन का जीवन चक्र घर-गृहस्थी, कृषि एवं पशुपालन तक ही परिसीमित था। उनके लिए आजकल के समान सरकारी/गैर सरकारी नौकरी तथा व्यवसाय के लिए बहुत कम अवकाश था। लोग पढ़े लिखे तो होते ही नहीं थे। यह विशेषाधिकार तो केवल कुछ विशिष्ट वर्गीय लोगों को था। वैसे तो सभी प्रकार के दैनिक कार्यों में स्त्री-पुरुष सभी का सहयोग रहता था, किन्तु इनमें से कुछ कार्य ऐसे भी होते थे जो कि स्त्री-पुरुषों के वर्ग विशेष के द्वारा ही सम्पादित किये जाते थे। पुरुष वैसे तो कृषि कार्यों जैसे सिंचाई, नराई, कटाई, मड़ाई, भण्डारण आदि में तथा पशुचारण कार्यों जैसे पशुओं को बांधने की रस्सियां (ज्योड़े) बटना आदि में स्त्रियों का बराबर हाथ बंटाते थे, किन्तु कुछ कार्य ऐसे थे जो कि उन्हें ही करने पड़ते थे, जैसे हल चलाने से सम्बद्ध कार्य जुताई, बुआई,सिंचाई के लिए जल प्रणालियों का निर्माण, आरे, कुल्हाड़े से सम्बद्ध कार्य, जैसे इमारती लकड़ी तैयार करना, पेड़ों को काट कर बलियों तथा पेड़ों को फाड़कर के लिए लकड़ी तैयार करना, घरों के आच्छादन के लिए पटालों पत्थरों की व्यवस्था करना, दूर-दराज के स्थानों पर स्थित घराटों से आटा पिसवा कर लाना, आदि । पहाड़ी लोकजीवन में, पहले से लेकर अब तक विशेष कर कृषक वर्ग में, पुरुष की अपेक्षा स्त्री पर अधिक कार्यभार रहता आया है। गृहस्थी के अतिरिक्त कृषि, पशुपालन आदि आजीविका के साधनों का अधिकतम दायित्व वही निभाती रही हैं। इन सभी कार्यों में वह पुरुष की पूर्ण रूप से सहयोग करती है । अर्थात् पुरुष के साथ कन्धे से कन्धा मिलाकर खेतों में काम करने से लेकर पहाड़ की चोटी पर चढ़कर या जंगल से घास लकड़ी काटने तथा उन्हें सिर या पीठ पर लाद कर लाने में पुरुष से बिल्कुल भी पीछे नहीं रही है।
THANK YOU
A.K Gudiyal Uttarakhandi

.jpeg)
