उत्तराखंड लोकजीवन में कितना सादगी भरा था इनका जीवन
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| उत्तराखंड लोकजीवन में कितना सादगी भरा था इनका जीवन |
पिछले ब्लॉग में आपने उत्तराखंड के शुरुआती लोकजीवन के बारे में पड़ा , समय चक्र चलता गया और समय के साथ उत्तराखंड का स्वरूप धीरे धीरे बदलता गया ,और यहां के लोगों की जीवन शैली मे भी परिवर्तन आता गया लेकिन यहां के लोगों का मुख्य व्यवसाय कृषि और पशुपालन ही रहा। जरूरत की सारी वस्तुएं ये लोग अपनी खेती में ही उगा लेते थे। समय बीतता गया और आवश्यकताएं भी बढ़ती गयी लेकिन इनकी जीवनशैली में जरा सा भी बदलाव नहीं आया।
तनाव एवं रोग मुक्त जीवन
इस समय के लोगों का जीवन यद्यपि संघर्षपूर्ण एवम अभाव ग्रस्त रहा किन्तु सामान्यतः तनाव एवम कुण्ठा से सर्वथा मुक्त था जीने के लिए आवश्यक भोजन वस्त्र की जो भी और जिस रूप में व्यवस्था होती थी ये लोग उसी में सन्तुष्ट थे ,न अधिक सुख भोग की आशाएं न ही ज्यादा सुख भोग के लिए भागदौड़ न ही एक दूसरे की बराबरी करने की इच्छा । सभी लोग प्रकृति द्वारा दी गयी सुविधाओं से ही सन्तुष्ट थे । और शायद इसीलिये इन लोगों में कोई बीमारी भी नहीं होती थी सामान्य रुप से होने वाली शारीरिक बीमारियां अवश्य होती थी परंतु इलाज के लिए डॉक्टर अस्पतालों के चक्कर नहीं लगाने पड़ते थे क्योंकि उन लोगों को आज के इस समय की हृदयरोग ,रक्तचाप,मधुमेय जैसे बीमारियां नहीं थी। छोटे मोटे रोगों में गांवों के बड़े बुजुर्ग अनुभवी लोग तन्त्र मन्त्र,झाड़े ताड़े और जड़ी बूटियों से ही इनका इलाज कर दिया करते थे।
धन दौलत और भौतिक सुख सुविधाओं से परे जीवनशैली
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| उत्तराखंड लोकजीवन में कितना सादगी भरा था इनका जीवन |
अपनी खेती बाड़ी से उगे अनाजों और पशुधन से घी दूध शहद को बिक्री करके जरूरत की सारी वस्तुएं उपलब्ध हो जाती थी बाकी एक दूसरे के सहयोग से पूरी हो जाती थी कुछ अभाव का अहसास नहीं होता था धन दौलत,भौतिक सुख सुविधाओं की दौड़ से दूर इनका जीवन अभावों में भी सादगी भरा था। सभी लोगों में द्वेष जलन की भावना,नहीं थी सभी लोग हर सुख दुख में एक दूसरे के सहयोग से ही पूर्ण हो जाता था । घर गृहस्थी के ऊपरी खर्चे जैसे नमक,तेल कपड़ा,गुड़ और व्याह आदि का व्यय घर मे पाले गए पशुओं से प्राप्त दूध घी शहद,एवम कृषि उत्पादों की बिक्री से या मेहनत मजदूरी से पूरा किया जाता था। और जो मुख्य चीज़ यहां उप्लब्ध नहीँ होती थी उन वस्तुओं की खरीददारी के लोग समूहों में शहरों की तरफ जाते थे लोगों का समूह में जरूरत का सामान लेने मैदानी शहरों की ओर जाने को ढाँकर कहा जाता था । समुह मे गांवों से शहर तक के इस सफ़र में लोगों को काफी दिन लगते थे। एक दो रात तो ये लोग किसी भी सुरक्षित जगह देखकर समूह में एक दूसरे के सहारे से बिता दिया करते थे। और शहरी बणिये की दुकानों से नमक,गुड़,भेली ,सीरा,गट्टे,चन्ने आदि भरकर कई मीलों पैदल रास्तों से होकर घर पहुंचते थे ,जिन्हें देखकर घरों के बच्चे खुश जाते थे कि शहरी दुकानों से खाने की चीजें खाने को मिलेगी।वक्त बीतता गया लोगों के परिवारों का विस्तार बढ़ता गया साथ-साथ ज्यादा लोगों की जरूरतें भी बढ़ती गयी तो घर के बड़े सभी लोगों ने मिलकर ढलान वाली जमीन को समतल बनाकर खेतों का विस्तार बढ़ाया,और इन लोगों ने कृषि एवं भवन निर्माण के लिए जमीन,दूध दही खाद के लिए गाय, भैस , बकरियां,एवम हल जोतने लिए एक जोड़ी बैल भी रखना शुरू कर दिया था।जिससे कि खेती बाड़ी से पर्याप्त मात्रा में अनाज और पशुधन से घी दूध बेचकर ये लोग अपनी हर जरूरत को पूरा कर लिए करते थे ।
अभावग्रस्त और संघर्षमय जीवन में भी तीज त्योहारों का मनाना
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जैसा कि पहले भी इसका जिक्र हो चुका है कि उत्तराखंड लोकजीवन में यहां के निवासियों का जीवन संघर्षमय एवम अभावग्रस्त रहा था पर इसके बाबजूद भी उनमें हताशा,व निराशा की स्थिति नहीं थी। प्रकृति के साथ एकात्मता एवम प्रकृति द्वारा दिये गए संसाधनी का भरपूर उपयोग करके उसी से संतुष्ट रहना और अभावों एवम संघर्षों के बीच बीच बीच मे किसी न किसी तीज त्योहार या पर्व उत्सव का मनाना और अभावग्रस्त जीवन मे जीवन के प्रति नया उत्साह एवम जीवन जीने का एक नया संचार कर डालते थे और कुछ समय के लियेही सही लेकिन अपनी सारी परेशानियों से मुक्त होकर नए उत्साह एवम जीवन संघर्ष के साथ अगले पर्व,तीज त्योहार की प्रतीक्षा में मग्न हो जाते थे । और इसी प्रकार अनवरत रूप से चलता रहता था ,और द्वेष,जलन,ईर्ष्या,एक दूसरे के प्रति वैर भाव से मुक्त आपसी प्रेम व्यवहार से हर्षोल्लास के साथ सादगी भरा जीवन ।
THANK YOU
A.K Gudiyal Uttarakhandi


