आखिर कौन थे गुरु गोरखनाथ जी ?
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| आखिर कौन थे गुरु गोरखनाथ जी ? |
गुरु गोरखनाथ एक मान्यता प्राप्त सिद्ध व्यक्ति हैं। इनका समय पन्द्रहवीं शताब्दि के आसपास माना जाता है। ये नाथपंथ के प्रवर्तक मत्स्येन्द्रनाथ के शिष्य थे और मूलतः हीनयानी बौद्ध सम्प्रदाय के अनुयायी थे, किन्तु बाद में अपने गुरु के सम्पर्क में आने के बाद इनकी भगवान् शिव तथा उनकी शिवशक्तियों में आस्था हो जाने से ये नाथपंथी हो गये और उनके कनफटे जोगियों के सम्प्रदाय के अनुयायी हो गये । कनफटे सम्प्रदाय के जोगियों के गुरु होने के नाते वे इन्हें स्वयं शिव का अवतार मानते हैं।
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| आखिर कौन थे गुरु गोरखनाथ जी ? |
उत्तराखण्ड के लोगों के द्वारा पूजे जाने वाले देवी-देवताओं में गुरु गोरखनाथ का स्थान सर्वोपरि आता है। यहां के अन्य सभी प्रमुख देवता- गोरिया, हरु, सैम, गंगनाथ, भोलेनाथ आदि गुरु गोरखनाथ के अनुयायी रहे हैं तथा इस सम्पूर्ण क्षेत्र पर गुरु गोरखनाथ तथा उनके द्वारा प्रचारित नाथपन्थ का जो बहुमुखी प्रभाव पाया जाता है वह किसी अन्य देवता का नहीं। यहां पर लोक देवताओं की आयोजित देवगाथाओं जागर गाथाओं में सर्वप्रथम गोरखनाथ का स्मरण किया जाता है। इनके बारे में इनके अनुयायियों द्वारा लिखित गुरुपादुका, घटस्थापन, गुरुगुसाई, रखवाली या रक्षावली आदि हाथ से लिखी हुई प्रतियों में अथवा मौखिक परम्परा में सुरक्षित, ढोलसागर एवं जागरगाथा आदि में भी पाया जाता है।
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| आखिर कौन थे गुरु गोरखनाथ जी ? |
उत्तराखण्ड में प्रचलित तांत्रिक मंत्रों के विश्लेषण तथा नाथपंथ के सम्बन्ध में प्राप्त लिखित सामग्री के आधार पर गुरु गोरखनाथ से सम्बद्ध अनेक तथ्यों का उल्लेख किया है। जैसे कि, रखवाली संबंधी मंत्रों के अनुसार उन्होंने अपनी घोर तपस्या धौली उड्यार नामक स्थान पर की थी उनके अनुसार यह स्थान दक्षिण गढ़वाल में एक अत्यन्त निर्जन एवं बीहड़ क्षेत्र में है। स्कन्द पुराण में भी मन्दाकिनी के तट पर गौरीतीर्थ के निकट गोरख आश्रम के बारे में बताया गया है,यहीं पर वीर राजा हरपाल को उसकी माता ने बाल्यावस्था में बड़ी कठिनाई का सामना करते हुए पाला था,।
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| आखिर कौन थे गुरु गोरखनाथ जी ? |
उत्तराखंड में गुरु गोरखनाथ से सम्बद्ध अनेक पूजास्थल हैं, यथा पिथौरागढ़ में चण्डाक के समीप 'भुरमुणी' गांव में प्रचलित 'जोशीराठ' की देवगाथा के अनुसार उदयपुर के बम राजा विजयब्रह्म के शासनकाल में एक गाँव में गुरु गोरखनाथ का आश्रम था। इसी प्रकार चम्पावत के तामली गांव में गुरु गोरखनाथ की धूनी आज भी प्रज्वलित है। ऐसे ही गढ़वाल में श्रीनगर के पास भक्त्याणा नामक गांव में गोरखनाथ की मूर्ति स्वरूप 'गोरखनाथ गुफा' के नाम से एक प्राकृतिक गुफा भी मौजूद है।
'इसी प्रकार 'घटथापना' या घड़थापना नामक ग्रन्थ में गोरखनाथ का जन्म गोमय पिंड से बताया गया है . श्री गोरखनाथ वीर भैराऊ बाबा जिनसे गोरखपंजा गोरखध्यान गोबर की पिंडी औतार लिया। किन्तु ओलावृष्टि की रोकथाम के लिए जो मंत्र बोला जाता है उसमें इनका जन्म शिवजी की जटाओं से बताया गया है गुरु गोरखनाथ के जीवन परिचय तथा नाथपंथी परम्पराओं से सम्बधित लेखों गोरखकुंडली तथा घटथापना, में बताया गया है कि ये बड़े यती, सिद्ध एवं आजन्म ब्रह्मचारी थे।
इनके सम्बन्ध में जोशीमठ से प्राप्त नाथपंथी कृतियों गुरुपादुका आदि में बताया गया है कि इन्होंने एक साथ ही चौरासी लाख योनियों का फेरा करके अपना दाना-पानी पूरा कर लिया था,और ये जीवन मुक्त हो गये थे और चौरासी सिद्धों में सर्वश्रेष्ठ माने जाते थे। इसमें कहीं तो इन्हें अन्य सिद्धों की भांति बीर-भैरव माना गया है।
गोरखनाथ का जन्म
एक बार श्रीमत्स्येन्द्रनाथजी भ्रमण करते हुए गोदावरी नदी के किनारे चन्द्रगिरि नामक स्थान पर पहुंचे और सरस्वती नाम की स्त्री के द्वार पर भिक्षा मांगने लगे। नि:संतान स्त्री भिक्षा लेकर बाहर आई, लेकिन वह उदास थी। श्रीमत्स्येन्द्रनाथजी ने उसे विभूति देकर कहा कि इसे खा लेना, पुत्र प्राप्ति होगी। लेकिन अनजान भय के कारण उस महिला ने सिद्ध विभूति को एक झोपड़ी के पास गोबर की ढेरी पर रख दिया। बारह साल बाद मत्स्येन्द्रनाथ जी फिर वहीं पहुंचे और सरस्वती से उस बालक के बारे में पूछा। सरस्वती ने विभूति को गोबर की ढेरी पर रखने की बात बता दी। इस पर मत्स्येन्द्रनाथ ने कहा, 'अरे माई, वह विभूति तो अभिमंत्रित थी, तुम चलो, वह स्थान तो दिखाओ।' उन्होंने अलख निरंजन की आवाज लगाई और गोबर की ढेरी से निकलकर बारह साल का एक बालक सामने आ गया। गोबर में रक्षित होने के कारण मत्स्येन्द्रनाथजी ने बालक का नाम गोरक्ष रखा और अपना शिष्य बनाकर अपने साथ ले गए। इसीलिए गोरखनाथ को गोरक्षनाथ भी कहा जाता है।
गोरखनाथ धूनी
कुमाऊं में गुरु गोरखनाथ का व्यापक प्रभाव है। इनके पूजास्थल को 'जागा'स्थान एवं धूनी कहा जाता है और उसके केन्द्र में बनी धूनी अग्निकुण्ड तथा उसमें स्थापित चिमटा, फौड़ी, त्रिशूल आदि को ही इनका प्रतीक माना जाता है।
गोरखनाथ धूनी में साधक नौ दिन तक गृहत्याग कर गेरुए वस्त्र धारण कर गोरखनाथ धूनी में रहते हुए अनेक कठोर नियमों का तीन बार पालन करते हुए इसे पूरा करते हैं। इस काल में दिन में दो बार स्नान, ध्यान-समाधि तथा सायंकाल भोग लगाने के बाद स्वयं साधकों द्वारा बनाया हुआ भोजन करना होता है। साधनाकाल में स्त्री का दर्शन भी वर्जित होने से इन्हें सुबह सबेरे अंधेरे में ही जलाशय में जाकर स्नान करना होता है। रात्रि में ढोलवाद्य के साथ जागौ या जागर लगते हैं जिसमें गोरखनाथ के अनुयायी देवताओं गोरिया, हरू, सैम, नारसिंङ आदि का आवाहन, अवतरण कराया जाता है।
धन्यवाद
A.K.Gudiyal.Uttarakhandi





