उत्तराखंड लोकदेवताओं के चमत्कार
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| उत्तराखंड लोकदेवताओं के चमत्कार |
उत्तराखंड लोकदेवताओं के चमत्कार लगभग पूरे भारत वर्ष में प्रसिद्ध हैं जो कि कई बार देव उत्सवों या जागरों में देखने को मिल सकते है। ऐसे चमत्कार मुख्य रूप से तब देखने को मिलते हैं जब किसी याचक द्वारा देवी-देवताओं के समक्ष मनौतियां पूर्ण किये जाने पर उनके द्वारा उन्हें पूरा किये जाने अथवा किसी पीड़ित व्यक्ति के द्वारा उसके प्रति किये जा रहे अन्याय एवं अत्याचार के विरुद्ध न्याय के लिए गुहार लगाये जाने पर अपराधी या अन्यायी व्यक्ति को दण्डित किये जाने के उदाहरण के रूप में देखने को मिलते हैं। ऐसे चमत्कार पौराणिक एवं लोकदेवताओं के विषय में सुने ही जाते हैं, किन्तु उत्तराखण्ड के अनेक लोक देवताओं के संदर्भ में अनेक ऐसे चमत्कार देखे एवं सुने जाते हैं जो कि अद्भुत शाश्वत और प्राकृतिक नियमों से भी परे देखे जाते हैं और जिनकी व्याख्या केवल किसी दैवी चमत्कार के रूप में ही की जा सकती है।
चमत्कारों के प्रदर्शन
उत्तराखण्ड के इन लोकदेवताओं के विभिन्न चमत्कार जिन दो प्रमुख रूपों में देखे जाते हैं उनमें से एक तो इनके अपने पश्वा या डंगरिया के माध्यम से तथा दूसरा उनके अपने देव स्थानों में हुए देव पूजा आराधना के माध्यम से। देवता विशेष के पश्वाओं द्वारा प्रदर्शित किये जाने वाले सबसे अधिक चमत्कारी कृत्य हैं ,धधकते हुए अंगारों पर नंगे पैरों से नाचना तथा लोहे के गर्म लाल अस्त्र-शस्त्रों के साथ नृत्य करना आदि। जिनके प्रमुख उदाहरण कई रूपों में देखे जाते हैं।
जलते अंगारों के ऊपर नृत्य
रुद्रप्रयाग जिले में जाखनधार में जाख देवता का एक प्रसिद्ध देव स्थान है, जहां पर वैसाख माह में जाख उत्सव का आयोजन होता है। इस उत्सव का सबसे अधिक आकर्षक एवं चमत्कारी दृश्य होता है जाखदेवता के पस्वा के द्वारा प्रदर्शित किया जाने वाला 'अग्नि नृत्य।
अग्नि कुंड में कूदना
इस प्रकार के देवनृत्य में प्रयुक्त किये जाने वाले अग्निकुण्ड की रचना पूरे विधि-विधान पूर्वक उत्सव से पांच दिन पूर्व की जाती है। अग्निकुण्ड में लकड़ी के मोटे मोटे टुकड़ों को आड़े तिरछे बिछाये जाते हैं। इसके तैयार हो जाने पर उत्सव की पूर्व सन्ध्या को इसके विधि विधान पूजन के बाद उनमें अग्नि प्रज्वलित की जाती है। अगले दिन अग्नि कुण्ड की सारी लकड़ियां जल कर लाल अंगारों के रूप में परिवर्तित हो जाती हैं। और जब देवता अपने पश्वा पर प्रकट होता है। देवता के पस्वा में उसका अवतरण होने पर वह उस अग्नि कुंड में कूद पड़ता है।, और उसी स्थिति में वह नृत्य करता है। इसके बाद में जब वह अग्निकुंड से बाहर आता है तो उस पर दो घड़े ठंड़ा पानी डाला जाता है, किन्तु इससे न तो उसके पैरों में कोई फफोले पड़ते हैं और न जलन ही होती है।
धधकती आग के ऊपर बैठना
इसी प्रकार उत्तरकाशी के प्रसिद्ध मैदानू सैदानू देवताओं के विषय में भी बताया जाता है कि इनमें भयंकर अग्नि ज्वालाओं का शमन करने की शक्ति है। इनके पस्वा भी धधकती अग्नि में बैठ जाते हैं और उन पर अग्नि का कोई प्रभाव नहीं होता है। अन्य देवताओं में भैरव,नरसिंह,डौंडिया,आदि देवता गर्म लाल अंगारों में कूदकर नृत्य करते हैं।
लाल गर्म लोहे की वस्तुओं के साथ नृत्य
पांडकेश्वर के घंटाकर्ण के पश्वा के विषय में प्रसिद्ध है कि वह अंगारों में तपकर हुई लाल लोहे की तिपाई को सिर और पीठ पर घुमाता है। उत्सव के दौरान घंटाकर्ण का अवतरण होने पर पश्वा उसे दोनों हाथों में उठाकर सिर के ऊपर ले जाकर नाचता है और फिर उसे वहीं रख देता है । इसके बाद कुबेर का पश्वा या डंगरिया धूनी में अंगारों के ढेर पर कूद पड़ता है और उस पर भी अग्नि का कोई दुष्प्रभाव नहीं होता है।
चावलों का जौ एवम हरियाली में परिवर्तन
भासर देवता के दैवी चमत्कारों के विषय में यह भी कहा जाता है कि उसका पश्वा चावलों को जौ के रूप में और उन्हें हरियाली के रूप में परिवर्तित कर देता है। "यह देवता जहां कहीं भी आता है, अपने प्रसाद के रूप में चावल उठा कर उसे अपनी फूंक से उन्हें प्रभावित कर चावलों के ही बीच जौ और उन्हें हरियाली के रूप में प्रकट कर देता है। चावल की मुट्ठी में पूजा के लोटे को जल छोड़ने पर ही जौ की हरिणाली प्रकट होती है। '
पानी का दूध में परिवर्तन
गढ़वाल के उत्तरकाशी एवं टिहरी जनपदों के प्रसिद्ध शक्तिशाली देवता भासर के अन्यतम चमत्कारों के विषय में कहा जाता है कि भासर देवता का पश्वा शुद्धजल को दूध में परिवर्तित करने की शक्ति रखता है।
कटार से शरीर का भेदन
टिहरी जनपद के जनजातीय क्षेत्र में पूजित जाख देवता के विषय में कहा जाता है कि उसका पश्वा आवेश में आने पर देवता की प्रतीक कटार को पीठ पर ठोक कर आर-पार निकाल देते हैं, किन्तु ऐसा करते हुए न तो उनके शरीर से कोई रक्तस्राव ही होता है और न उससे कोई घाव होता है।
खौलते तेल में हाथ डालना
ज्वाल्पादेवी के विषय में भी कहा जाता है कि इसकी पूजा में कड़ाही में तेल खौलाकर पकोड़े पकाये जाते हैं और इसका पश्वा उन्हें नंगे हाथ से निकाल कर वहां पर उपस्थित भक्तों को इसका प्रसाद बांटता है और उसके हाथ पर खोलते हुए तेल का कोई प्रतिकूल प्रभाव भी नहीं होता है।
