जागर क्या होता है या जागर
किसे कहते हैं?

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"जागर" उत्तराखंड की एक महत्वपूर्ण सांस्कृतिक धरोहर और प्राचीन लोक परंपरा है, जो न केवल धार्मिक आस्था से जुड़ी है, बल्कि समाज के सांस्कृतिक और सामाजिक का एक अभिन्न हिस्सा भी है। यह विशेष रूप उत्तराखण्ड के गढ़वाल और कुमाऊं क्षेत्रों में प्रचलित है। "जागर" शब्द का अर्थ होता है "जागना" या "जागृत होना"। जागर एक आध्यात्मिक अनुष्ठान है, जिसमें देवताओं, देवियों, या पूर्वजों को जाग्रत किया जाता है, जागर को आमतौर पर देवी-देवताओं, और पूर्वजों या पितरों एवं भूत-प्रेत, की पूजा और उन्हें प्रसन्न करने के लिए आयोजित किया जाता है। इसमें जागर गीत और देव नृत्य का प्रमुख स्थान होता है। जागर मुख्यतः दो प्रकार का होता है, देव जागर और भूत जागर।
देव जागर
इसमें स्थानीय देवताओं की पूजा और आराधना की जाती है। देवताओं को जागृत करने के लिए विशेष गीत और मंत्रों का प्रयोग किया जाता है, जिन्हें "जागर गीत" कहा जाता है। इन गीतों को गाने वाले को "जगरिया" कहते हैं, जो अपनी कला ज्ञान और अनुभव से देवताओं को आवाह्न करने में सक्षम माना जाता है।
भूत जागर
इन जागर गीतों में आत्माओं, भूत-प्रेतों या पूर्वजों को बुलाया जाता है, ताकि वे किसी विशेष समस्या का समाधान कर सकें या किसी विशेष घटना के पीछे के कारणों का पता लगाया जा सके। इसे मुख्य रूप से नकारात्मक शक्तियों के निवारण के लिए किया जाता है।
इसके अलावा अन्य प्रकार के जागर कुछ जगहों पर अन्य उद्देश्यों से भी किया जाता है, जिन जागर गीतों को विशेष नाम दिए जाते हैं।
नैतिक जागर
नैतिक जागर तब किया जाता है जब किसी पवित्र या धार्मिक कार्य का आयोजन होता है और इस धार्मिक कार्य में सफल होने के लिए देवी देवताओं का आशीर्वाद और सुख समृद्धी की मंशा के दृष्टिकोण से इन जागरों का आयोजन किया जाता है।।
पितृ जागर
पितृ जागर में पूर्वजों की आत्माओं को प्रसन्न करने के लिए जागर का आयोजन किया जाता है। इसे विशेष रूप से पितरों की आत्माओं की शांति और आशीर्वाद के लिए किया जाता है।
जागर का अनुष्ठान
जागर का आयोजन आमतौर पर रात में किया जाता है, क्योंकि इसे माना जाता है कि रात के समय देवता और आत्माएं अधिक सक्रिय होती हैं। इसमें "जगरिया" मुख्य भूमिका निभाता है, जो अपने गीतों और मंत्रों के माध्यम से देवताओं या आत्माओं को बुलाता है। जागरों के दौरान, विशेष रूप से देवता के जाग्रत होने के बाद, एक व्यक्ति के शरीर में देवता का अवतरण होता है। इसे "डांगर"या पश्वा कहा जाता है, जो उस समय उस देवता या आत्मा का प्रतिनिधित्व करता है। डांगर के माध्यम से लोग अपनी समस्याओं और चिंताओं को देवता के समक्ष रखते हैं।,और अपनी अपनी समस्याओं का निवारण का उपाय पूछते हैं।
जागर गीत और देव नृत्य
जागर अनुष्ठान में जागर गीत और देव नृत्य का विशेष स्थान होता है। जागरों में पारंपरिक वाद्य यंत्रों का प्रयोग किया जाता है। जिसमे हुड़का ,डौंर, थाली ,ढोल दमाऊ की ध्वनि और जगरिया के स्वर जागर अनुष्ठान में एक आध्यात्मिक ऊर्जा का संचार करते हैं। जिससे देवता अपने पश्वे या डांगर पर प्रकट होकर नृत्य करता है। जागर गीत मुख्यतः गढ़वाली और कुमाऊंनी एवं अन्य उत्तराखंडी भाषाओं में होते हैं, जो उस क्षेत्र की लोकभाषा के अनुसार होते हैं।
जागर की सामुदायिक भूमिका
उत्तराखंड के समाज में जागर की महत्वपूर्ण सामाजिक भूमिका भी है। यह न केवल धार्मिक अनुष्ठान है, बल्कि सामूहिक एकता, परंपरा, और सांस्कृतिक धरोहर का प्रतीक भी है। जागर के माध्यम से लोग अपनी सांस्कृतिक पहचान को बनाए रखते हैं और अपनी परंपराओं को पीढ़ी दर पीढ़ी जीवंत रखते हैं।
जागर का आयोजन कब और क्यों होता है ?
जागर उत्तराखंड की एक धार्मिक और सांस्कृतिक परंपरा है, जो विशेष अवसरों पर आयोजित की जाती है। जागर किसी भी निश्चित समय पर नहीं होता, बल्कि यह अलग-अलग परिस्थितियों, अवसरों और आवश्यकताओं के अनुसार आयोजित किया जाता है। इसके कुछ प्रमुख अवसर इस प्रकार भी हो सकते हैं।
धार्मिक पर्व या उत्सव में
कुछ विशेष धार्मिक पर्वों और उत्सव के अवसरों पर जागर का आयोजन किया जाता है। उदाहरण के लिए, जैसे नवरात्रि, मकर संक्रांति, और अन्य पारंपरिक त्योहारों के अवसर पर देव जागर किए जाते हैं। धार्मिक पर्व या उत्सव में जागर का आयोजन दिन और रात दोनों समय में किया जाता है,क्योंकि यह जागर अनुष्ठान एक से ज्यादा दिनों तक भी होता है।
किसी संकट या समस्या के समाधान हेतु
जागर का सबसे सामान्य कारण किसी परिवार या व्यक्ति के जीवन में आई समस्याओं या संकटों का समाधान करना होता है। यह समस्याएं स्वास्थ्य, धन, या पारिवारिक कलह से जुड़ी हो सकती हैं। इस स्थिति में जागर करके देवताओं या पूर्वजों से मार्गदर्शन और समाधान का उपाय पूछा जाता है।
नयी भूमि अधिग्रहण या नए घर में प्रवेश
जब कोई व्यक्ति नया घर बनाता है या नई भूमि का अधिग्रहण करता है, तब वहां शांति और समृद्धि की कामना के लिए जागर का आयोजन किया जाता है। इसे "देवता का आवाहन" माना जाता है, ताकि उस स्थान से नकारात्मक शक्तियों का नाश हो और सकारात्मक ऊर्जा से भर जाए। एवं घर में सुख समृद्धि का आगमन हो जाय इस लिए नये घर में प्रवेश के बाद जागर का आयोजन किया जाता है।
स्वप्न में किसी दिव्य संकेत के आधार पर
उत्तराखंड में ऐसा भी माना जाता है कि अगर किसी व्यक्ति को सपने में किसी देवी-देवता या पूर्वज का संकेत मिलता है, तो उस समय जागर का आयोजन करना आवश्यक होता है। इसे उस देवता या आत्मा का बुलावा माना जाता है,जो आने वाली किसी भी समस्या का समाधान भी कर सकता है।
जागर का समापन
जागर उत्तराखंड की लोक संस्कृति का एक अनमोल हिस्सा है, जो आध्यात्मिकता, संगीत, और सामुदायिक एकता का संगम है। यह परंपरा उत्तराखंड के लोगों के जीवन में आज भी उतनी ही महत्वपूर्ण है, जितनी सदियों पहले थी। जागर के माध्यम से लोग न केवल अपने देवी-देवताओं और पूर्वजों को सम्मान देते हैं, बल्कि अपनी सांस्कृतिक को आजीवन जीवंत रखने की परम्परा को भी निभाते हैं।
जागर समापन के बाद रात्रि जागर में देवता द्वारा बताये गये उपाय या पूजा विधान के अनुसार अगली सुबह देवताओं की पूजा अर्चना की तैयारियां होती हैं और देवता की मांग के अनुसार उनको पूजा दी जाती है।