उत्तराखण्ड
के मूल निवासी कौन थे ?
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| उत्तराखण्ड के मूल निवासी कौन थे ? |
उत्तराखंड के मूल निवासियों के बारे में जानकारी हासिल करने के लिए इतिहास, पुरातत्व, और जनजातीय परंपराओं का अध्ययन अति आवश्यक होता है। और इस अध्ययन के उपरांत जानकारी मिलती है कि उत्तराखंड, जिसे देवभूमि भी कहा जाता है, प्राचीन काल से यहाँ पर विभिन्न जनजातियों और समुदायों का निवास स्थान रहा है। सर्वप्रथम इस क्षेत्र के मूल निवासी मुख्य रूप से किरात, काशी, कुणिंद, थारू, जौनसारी और भोटिया जनजाति के लोग थे। जिनका हम क्रम से आपको जानकारी दे रहे हैं जो इस प्रकार है।
किरात जनजाति
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| उत्तराखण्ड के मूल निवासी कौन थे ? |
किरात उत्तराखंड के प्राचीनतम निवासियों में से एक जनजाति मानी जाती है। ऐसा माना जाता है कि किरात हिमालय के क्षेत्रों में रहते थे और वे शिकारी एवं योद्धा भी थे। पुराणों और महाभारत में भी किरातों का उल्लेख मिलता है। यह जनजाति उत्तरी हिमालयी क्षेत्र में निवास करती थी और आज भी इसके अवशेष नेपाल और उत्तर-पूर्वी भारत में पाए जाते हैं। इनका जीवन प्रकृति पर निर्भर था और वे वन्य संसाधनों का उपयोग करके अपना जीवन यापन करते थे। इन जनजातियों का इतिहास प्राचीन काल से जुड़ा
हुआ है और इनकी जीवनशैली, संस्कृति, और परंपराएँ
उत्तराखंड की समृद्ध धरोहर का हिस्सा हैं।
काशी और कुणिंद
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काशी और कुणिंद जनजाति भी उत्तराखंड के प्राचीन निवासियों में मानी जाती है। यह जनजाति प्राचीन काल में उत्तराखंड के शिवालिक पहाड़ियों और गंगा के ऊपरी
मैदानों में निवास करती थी। एवं कुणिंद जनजाति का उल्लेख प्राचीन ग्रंथों में मिलता है। कुणिंद जनजाति के लोग मुख्य रूप से कृषि और व्यापार करने वाले थे। जिनका उल्लेख गुप्तकाल और मौर्यकाल में भी मिलता है। इनका मुख्य व्यापार नमक, ऊन और अनाज से होता था, वे लोग उस समय तिब्बत और उत्तर भारत के मैदानी क्षेत्रों में व्यापार करते थे। यह जनजाति उस समय के सामाजिक और आर्थिक ढांचे में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती थी। कुणिंद जनजाति ने प्राचीन काल में सिक्के भी जारी किए, जो कि उनके राजनीतिक और आर्थिक समृद्धि का प्रतीक थे।
थारू जनजाति
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थारू जनजाति सर्वप्रथम उत्तराखंड के तराई क्षेत्र में बसती थी और आज भी इसकी उपस्थिति नैनीताल और उधम सिंह नगर जिलों में पाई जाती है। यह जनजाति मुख्य रूप से कृषि पर निर्भर थी और प्राकृतिक संसाधनों का उपयोग करके अपने जीवन यापन करती थी। थारू जनजाति की संस्कृति और परंपराएँ काफी समृद्ध हैं, और वे आज भी अपने पारंपरिक रीति-रिवाजों का पालन करते हैं। थारू समुदाय की परंपराएँ और जीवनशैली बहुत समृद्ध हैं, और वे आज भी अपनी संस्कृति को संरक्षित करने में प्रयासरत हैं।
जौनसारी जनजाति
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जौनसारी जनजाति के लोग उत्तराखंड के पश्चिमी हिस्से में, खासकर देहरादून और जौनसार भावर क्षेत्र में निवास करते थे। जौनसारी जनजाति की उत्पत्ति के बारे में कहा जाता है कि वे महाभारत काल से संबंध रखते हैं और वे पांडवों के वंशज माने जाते हैं। इस जनजाति की जीवनशैली, रीति-रिवाज और भाषा अन्य जनजातियों से भिन्न है। कृषि और पशुपालन इनके मुख्य आजीविका के साधन हैं।
भोटिया जनजाति
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भोटिया जनजाति तिब्बत के समीपवर्ती क्षेत्रों में निवास करती है और इन्हें उत्तराखंड के सबसे पुराने व्यापारियों में से एक माना जाता है। भोटिया लोग मुख्य रूप से उत्तराखंड के पिथौरागढ़, चमोली, और उत्तरकाशी जिलों में बसे हैं। इनका प्रमुख व्यवसाय तिब्बत और भारत के बीच व्यापार करना था, और वे विशेष रूप से ऊनी वस्त्रों के निर्माण और व्यापार के लिए जाने जाते थे। इनके अलावा उत्तराखण्ड के और भी अन्य जनजातियाँ थी जो इस प्रकार से हैं।
अन्य जनजातियाँ और समूह
उत्तराखंड में इन मुख्य जनजातियों के अलावा रवाईं, शौका और गरवाली जैसे अन्य समूह भी थे। समय के साथ, इन सभी जनजातियों ने उत्तराखंड की संस्कृति, भाषा, और समाज में महत्वपूर्ण योगदान दिया है। उत्तराखंड की भाषा, संगीत, कला, और धार्मिक परंपराएँ इन्हीं जनजातीय समूहों की देन हैं। उत्तराखंड के मूल निवासी न केवल इस क्षेत्र की सांस्कृतिक धरोहर के संरक्षक हैं, बल्कि उन्होंने सदियों से हिमालय के कठिन पर्यावरण में अपनी जीवनशैली को विकसित किया है। उनके इतिहास और परंपराओं के अध्ययन से हमें इस क्षेत्र की समृद्ध विरासत और उनके संघर्षमय जीवन की जानकारी मिलती है।
उत्तराखंड का पहला मूल निवास स्थान
उत्तराखंड का पहला मूल निवास स्थान स्पष्ट रूप से निर्धारित करना कठिन है, क्योंकि यह क्षेत्र प्राचीन काल से विभिन्न जनजातियों और संस्कृतियों का निवास स्थान रहा है। हालांकि, ऐतिहासिक और पुरातात्विक साक्ष्य बताते हैं कि उत्तराखंड के कई हिस्से प्राचीन काल से बसे हुए थे।
बागेश्वर क्षेत्र में कत्यूर घाटी
बागेश्वर क्षेत्र में कत्यूर घाटी को उत्तराखंड के सबसे प्रारंभिक और समृद्ध निवास स्थानों में से एक माना जाता है। यहाँ कत्यूर वंश ने 7वीं से 11वीं शताब्दी तक शासन किया। बागेश्वर और उसके आसपास के क्षेत्र, विशेषकर गोमती और सरयू नदियों के संगम पर स्थित हैं, जो उस समय महत्वपूर्ण व्यापार और सांस्कृतिक केंद्र थे।
हरिद्वार और ऋषिकेश गंगा घाटी
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हरिद्वार और ऋषिकेश गंगा घाटी प्राचीन काल से ही धार्मिक और सांस्कृतिक केंद्र रहे हैं। वैदिक काल से ही यह क्षेत्र तपस्वियों, ऋषियों और संतों का निवास स्थान रहा है। पुराणों और महाकाव्यों में भी इन स्थलों का उल्लेख मिलता है, जो इन स्थानों के प्राचीन निवास का प्रमाण है।
जोशीमठ अल्मोड़ा और कर्णप्रयाग
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जोशीमठ, जिसे प्राचीन काल में "कृत्रिमरपुर" के नाम से जाना जाता था, भी एक प्राचीन निवास स्थान था। यह बद्रीनाथ और तिब्बत के बीच एक प्रमुख व्यापारिक केंद्र था, जहाँ से व्यापारिक काफिले गुजरा करते थे।
तराई और भाभर क्षेत्र
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उत्तराखंड का तराई और भाभर क्षेत्र, विशेषकर काशीपुर और आसपास के क्षेत्र, भी प्राचीन निवास स्थानों के रूप में जाने जाते हैं। यह क्षेत्र उपजाऊ भूमि और वन संसाधनों के कारण प्राचीन मानव बस्तियों के लिए आदर्श स्थल था। यहाँ कई पुरातात्विक खुदाइयों से प्राचीन सभ्यताओं के अवशेष
मिले हैं।
पिथौरागढ़ सोरा घाटी
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पिथौरागढ़ का सोरा घाटी क्षेत्र भी उत्तराखंड के प्राचीनतम निवास स्थानों में से एक माना जाता है। यह स्थान व्यापार के लिए प्रसिद्ध था और भोटिया जनजाति का मुख्य केंद्र था, जो तिब्बत के साथ व्यापारिक संबंध रखते थे।
निष्कर्ष
उत्तराखंड का पहला निवास स्थान किसी एक क्षेत्र में सीमित नहीं था, बल्कि यह विभिन्न घाटियों और नदियों के किनारे विकसित हुआ। इनमें से कत्यूर घाटी और गंगा घाटी के आसपास के क्षेत्र विशेष रूप से महत्वपूर्ण थे, जहाँ प्रारंभिक मानव बस्तियों और सभ्यताओं का विकास हुआ।
धन्यवाद
A.K.Gudiyal.Uttarakhandi




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