उत्तराखंड लोकजीवन की आवासीय व्यवस्था


 उत्तराखंड लोकजीवन की आवासीय  व्यवस्था


उत्तराखंड लोकजीवन की आवासीय व्यवस्था


अपने पिछले ब्लॉग में हमने उत्तराखंड लोकजीवन के अभावग्रस्त एवम संघर्षमय जीवन के बाबजूद सादगी भरे जीवन का उल्लेख किया था, और ये भी जिक्र किया कि पहाड़ी क्षेत्रों में अल्मोड़ा,श्रीनगर जैसे प्रशासनिक केंद्रों को छोड़कर और कोई नगर या कस्बा नहीं था । शत प्रतिशत लोग गांवों में बसा करते थे। ये लोग किस प्रकार के घरों में रहते थे और घर किस तरह बनाते थे एवम गाँव में लोगों के घर किस तरह से व्यवस्थित होते थे आज के ब्लॉग में विस्तार पूर्वक इसकी जानकारी दे रहे है। 

गुफा वास से शुलभ आवासीय व्यवस्था 

आदिवासी या गुहा वासी मानव ने समय के साथ अपने आप मे बदलाव एवम प्रगति करके हुए सबसे पहले अपने लिए लिए एक स्थायी ,सुरक्षित एवम सुविधाजनक आवास का निर्माण किया जिसे अपने उपलब्ध सामग्री से सजाया एवम अपनी आवश्यकताओं के अनुसार उसमे रहने -खाने एवम सोने की व्यवस्था की ।

समय परिवर्तन के साथ यातायात की सुविधाओं के फलस्वरूप कुछ एक व्यापारिक केंद्र तथा कस्बों के विकसित हो जाने पर लगभग 95 फीसदी से भी अधिक लोग गांवों में ही रहते थे। पहाड़ी क्षेत्र होने के कारण बड़े गांवों के लिए किसी एक स्थान पर पर्याप्त जगह जमीन के उपलब्ध न होने के कारण यहां के गाँव छोटे छोटे होते थे और अगर कुछ जगह की कमी होती तो आसपास के ढलान वाली जमीन को खोदकर समतल बनाने के बाद दो चार घर और बना लेते तथा कुछ जमीन पर खेती बाड़ी के उपयोग में ले लिया करते थे। इनके घरों के निर्माण की आधार भूमि के बारे में थोड़ी जानकारी हासिल करके पता चला कि यहां के लोगों के भवन एक  ऐसी जमीन पर बनाये गए थे जहां पर की पहाड़ों से टूटकर पत्थरों के गिरने या भूस्खलन एवम बाढ़ आने की संभावना नहीं थी। 

ऐसे होते थे पुराने जमाने के घरो के नमूने 

जिन लोगों के पास रुपये पैसे की पर्याप्तता थी वे लोग अपने घर की दीवारें  मिट्टी पत्थर से बनाते थे  और घरों की छतों को दोनों तरफ से  ढलान रूप में रखते थे ताकि बर्फ पड़ने के बाद  बर्फ का जमाव न हो और बर्फ आसानी से गल जाए एवम आंधी तूफान में घर की छतों को कोई नुकसान न हो। बाकी लोग  कच्चे घास फूस से अपने लिए झोपड़ी बनाकर रहा करते थे। घर की छतों पर वर्षा का पानी या बर्फ का जमाव न हो इसलिए छत को दोनों ओर से ढालदार बनाया जाता था। पटालों से ढकने वाली इन छतों में बल्लियों के ऊपर लकड़ी की पतली पतली फाड़ी गयी पट्टियां बिछाकर उनके ऊपर चिकनी गाड़ी मिट्टी की परत के बाद पटाले या  पत्थर की सलेटें  चिपका देते थे जोकि अब भी उत्तराखंड के काफी घरों में देखने को भी मिलती हैं। ज्यादातर लोगों के घर दो मंजिला होते थे जिसमे नीचे कि मंजिल में पशु एवम उनके लिए घास आदि रखते थे।

नए गांवों को बसने के जमीन का चुनाव

किसी नए गांव या तोकगांव को बसने के लिए जमीन का चुनाव करते समय कुछ विशेष बातों का ध्यान रखा जाता था सबसे पहले गांव पहाड़ के ढलान की ऊंचाई पर हो,जिसमे खेतीबाड़ी  भी हो सके और पेयजल तथा सिंचाईं के लिए पानी पर्याप्त मात्रा में हो, चाहे धारे का पानी हो या नदीं या किसी जल स्रोत का। और उसके आसपास घास लकड़ी आदि के लिए जंगल,एवम पशुओं के चारे के लिए भी व्यवस्था हो सके। 

गांवों में इस तरह के बने होते थे इन लोगों के घर

पुराने  गांवों में घर गांव के बीच मे श्रृंखला के रूप में खोलियों में बनाए जाते थे। इनमें कुछ घरों में छज्जे के साथ बाहर वाला घर जिसे पहले  डण्डियाला कहा जाता था और डण्डियाले के भीतर जगह के हिसाब से तो या तीन छोटे छोटे कमरे होते थे जिसमें से एक रसोड़ा और बाकी एक या दो कमरे सोने के लिए होते थे  और याण्डिले से  निचला  छज्जे से नीचे वाला कमरा  गाय भैस,बकरी एवम घास लकड़ी के हिसाब से एक या दो कमरों में होता था।  ऐसे घरों में कुछ तिबारी वाले और कुछ डण्डियाले वाले होते थे । पुराने जमाने से लेकर अब तक के समय मे भी उत्तराखंड के गढ़वाल क्षेत्रों में गांवों में कई मकानों की कतारें दो पंक्तियों में  बनाई जाती थी और बीच मे  ऊपर नीचे जाने वाला रास्ता होता  था । घरों के प्रवेश द्वार हमेशा छोटे होते थे जिनके अंदर हमेशा सिर झुकाकर जाना पड़ता था और रोशनी के लिए  बड़ी खिड़की की बजाय छोटी छोटी मोरियां होती थी ,घर के बाहर घर दिवार पर 3-4 फुट की ऊंचाई पर मौने या मधुमक्खियों के आले या जलोठे बनाये जाते थे और इन जलोठों के अंदर से एक लकड़ी के डिब्बे की तरह बक्शा के आकार की पेटी जिसको बाहर की तरफ से बंद और केवल एक सुराख छोड़ दिया जाता था मधुमक्खियों के अंदर आने के लिए जिससे मधुमक्खियों से शहद बनाया जा सके जिसको की मीठे के रूप और दवाई के रूप में प्रयोग किया जा सके। इस तरह थी पुराने जमाने मे लोगों की रहन सहन और  उनके घर आदि की आवासीय व्यवस्था।

                                                   धन्यवाद 

                                   A.K Gudiyal Uttarakhandi        



Uttarakhand Gyan

i am a blog writer uttarakhand folk lifestyle, folk culture, tradition, dress, ornaments, folk modesty, customs, folk songs, folk dances, rituals, lifestyle, farming, animal husbandry, mutual brotherhood, sense of cooperation and dedication towards each other,

एक टिप्पणी भेजें

और नया पुराने