उत्तराखंड लोकजीवन में आजीविका के मुख्य स्रोत





उत्तराखंड लोकजीवन में आजीविका के मुख्य स्रोत

उत्तराखंड लोकजीवन में मुख्यतः कृषि और पशुपालन से ही हर जरूरत की वस्तुएं  उपलब्ध होती थी। और जो  लोग  कृषि और पशुपालन का काम नहीं करते थे वो लोग छोटे मोटे स्थानीय व्यवसाय या हस्तशिल्प  वे लोग अलग अलग वर्गों के हिसाब से अपनी आजीविका चलाते थे । जैसे कि ब्राह्मण लोग के लोग अपनी ज्योतिर्विद्या एवम वृति बाड़ी से,लोहार लोहे के बर्तन बनाकर,दर्जी लोग कपड़े सिलकर,और कुछ अन्य वर्ग विशेष के लोग  अपनी  सक्षमता के अनुरूप अपना अपना काम करके आजीविका चलाते थे। आजीविका के साधन कभी कभी शहद,घी,वनों से प्राप्त औषधियां,एवम पशुधन से होता था। बाकी  इन लोगों की किसी अन्य स्रोतों से जो कुछ भी आमदनी होती थी  उसको विस्तार से समझने की एक छोटी सी कोशिश इस ब्लॉग में की गयी है जोकि निम्न प्रकार से है।




उत्तराखंड लोकजीवन में आजीविका के मुख्य स्रोत



लघु उद्योग

आधुनिकता से पहले यहां पर आजीविका के साधनों के रूप में व्यापार लघु उद्योग की स्थिति तो लगभग न के बराबर थी । पहाड़ी क्षेत्रों में कृषि की इतनी उत्पादकता नहीं थी जो कि  व्यवसायिक रूप से हो सके, अगर खेती बाड़ी से जो कुछ उत्पादन होता उतना आजीविका के लिए पर्याप्त नही हो पाता था । लघु उद्योग  के नाम पर यहां पर स्थानीय उत्पादों पर आधारित  छोटे मोटे लघु उद्योग चला करते थे। उनमें जैसे कि भेड़ बकरियों के ऊन से कम्बल, वस्त्र निर्माण,,परन्तु समय परिवर्तन के साथ  ये छोटे मोटे लघु उद्योग समाप्त होते चले गए। कुछ लोग सूप, माणु,पाथू,तामी, ठेकी,परिया, डकोले,परोठी, खेती बाड़ी के काम मे आने वाले लकड़ी के हल, जुवा,निसुड़, दन्देला, ओखल मूसल ,सिल बट्टा,चक्की एवम घराट के पाटे आदि बनाकर अपनी आजीविका चलाते थे।

धातु उद्योग 


उत्तराखंड लोकजीवन में आजीविका के मुख्य स्रोत

धातु उद्योग में धातु के बने बर्तन जैसे कलशा,गागर, कसेरीभड्डू, मूर्तियां पंचपात्र ,कलश, आचमनी, पशुओं के गले मे बांधी जाने वाली घण्टियाँ, मन्दिर के घण्टी,घण्डियाल, एवम  हुक्के वाली चिलम ,एवम  फरसियां ,कुदाल ,फावड़ा, बेलचा ,कुल्हाड़ी, हथौड़ा, बसूलछेनी, दरांती, थमलू दरवाजे की चटकनी ,कुंडी, सांगल  तसले, भगोना ,कड़ाही, देवताओं की स्थापना में लगने  वाले दयूंण त्रिशूल, चिमटे आदि बनाते थे।  इनमे  कुछ लोग धनुष तीर ,भाले, बड़छे,खुखरी,तलवार,कटार आदि अस्त्र सस्त्र बनाते थे।

बांस और रिंगाल 


  
उत्तराखंड लोकजीवन में आजीविका के मुख्य स्रोत
                                                                          

धातु से बनाई जाने वाली वस्तुओं के अतिरिक्त  घर मे इस्तेमाल होने छोटे बड़े बांस और रिंगाल से बने  टोकरे,सोल्टा ,छोटी बड़ी कंडी,टोकरियाँ,सूप, डलुणे,  झूले,पालने,चटाई  आदि बनाते थे।रिंगाल बांस से बनी डलिया, डोहरे,डलुणे टोकरी वगैरह बनाकर अपनी आवश्यकताओं की पूर्ति करते थे । इसके अतिरिक्त कुछ लोग भांग के रेशों से भंगेला,गाती,कोथले और कपास की रुई से गाढ़े का कपड़ा तैयार करते थे। 

वन उत्पादों से आजीविका  


उत्तराखंड लोकजीवन में आजीविका के मुख्य स्रोत

पिछले समयों में भोज्य सामग्री के रूप में उपयोग में लाये जाने वाले वन्य उत्पादों के अतिरिक्त कुछ ऐसे वन्य उत्पाद भी थे जिनके व्यवसाय के द्वारा ग्रामीण लोग अपनी आजीविका के लिए थोड़ा-बहुत धन अर्जित कर लिया करते थे। इन वन्य उत्पादों में कुछ पण्य वस्तुएं हुआ करती थीं- जैसे नागकेसर, दालचीनी, काकड़सिंगी,  सालमपंजा, चिरायता, कचूर, जटामासी,  मीठाविष, निर्बिसी, ब्राह्मी,  लालजीरी, अतीस, अर्चा, कपड़े तथा चमड़े को रंगने के काम में आने वाली वृक्षों की छालें, दारुहल्दी, तेजपात, कस्तूरी, सुहागा, शिलाजीत, शहद, मोम, गोंदें,  भोजपत्र, वाँसुरियों के लिए देव रिंगाल, हुक्के की नलियां, अनेक प्रकार की वन औषधियां, हींग, जम्मू, गन्द्रायण, बाजपक्षी, सुवर्णचूर्ण, कमीला, कचूर, जिमीकन्द, च्यों या मशरूम  आदि को बेचकर आमदनी अर्जित कर लिया करते थे । इस तरह से उत्तराखंड लोकजीवन में उस समय के लोग खेती बाड़ी,पशुपालन के अलावा अन्य  विभिन्न्न स्रोतों से अपनी आजीविका चलाते थे।

                                                                         धन्यवाद 

                                                         A.K Gudiyal Uttarakhandi


Uttarakhand Gyan

i am a blog writer uttarakhand folk lifestyle, folk culture, tradition, dress, ornaments, folk modesty, customs, folk songs, folk dances, rituals, lifestyle, farming, animal husbandry, mutual brotherhood, sense of cooperation and dedication towards each other,

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