उत्तराखंड लोकजीवन में कृषिकीय जीवन शैली


उत्तराखंड लोकजीवन में कृषिकीय जीवन शैली


जैसा कि आप जानते है कि उत्तराखंड लोकजीवन में इन लोगों का मुख्य व्यवसाय खेती बाड़ी और पशुपालन था। ये लोग अपनी आजीविका  चलाने के लिए  इन्हीं दो व्यवसायों पर निर्भर थे। लेकिन शत प्रतिशत लोगों की जीविका प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से खेती बाड़ी पर ही निर्भर थी। तो यहां के लोगों की जीवनशैली का रूप एवम सांस्कृतिक परम्पराओं का रूप भी कृषि या पशुपालन पर ही केंद्रित रहा।


उत्तराखंड लोकजीवन में कृषिकीय जीवन शैली


इन लोगों की खेती बाड़ी ,भूमि की स्थिति, वर्षा और जलवायु के अनुरूप परम्पराओं से अर्जित जानकारी के आधार पर ही होती थी। शुरुआती दौर में अधिकतर खेत छोटे मोटे एवम टेड़े मेढे होते थे,जिन पर हल चलाना बहुत मुश्किल होता था ,इन खेतो में जो कुछ भी बोया जाता था वह हाथ से कुदाल से खोद कर ही किया जाता था । जिन लोगों के पास हल, दन्देला,पाटा, और बैल होते थे वे तो आसानी से खेतों में हल जोतकर  बीज बोया करते थे,किंतु जिन लोगों के पास हल बैल नहीं होते थे तो वे लोग हल को खींचने के कभी एक या कभी दो आदमी अपनी  कमर में रस्सी की सहायता से बांधकर हल खींचा करते थे ,और हाथ मे एक लाठी लेकर हल को  खींचते थे और एक आदमी पीछे से हल पकड़ कर बुवाई करता था। उस समय ज्यादातर  केवल जौ,झंगोरा,कोदा, चौलाई ,कौणी ,भट्ट,गहत,एवम दालें और इसके अलावा मिर्च,हल्दी, मूली,पोस्त  शाक सब्जी की खेती होती थी। बागवानी जैसी सुविधा उस समय नहीं थी लोग अखरोट,अनार, नींबू, नासपाती आड़ू आदि के पेड़ लगाते थे उस समय के लोगों के पास कोई भी कृषि सुधार तकनीक नहीं थी  शायद इसीलिए खेती बाड़ी में सुधार नहीं हुआ, केवल पहले से चले आ रहे तरीको से ही ये लोग  खेती करते थे ।

खेती के तौर तरीके

उत्तराखंड लोकजीवन में खेती बाड़ी दो प्रकार से की जाती थी घिमि और चौमासी यानी कि रबी और खरीफ।  जोकि की दो तरह की  कृषि भूमि  होती थी,एक जहां पर सिंचाई का साधन हो और दूसरी जहां पर सिंचाई के लिए पानी नहीं होता था केवल वारिश के पानी के भरोसे फसल तैयार होती थी । उस समय वे लोग ढलान वाली जमीन की झाड़ झंकार साफ करके खेत बनाते थे,जो खेत नए बनते थे  उन खेतों की खुदाई या बवाई चाहे बैल से हो कुदाल से, बीज बोने से पहले कन्या पूजन और ग्राम देवता का पूजन किया जाता था उसके बाद बीज बोया जाता था । और जब फसल उग जाती थी तो फसल की सुरक्षा के लिए हनुमान जी की पूजा भी की जाती थी। जिसमे देवता के नाम का एक रोट बनाकर खेतों से बाहर किसी पेड़ पर बांध दिया जाता था और खेत मे कुछ अभिचार मन्त्र लिखकर उसे डंडे पर बांधकर खेत मे गाड़ दिया जाता था। मान्यता थी कि ऐसा करने से  भगवान ख़ुद उन लोगों की  खेती की सुरक्षा करते थे।


उत्तराखंड लोकजीवन में कृषिकीय जीवन शैली


खेतों में फसलों की सुरक्षा

 खेती को बाहरी नुकसान होने से बचने के लिए एक विशिष्ट पूजा अनुष्ठान किया जाता है जिसे  भूमि का परिसीमन कहा जाता था। इस पूजा में खेती को बाहरी दुष्प्रभाव से बचाने के लिए  केर-बन्धन अर्थात खेती की सीमाओं को कीलित किया जाता था।

कृषि सम्बन्धी अनुष्ठान


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कृषि सम्बन्धी अनुष्ठान  में एक प्रमुख अनुष्ठान था कि खेती के प्रथम अनाज को देवता को अर्पित करना,इस अनुष्ठान को नवप्राशन यज्ञ कहा जाता था। उत्तराखंड में भूमि एवम कृषि का मुख्य रक्षक माने जाने वाले भूमिया देवता (कुमाऊँ में इसे क्षेत्रपाल भी कहते हैं) को अपनी खेती का प्रथम अन्न  अर्पित करना अभी वर्तमान में भी माना जाता है  और फसल कटाई से पहले कुछ अन्न की बालियों वालों पौधों को देवता को चढ़ाए जाते थे जो परम्परा अभी भी  जीवन्त है।

खलीकरण  (दांई) (दैंई)

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खलिकरण में गेंहू,जौ कोदा झंगोरा  आदि की फसलों की बालियों वाला भाग काटकर खलिहान में सुखाया जाता था और जिन  लोगों के पास कम कृषि भूमि होने की वजह सेअनाज कम होता था  वे लोग अपने हाथों से मुंगरे की सहायता से खुद ही कूटकर मँड़ाई करते थे। और जिनका ज्यादा अनाज होता था वे लोग सूखने के बाद उसकी मंडाई दो चार बैलो के जोडे से की जाती थी  इस मंडाई के काम मे जो भी लोग मंडाई में हाथ बताते थे  उन सभी के लिए  शाम को एक विशेष भोजन बनता था,जिसे दैंई भोज कहा जाता था,इस भोज को खाने के लिए गाँव के सभी छोटे बड़े लोग बड़े उत्सुक रहते थे ,मंडाई के समय सब लोग नंगे पैर ही रहते थे। फिर मंडाई के बाद फिर सूप से ऊपर उठाकर हवा में मिक्स भूसे वाले अनाज को जमीन पर गिराया जाता था जिससे सब भूषा उड़कर केवल अन्न के दाने ही जमीन में रह जाते उसको छानकर  कोथुलों, बड़े बड़े थैलों में भरने से पहले कपड़े या कम्बल से ढका देते थे  और फिर अपनी परम्परा के हिसाब से धूप -धुपण करके भर देते थे । जिसमे मंडाई शुरू होने के बाद से लेकर अन्न को थैलों में भरने से पहले कोई भी खलिहान छोड़कर नहीं जाता था कम से कम एक आदमी तो अवश्य होता था । और उसी अन्न में से एक सूप देवी देवताओं की नव अन्न पूजा के लिए अलग निकाल दिया जाता था और उसको बाद बाकी अन्न को भंडारण कर दिया जाता था। 

अन्न का भंडारण

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अन्न का भंडारण का नाप सूप,पाथों और कोथुलों से  होता था उसके बाद उन्हें भकार, टँकी ,या  रिंगाल बांस से बने डोहरों में रख दिया जाता था।कुमाऊं के पिथौरागढ़ जिले के कुछ क्षेत्रों के लोग  अन्न का बड़े बड़े गड्डों को लीप थाप कर अन्न के चारों तरफ से भोजपत्र  से ढककर  उसके ऊपर  पटालों से दबाकर  फिर मिट्टी से लेप कर भंडारण किया करते थे। 

नव अन्न पूजा 


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यह पूजा मुख्य रूप से भूमिया देवता और क्षेत्रपाल देवता के निमित की जाती थी ।इस पूजा में फसल के खलिहान से अन्न भंडारण से पहले ही भूमिया देवता की पूजा के लिए अन्न अलग ही रख दिया जाता था ,उसी नए अन्न से भूमिया देवता की पूजा भेंट की जाती थी ।यह परम्परा तो अभी भी है लेकिन अब स्वरूप बदल चुका है। तो इस तरह से उत्तराखंड लोकजीवन में कृषि सम्बन्धी क्रिया कलाप एवम पूजा अनुष्ठान किये जाते थे।

                                                                धन्यवाद 
                                              A.K Gudiyal Uttarakhandi


Uttarakhand Gyan

i am a blog writer uttarakhand folk lifestyle, folk culture, tradition, dress, ornaments, folk modesty, customs, folk songs, folk dances, rituals, lifestyle, farming, animal husbandry, mutual brotherhood, sense of cooperation and dedication towards each other,

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