उत्तराखंड लोकजीवन ने पशुपालन सम्बन्धी परम्पराएं
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| उत्तराखंड लोकजीवन ने पशुपालन सम्बन्धी परम्पराएं |
उत्तराखंड लोकजीवन में कृषि के साथ साथ पशुपालन का भी बड़ा महत्व था। क्योंकि खेती बाड़ी के साथ घी, दूध ,आदि का होना भी उतना ही आवश्यक है जितना कि रोटी सब्जी दाल चावल। इस लोकजीवन में लगभग पचास फीसदी आजीविका पशुपालन से ही बसर होती थी ,इस समय के लोग गाय ,भैस,बकरी,भेड़ बकरियों के साथ मुर्गी पालन आदि भी किया करते थे । पशुपालन का योगदान मुख्यतः उन लोगों के लिए जरूरी था जिन लोगों के पास खेती के लिए पर्याप्त भूमि नहीं थी। और इनके उत्पादों से आजीविका के अतिरिक्त साधनों के रूप में भी एवम खेती बाड़ी के बेहतर उत्पादन में योगदान के रूप में भी पशुपालन का बहुत बड़ा महत्व था।
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| उत्तराखंड लोकजीवन ने पशुपालन सम्बन्धी परम्पराएं |
लघु हिमालय के क्षेत्रों के निवासी,शौका,गद्दी आदि जनजातियों के लोगों के पास खेड़ी बाड़ी के लिए पर्याप्त कृषि भूमि नहीं थी तो इन लोगों का मुख्य व्यवसाय भेड़ बकरियों से प्राप्त होने वाली ऊन तथा मांस के लिए उनका विक्रय होता था। और जो तराई भावर में पालतू पशु गाय भैंसों के दूध,दही,घी मट्ठा आदि को बेचकर और बाकी से अपने भोजन की कमी को पूर्ण कर लिया करते थे। दूसरी ओर पशुपालन से खेती बाड़ी के अच्छे उत्पादन में सहायक गोबर खाद की आपूर्ति भी हो जाती थी। अर्थात इनकी आजीविका में जितना महत्व खेती का था उतना ही महत्व पशुपालन से भी था । अतः उस समय के लोगों की कृषि एवम पशुपालन से सम्बंधित अनेकों परम्पराएं होती थी। जिसको कि अपनी जानकारी के अनुसार नीचे विस्तार से लिखा गया है।
पशु प्रसव पश्चात शुद्धीकरण
वैसे तो पुराने जमाने से लेकर आज तक भी उत्तराखंड में पशुओं के नए जन्मे बछड़े का नामकरण किया जाता है । परन्तु आज के जमाने के नामकरण संस्कार का अब वर्तमान में स्वरूप बदल चुका है अलग अलग क्षेत्रों में इस संस्कार को अपने अपने ढंग से किया जाता है। लोकजीवन परम्परा के अनुसार उत्तराखंड में पशुपालक लोग अपने पशुओं के प्रसव होने पर 10वें 11वें दिन में नए बछड़े का नामकरण संस्कार करते थे जिसे बध्वाण पूजा कहते हैं। ऐसे पशु प्रसव का इंसानों के प्रसव जैसा ही शुद्धिकरण किया जाता था। कुमाऊँ में 9 दिन का प्रसव छूत माना जाता है जबकि गढ़वाल में 11 दिन तक आम आदमी इस दूध को खाने पीने में प्रयोग करते थे या करते हैं परंतु जिन लोगों और देवताओं का अवतरण होता है वे लोग 22 दिन तक इस दूध से परहेज करते थे एवम अब भी करते हैं। प्रसव के समय गाय या भैंस जो दूध देती है उस दूध को जूठे मुंह से नहीं खाया जाता ,इसी प्रकार बध्वाण पूजा के दिन प्रसूता पशु के दूध से तैयार किये गए घी,मक्खन,एवम मट्ठा किसी को भी नहीं दिया जाता है। और इसी घी और दूध का इस्तेमाल बनाया गया खीर एवम भोग एवं धूप धुपण करके बध्वाण देवता को चढ़ाया जाता है। और इस पूजा के बाद दूध,दही,मक्खन घी का सामान्य रूप से इस्तेमाल किया जाता है। अपने अगले ब्लॉगों में बध्वाण पूजा को विस्तार से लिखा जाएगा। आज के ब्लॉग में केवल पालतू पशुओं से सम्बन्धित पर्व, उत्सव,एवम परम्पराओं का उल्लेख किया जा रहा है।
गोवर्धन पर्व त्योहार
उत्तराखंड में यह उत्सव पशुओं की वंश बृद्धि के लिए मनाया जाता था।यह उत्सव दीवाली के दूसरे दिन मनाया जाता था गौ वंश की बृद्धि की कामना से किया जाने वाला यह पशु उत्सव उत्तराखंड के पशुपालक एवम पशुचारक लोगों का एक विशिष्ट उत्सव था। इस उत्सव के दिन पशु पालक प्रातःकाल खीर,हलवा,पूड़ी,बनाते थे और कच्ची हल्दी पीसकर उसे ताजे मट्ठे में मिलाकर उसके घोल से अपनी गौशाला में बंधे पशओं पर थाप के निशान बनाता था और बैलों के सिरों पर फूल फूंदों से सजाकर उन को माला पहनाता था और फिर अपनी गौवंश की बृद्धि की कामना करता था।
गाई त्यार
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| उत्तराखंड लोकजीवन ने पशुपालन सम्बन्धी परम्पराएं |
उत्तराखंड में यह त्योहार पिथौरागढ़ जिले में मनाया जाता था या हो सकता है अब भी कहीं कहीं मनाते होंगे ।ऐसी मान्यता थी कि जब वर्षाकाल में जब पशु गौशाला से बाहर रहते थे, तो उस समय गौशाला खाली होती थी उस समय कोई दुष्टात्मा गौशाला में ,वनों में या कहीं रास्ते मे उन पर आक्रमण करती थी ।तो उस दुष्ट आत्मा को भगाने के लिए महिलाएं चीड़ के छिलड़ो को मशाल रूप में जलाकर हाथ मे दरांती लेकर उस दुष्ट आत्मा को भगाकर एक जगह ले जाती थी जहां पर पहले से वो लोग उस आत्मा का पुतला बनाकर रख देते थे उसके पास झाड़ झंकार का ढेर लगा देते थे ,और फिर उस पुतले को जला देते थे ।ऐसे ही कुछ मनाया जाता था इस त्योहार को श्रीकृष्ण द्वारा पूतना नामक राक्षसी के विनाश से सम्बंधित मानी जाती थी।
बैलों से सम्बंधित उत्सव ब्लदिया यगास
जैसा कि आप जानते है कि कृषि क्षेत्र में बैलों का बहुत बड़ा महत्व होता है। इसी बात को मानते हुए वे लोग एक साल में एक दिन का ऐसा चुनाव करते थे जिस दिन बैलों की विशेष सेवा हो सके । इस दिन बैलों को पूरे दिन काम करने नहीं जाता था। इस दिन बैलों को अच्छा अच्छा भोजन दिया जाता था । इस त्योहार को ब्लदिया यगास त्योहार भी कहा जाता था।
पशुओं का रक्षक देवता
उत्तराखंड में अलग अलग विभिन्न क्षेत्रों के पशुपालकों के पशुओं के रक्षक देवी देवता एवम इससे सम्बन्धित अलग अलग पर्व उत्सव होते थे। कुमाऊँ में बढवान देवता और कहीं पर चौमू देवता,और गढ़वाल में सिन्दूआ विंदुआ एवम घण्टाकर्ण का प्रभाव है किसी मे भद्राज देवता का भी महत्व माना जाता है तो इस तरह से उत्तराखंड लोकजीवन में पशुओं से सम्बंधित पर्व उत्सव परम्परा एवम पशुओं के रक्षक देवता आदि का प्रचलन था और कहीं कहीं अब भी है। उत्तराखंड में ऐसे कई पर्व उत्सव एवम परम्पराएं हैं जो आज भी जीवित है ।
धन्यवाद
A.K Gudiyal Uttarakhandi


