उत्तराखंड लोकजीवन में पहाड़ी महिलाओं की दिनचर्या
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| उत्तराखंड लोकजीवन में पहाड़ी महिलाओं की दिनचर्या |
उत्तराखंड लोकजीवन में पहाड़ी क्षेत्र के गांवों में रहने वाले लोगों की मुख्य दिनचर्या कृषि और पशुपालन पर ही निर्भर करती थी । क्यूंकि कृषि क्षेत्र में यहां की महिला एवम पुरुष दोनों की सहभागिता होती थी ,और पुरुष एवम महिला मिलजुल सारे कामों में हाथ बंटाते थे। पत्नी के रूप में सन्तान उत्पत्ति से लेकर पालन पोषण तक आधे से भी अधिक जिम्मेदारी महिलाओं की होती है । लेकिन घर के कामों में इनकी दिनचर्या सबसे विभिन्न और संघर्षमय भी होती थी। महिला का जीवन इतना संघर्षमय होता है कि प्रातःकाल से लेकर शाम देर रात तक सोने से पहले इन महिलाओं को सांस लेने की भी फुर्सत नहीं होती थी।
महिलाओं की संघर्षमय जीवनशैली
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| उत्तराखंड लोकजीवन में पहाड़ी महिलाओं की दिनचर्या |
सुबह जल्दी उठने के बाद सर्वप्रथम पंदेरे या नवेले से पानी लाना उसके बाद गौशाला में गाय,भैंस का दूध दुहाना, पशुओं का गोबर साफ करके गोबर के ढेर में जमा करना, सुबह नाश्ता तैयार करना फिर नाश्ते के बर्तन साफ करना ,गेंहूँ,कोदा, मक्का आदि को घरेलु चक्की में पीसना,धान,झंगोरा,कौणी, वगैरह को ओखल में कूटना,गाय भैस आदि पालतू पशुओं के लिए घास काटना और घास एवम चारा खिलाना,कुछ ऐसे पशु जैसे बैलो और जितने भी पशु जंगल मे चरने लिए जाते हो उन सभी को जंगल ले जाना या किसी और को पशुओं के साथ जंगल भेजना ,जंगलों से खाना बनाने के लिए लकड़ियां इकट्ठी करके लाना रसोई और अन्य कमरों की साफ सफाई करके लीपना ,दूध जमाना,दही को मथ कर मठ्ठा और मठे से मक्खन और फिर मक्खन से घी तैयार करना,इसके अलावा अपने व घर के बाकी सदस्यों के कपड़े धो सूखा कर रखना इतने सारे काम करने होते थे पहाड़ी नारी को।
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| उत्तराखंड लोकजीवन में पहाड़ी महिलाओं की दिनचर्या |
फिर दोपहर के खाने की तैयारी फिर जूठे बर्तनों को धो कर शाम को घास चारा लाके, एवम पशुओं को खिलाकर शाम के समय का दूध दुहाना और अंत मे रात का खाना बनाकर सबको खिला कर रात के जूठे बर्तनों की साफ करके रखकर फिर सुबह की कुछ तैयारियां करके गृहस्थी के सभी कामों से निवृत होकर शयन कक्ष में पति की सेवा में उपस्थित होकर पत्नी धर्म को पूरा करना, तब कहीं समय मिलता था सोने का । इनको सजने सँवरने का ,विश्रांम करने का समय तक नहीं मिलता था या यूं कहें कि दिनभर अपनी जिम्मेदारियों को पूरा करते करते अपने लिए समय नहीं निकाल पाती थी। तो इस तरह से होती थी पहाड़ी महिलाओं की संघर्षमय जीवनशैली।
महिलाओं की कृषि सम्बन्धी दिनचर्या
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| उत्तराखंड लोकजीवन में पहाड़ी महिलाओं की दिनचर्या |
खेती बाड़ी के काम मे भी महिला का बहुत बड़ा योगदान होता है। सुबह जल्दी उठकर बैलों को घास चारा पानी देना और गौशाला के बाकी काम निपटाकर इतने में पुरुष लोग बैलों को लेकर खेतों में चले जाते थे तो उनके लिए रोटी सब्जी बनाकर खेतों में खुद व अन्य सभी की रोटी सब्जी ले जाकर खेतों में पुरुषों के साथ अपने हिस्से के काम मे मदद करना। खेतो में गोबर डालना ,खेतों में फसल उगने के बाद निराई गुड़ाई से लेकर मंडाई और भंडारण तक महिलाओं की शत प्रतिशत भागीदारी होती थी।
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| उत्तराखंड लोकजीवन में पहाड़ी महिलाओं की दिनचर्या |
घर में अतिथि सत्कार से लेकर गांव में अगर किसी के घर परिवार में शादी व्याह,या अन्य कोई भी बड़ा कार्यक्रम हो तो बारातियों के लिए खाना बनाने के लिए लकड़ीयों को दूर दराज से सिर में ढोकर लाना,बाद में शाम को सभी महिलाएं सामूहिक रूप से रोटियां पकाना, महिला संगीत कार्यक्रम करना,अपने पशुओं के लिए दूर जंगलों से घास काटकर लाना। केवल एक मेलों, उत्सवों पारिवारिक उत्सव और कभी अपने मायके जाने के मौके पर ही अपने सीमित साधनों एवम प्रसाधनों का उपयोग कर सकती थी।
पहाड़ी लोकजीवन में पर्वतीय नारी की गाथा एवम व्यथा
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| उत्तराखंड लोकजीवन में पहाड़ी महिलाओं की दिनचर्या |
पहाड़ी लोकजीवन में पर्वतीय नारी की गाथा बहुत ही दयनीय सोचनीय एवम विचारणीय थी ,बहुत समय पहले जब 10-12 साल की कन्याओं की शादी कर देने का चलन था,उस समय कन्याओं का विवाह किसी भी अधेड़ उम्र,रण्डवा एवम जिसकी केवल कन्याएं ही होती थी इनको खरीद कर ले जाते थे अपनी उम्र से अधिक पति से उन्हें कैसा गृहस्थ जीवन मिलता होगा इसकी कल्पना करना भी मुश्किल है। मजबूरी में जंगलों से घास लकड़ी,इकट्ठी करने के लिए चट्टानों भेल भंगारो व पेड़ों से गिरकर आहत होने या नदी नालों में बह जाने तथा जंगली जानवरों के हमला करने आदि घटनाए भी असामान्य नहीं थी । घर में सास ननद का सौतेला व्यवहार और भी कई तरह की प्रताड़नाएं सहती थी इस प्रकार से पर्वतीय महिलाओं का जीवन संघर्ष,संकटों से जूझते हुए एवम दुखद स्थितियों से गुजरता था । उनकी व्यथा कभी उनके खुदेड़ और करुणा भरे गीतों में सुनने को मिलती थी।
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पहाड़ी नारियों की भूमिका इतनी विविधात्मक रही है कि उनके विषय मे परिकल्पना करना कठिन है। नारी की विभिन्न समाजों में इनका मूल्यांकन समाज विशेष में परम्पराओं द्वारा ,आजीविका के साधनो मे नारी की उपयोगिता पारिवारिक जीवन मे उसके योगदान ,एवम बच्चों के लालन पालन में उसकी भूमिका के आधार पर किया जाता था। जबकि सच्चे अर्थों में नारी पुरुष की अर्धांगिनी ही नहीं बल्कि उसकी श्रेष्ठ सहगामिनी होती है। और यह उपाधि पुरुष या समाज की कृपा से नहीं बल्कि स्वयं उसने अपने बर्चस्व,बलिदान, और समर्पण भाव से अर्जित की है। तो ये था हमारा आज का ब्लॉग जिसमे हमने पहाड़ी महिलाओं की संघर्षमय जीवनशैली के बारे में विस्तार से वर्णन किया, आशा है कि आपको ये ब्लॉग अवश्य ही पसंद आया होगा । उत्तराखंड लोकजीवन से संबंधित हमारे सभी ब्लॉगों को पढते रहिये और हमें फॉलो भी अवश्य करें।
धन्यवाद
A.K Gudiyal Uttarakhandi






