उत्तराखंड लोकसंस्कृति का अतीत
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| उत्तराखंड लोकसंस्कृति का अतीत |
पौराणिक या वैदिक संस्कृति
वैसे तो उत्तराखंड की विभिन्न लोक संस्कृतियों को किसी वर्ग जाति या सम्प्रदाय की सीमाओं में बांधना अनुचित भी है और असम्भव भी ,क्योंकि पुरातन काल से ही न जाने कितने वर्ग जाति और सम्प्रदाय के लोगों ने यहाँ पर निवास किया होगा जोकि समय के साथ विलीन होते चले गये हों,लेकिन अपनी कुछ खास पहिचान के कारण किसी न किसी धूंधले रूप में बच गये होंगे । न जाने कितने यक्ष, गन्धर्व,किन्नर आदि देवजातियों की एकमात्र निवास भूमि माने जाने वाला यह क्षेत्र इतिहास के विभिन्न स्तर पर कई कारणों से अलग अलग वर्ग का अधिकार क्षेत्र बनता गया।
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प्रागैतिहासिक काल से आज तक इस प्रदेश पर विभिन्न जातियों का आगमन होता रहा, जो अपने साथ अपनी सांस्कृतिक विरासतों को भी लाती रहीं,ऐतिहासिक काल में ही यहां पर शक, हूण, कोल, किरात, मंगोल, यवन, खश, आदि पर्वतीय जातियों के अतिरिक्त मध्यकाल में अनेक मध्यपूर्व, पश्चिम एवं दक्षिण के अनेक वर्गों का सामूहिक रूप में अथवा विरल रूप में आगमन बराबर होता रहा। वे लोग निश्चित ही अपने साथ अपनी क्षेत्रीय, सामाजिक एवं सांस्कृतिक परम्पराओं को लेकर आये, इसी कारण उत्तराखंड पर विभिन्न जातियों एवम उनकी संस्कृतियों का आगमन हुआ होगा।
धार्मिक संस्कारों पर आश्रित लोकसंस्कृति
प्रत्येक समाज मे कुछ न कुछ विशिष्ट संस्कार प्रचलित होते हैं जोकि इस समाज के गठन मान्यताओं और जीवन दर्शन दृष्टिकोण को स्पष्ट करते हैं। इन संस्कारों के साथ एक तरफ से समाज की भौगोलिक,आर्थिक एवम परम्परागत आवश्यकताएं जुड़ी रहती हैं। और दूसरी तरफ़ इनमे आस्था,श्रद्धा और विश्वास भी विद्यमान होते हैं।जो कि समाज को एक सांस्कृतिक समरूपता के बंधन में बांधे रखते हैं। अन्य समाज की तरह ही उत्तराखंड के समाज मे भी लोकसंस्कृति के सर्वाधिक विशेष महत्वपूर्ण रूप को देखा जा सकता है।
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उत्तराखंड के मूल निवासियों के धार्मिक अनुष्ठान एवम संस्कार कैसे थे, उनकी जानकारी केवल यहां की ख़श एवम किरात वर्ग के लोगों के समाज में चलती आ रही परम्पराओं में मिल सकते हैं या किसी ऐसे लेखक की लेख में जिसने अपने लेखों में उत्तराखंड लोकजीवन और उत्तराखंड देवजातियों के बारे विस्तार से लिखा हो। लेकिन धार्मिक संस्कारों का जो रूप यहां के लोगों के समाज मे देखा गया या देखा जाता है थोड़ा उसकी संक्षिप्त जानकारी देना चाहेंगे।कर्मकांडीय संस्कार पद्धतियों में जो सोलह संस्कार हैं, जोकि जन्म से लेकर मरण तक जो भी सँस्कार मुख्य रूप से किये जाते हैं ,उन संस्कारों के बारे में जानकर इस प्रकार से दी गई हैं।
जन्म संस्कार
इस संस्कार में शिशु जन्म से लेकर नामकरण संस्कार तक 10,11 दिन का अछूत माना जाता है। इस प्रसव काल मे शिशु एवम प्रसूता को अछूत माना जाता है।
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इन 10 दिनों के पश्चात गयारहवें दिन नामकरण संस्कार किया जाता है। इस दिन से प्रसुता एवम शिशु को अछूत नहीं माना जाता हैं।
अन्न प्राशन
यह सँस्कार पांचवें और सातवे महीने में संम्पन्न किया जाता है। और कहीं कहीं छठवें महीने में भी किया जाता है इस दिन शिशु को स्नान कराने के बाद सर्वप्रथम मामा के लाये हुए नए कपड़े पहनाते हैं। उसके बाद ही शिशु के माता पिता के द्वारा लाये गए नए वस्त्र पहनाये जाते हैं।
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इस दिन अन्न प्राशन के निमित घरमे खीर,व विभिन्न प्रकार के पकवान बनाये जाते हैं और फिर शिशु की माता उसे मामा के लाये गए नए वस्त्र एवम शिशु आभूषण पहनाकर उसे गोदी में बिठाकर अन्न प्राशन की प्रक्रिया पूर्ण करती है।
चूड़ाकर्म सँस्कार
यह संस्कार शिशु के तीसरे,या पांचवें साल में किया जाता है।चूड़ा कर्म सँस्कार से एक दिन पहले की रात्रि को एक अनुष्ठान के साथ पीले वस्त्र के टुकड़ों में सुपारी पैसे एवम हल्दी चावल बांधकर बालों में पाँच चोटी बनाकर उसमे पीले वस्त्र के टुकड़ों की पोटली बांधी जाती है।
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और उससे अगले दिन विधि विधान के साथ बालों को उतारा जाता है। इन बालों को काटकर किसी जलस्रोत सिमार नदी या किसी तीर्थस्थल में विसर्जित किया है । इसके बाद जो मुख्य सँस्कार होता है वह है विवाह संस्कार जो कि आम बात है इस सँस्कार के बारे में आजकल सभी लोग जानते है । विवाह संस्कार अलग अलग क्षेत्रों के अनुसार अलग अलग रीति रिवाजों के साथ थोड़ा बहुत अंतर हो सकता है।
विवाह संस्कार
क्योंकि विवाह संस्कार खुशी,और हर्षोल्लास के साथ किया जाने वाला सँस्कार है इसलिए इस संस्कार की तैयारियां काफी दिनों पहले से शुरू हो जाती है। जैसे कि लड़के और कन्या की दोष रहित कुंडली को देख भाल कर चयन के बाद सगाई या मंगनी के बाद शुभ मुहूर्त में विवाह का दिन निकालना और कुछ दिन पहले से ही शादी व्याह की तैयारियां शुरू हो जाती थी ।
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उत्तराखंड में पहले जमाने मे किस तरह से तैयारियां होती थी और कैसे विवाह संपन्न होता था।अभावग्रस्त जीवन मे कैसे शादी व्याह का कार्यक्रम सम्पन्न होता था ,हम इसको पूरे विस्तार से अपने आने वाले ब्लॉग में बताएंगे।
मृतक सँस्कार
उत्तराखंड के निवासियों की विभिन्न सांस्कृतिक पृष्ठभूमियों के कारण इसके तौर तरीकों के संदर्भ में पोषित परम्पराओं में अनेक प्रकार के भेद देखे जाते हैं,जिनका विवरण बड़ा मुश्किल है किंतु साहित्यों और जनश्रुतियों के अनुसार जो जानकारी प्राप्त हुई उसके बारे में संक्षेप में बता देते हैं। गढ़वाल कुमाऊं की लोक परम्परा में ऐसा देख गया है कि जब किसी व्यक्ति की रोग या वृद्धावस्था से होने वाले मृत्यु काल से करीब होने पर मृतक के हाथ मे गाय की पूंछ पकड़ाकर स्वर्ग मार्ग में पड़ने वाली वैतरणी नदी को पार कराने की भावना से दस वस्तुओं का दान कराया जाता है तथा प्राण रहते रहते ही उस व्यक्ति को चारपाई से उतारकर जमीन पर लिटा दिया जाता था। और उसके मुंह मे गंगाजल डाला जाता था तथा मृत्यु हो जाने पर उसके नाक कान मुंह में सोने के छोटे छीटे से टुकड़े डाल दिये जाते थे उसके बाद उसे स्नान करने के बाद उसके शरीर पर घी चन्दन का लेप करने के बाद अंत्येष्टि या दाह संस्कार के लिए शमशान अर्थी में ले जाया जाता है।
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उसके बाद माफी सारी औपचारिकताएं पूर्ण की जाती हैं। उसके बाद शुद्धिकरण की प्रक्रिया में दसवें दिन से शुरू होकर बारहवें सपिंडीकरण एवम पिपलपानी तेरहवें दिन पर पूर्ण होती है। जो परम्परा अभी तक भी अस्तित्व में है। इस प्रकार उत्तराखंड में इन सोलह संस्कारों में जो मुख्य सँस्कार होते हैं उनकी आपको आज के ब्लॉग में जानकारी मिली ।
धन्यवाद
A.K Gudiyal Uttarakhandi


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