उत्तराखंड में देवी देवताओं की अवधारणा

 


         उत्तराखंड में देवी देवताओं की अवधारणा


उत्तराखंड में देवी देवताओं की अवधारणा

उत्तराखंड में देवत्व की अवधारणा को लेकर देवी-देवता संबंधी आस्था का भी महत्त्वपूर्ण स्थान होता है। कोई भी वस्तु जो अपनी चमक को अभिव्यक्त करती है अर्थात कोई भी वस्तु जो अपनी चमक को व्यक्त करती है और अलौकिकता का प्रतीक है । इसी के फलस्वरूप वैदिक युग में देवत्व की अवधारणा  में सूर्य, चन्द्र, अग्नि, मरुत आदि को देवता कहा गया है। किन्तु बाद में पौराणिक युग में इस शब्द से उन पराशक्तियों का भावबोध किया जाने लगा जिनकी दिव्यता की संकल्पना ब्रह्मा, विष्णु, महेश आदि के रूप में की गयी। जिसे सरलता एवं विभिन्न प्राकृतिक शक्तियों से अपनी सुरक्षा की भावना से ग्रस्त आदिम मानव ने देवत्व के रूप में स्वीकार करके अपने लिए मंगलकारी शक्ति के रूप में मानकर उसकी पूजा-आराधना प्रारम्भ कर दी और जो मनुष्य एक बार इस प्रभाव के अन्तर्गत आ गया फिर तो वह क्या उसकी आने वाली सन्तानें भी कभी उससे मुक्त नहीं हो सकीं। देववाद की यह विश्वव्यापी कहानी बराबर इसी रूप में चली आ रही है। इसके दृश्यमान रूप भले ही भिन्न- भिन्न क्यों न हों।


उत्तराखंड में देवी देवताओं की अवधारणा


 उत्तराखंड में देवी देवताओं की अवधारणा की शुरुआत 

उत्तराखण्ड के लोक जीवन  में देवी या देवता या ईश्वर शब्द की संकल्पना वही नहीं थी  जो कि पौराणिक संदर्भों में पायी जाती है। वह किसी पौराणिक देवी-देवता या ईश्वर के समान शक्तिमान्, निराकार, निर्विकार, अलौकिक आदि नहीं है। उसका अपना एक मानवीय रूप होता है, उसका प्रभाव एवं प्रभुत्व जाति या वर्ण  विशेष परम्परागत इतिहास एवं विशेष पूजा पद्धति का विधान होता है उनकी जीवनगाथा उन्हें मानने वाले  लोगों से अलग होती है उन्ही  समान वे दुखी  प्रसन्न होते हैं उनकी अपनी भाषा में की गयी आराधना या प्रार्थना सुनते, समझते एवं इसके अतिरिक्त  इसकी देवत्व की भावनाओं को उजागर करने में सक्रिय भूमिका निभाता है, वह है यहां का प्राकृतिक परिदृश्य। जो इसके प्राकृतिक तत्वों नदी ,पर्वत ,वृक्ष ,जलस्रोत आदि को देवत्व का महत्व प्रदान कर रहा है इस संदर्भ में उल्लेख किया गया है कि यह किसी मानव के द्वारा किसी अज्ञात देवशक्ति में वृक्ष, जलस्रोत आदि को देवत्व का महत्त्व प्रदान करता रहा है। इस संदर्भ में दिया जाने वाला सम्मान नहीं बल्कि  उन शक्तियों के प्रति श्रद्धा कृतज्ञता की अभिव्यक्ति का रूप है जिसकी परम्परा यहां पर आदिकाल से तक निरन्तर से चली आ रही है। यह किसी अज्ञात शक्ति के प्रदर्शित की जाने वाली किसी अन्य अन्ध आस्था एवं श्रद्धा  की परिणति न होकर जीवनदायी महत्त्व के प्रति सोच-समझ कर के अभिव्यक्त की जाने वाली श्रद्धा की विपरिणति  है 


उत्तराखंड में देवी देवताओं की अवधारणा

इस संदर्भ में यह भी सर्वविदित है कि भोला लोकमानस अपनी असुरक्षा की भावना के कारण किसी अनपेक्षित संकट से बचे रहने एवं सुरक्षा की कामना से बिना किसी तर्क-वितर्क के उसके अपने समाज द्वारा संकल्पित अलौकिक दिव्य शक्तियों तथा उनकी  मंगलकारी शक्तियों को सत्ता को स्वीकार करके उन्हें सन्तुष्ट किये रखने के उपायों को अपना लेता है। चाहे उनका रूप कुछ भी हो सकता है। अतः व्यक्त है कि जनमानस की दैवी शक्तियों सम्बन्धी संकल्पनाओं के अनुसार ये दिव्य शक्तियां जहां एक ओर क्रुद्ध होने पर अनेक प्रकार की पीड़ाओं, दुःखों, संकटों तथा विपत्तियों का पहाड़ ढहा देने का सामर्थ्य रखती हैं वहीं दूसरी ओर नियमित रूप में पूजा-आराधना आदि किये जाने पर सभी प्रकार के सुखों एवं समृद्धि की वर्षा भी कर सकती हैं।  

पर्वतीय लोक संस्कृति के कुल देवता'तथा इष्टदेवता'

इसके अतिरिक्त यहां के लोकजीवन की दैवी संकल्पना के सम्बन्ध में यह भी उल्लेख  किया गया है  कि उनकी महत्तम देव शक्ति का रूप है उनका 'कुल 'देवता' तथा 'इष्टदेवता', जिसका अपना एक विशिष्ट रूप एवं प्रभाव क्षेत्र होता. है। अतः देखा जाता है कि प्रत्येक परिवार का अपना एक विशिष्ट कुलदेवता तथा इष्टदेवता होता है जिसका अपना स्थान अथवा महत्त्व अन्य सभी स्थानीय एवं पौराणिक देवी-देवताओं से उच्च होता है। इनके अपने विशिष्ट रूप एवं भूमिकाएं होती हैं। इनके आराधकों की मान्यता होती है कि प्रसन्न एवं संतुष्ट रहने पर यह उनके दोपाये (मनुष्य), चौपाये (पशु) एवं कृषि की रक्षा व समृद्धि करता है और रुष्ट होने पर जन, धन, पशु आदि सभी की हानि कर देता है। इसके कोप का परिहार करने अथवा इन्हें संतुष्ट रखने के लिए किसी पौराणिक देवी देवता के समान विशेष पर्वों एवं तिथियों पर व्रत, पूजा, आराधना के साथ भजन कीर्तन करने की नहीं, अपितु जागर, घड़ियाला के माध्यम से उसके धामियों अथवा पस्वाओं में अवतरित करा कर उनके आदेशानुसार बलिपूजा आदि से संतुष्ट करने की आवश्यकता होती है।


उत्तराखंड में देवी देवताओं की अवधारणा

इसके अतिरिक्त यहां के पर्वतीय जन समुदाय की दैवी आस्था के विषय में यह भी  उल्लेख  है कि ये पौराणिक देवी-देवताओं के समान अलौकिक एवं अमानवीय नहीं हैं। इनके उपर्युक्त प्राकृतिक रूपों के अतिरिक्त मानवीय रूप भी होते हैं, जो स्वयं में अलौकिक विभूतियां न होकर इसी समाज से सम्बन्ध रखने वाली आत्माएँ होती हैं। इनमें से अधिकांश का इतिहास बताता है कि ये अपनी क्षेत्रों की असाधारण विभूतियां हुआ करती थीं, जो अपने अद्भुत साहसिक कृत्यों एवं जन कल्याणकारी कार्यों के कारण जनता में देवता के समान पूजनीयता को प्राप्त हो गयीं थीं और मृत्यु के उपरान्त भी कृतज्ञ जनता उन्हें देवता का सम्मान देती रही हैं। उनकी मान्यता है कि उनकी दिवंगत आत्माओं को उनके अपने माध्यमों  धामी या पस्वा आदि के माध्यम से विभिन्न समस्याओं के समाधान के लिए साक्षात् रूप में आमंत्रित किया जा सकता है। उनके साथ वाद-विवाद करके समस्याओं के कारणों को तथा उनके निराकरण के उपायों को जाना जा सकता है। इस माध्यम से  सभी प्रकार की विपत्तियों का निराकरण किया जा सकता है। इनके अपने प्रभाव क्षेत्र होते हैं। जिनमें वे साक्षात् रूप से अपने आराधकों के सुख-दुःख के सहभागी होते हैं।,वाद-विवाद कर सकता है। वह अपन उनसे प्रतिवेदन कर सकता है। अपने लिए न्याय की व अपराधी को दण्डित किये जाने की याचना कर सकता है। वह अपने सभी प्रकार के कार्यों सुख-दुःख,रोग-संकट, लड़ाई-झगड़ा आदि में उससे सहायता की आशा रखता है। उल्लेख्य है कि उसका देवता ही उससे रुष्ट नहीं होता, कभी-कभी वह स्वयं भी उससे रुष्ट हो जाता है, उसे धमकी दे सकता है। पर साथ ही हाथ जोड़कर सिर झुका कर अपनी गलतियों के लिए उससे क्षमा याचना करके उसे प्रसन्न भी कर लेता है। ऐसा घनिष्ठ व्यक्तिगत सम्बन्ध होता है उसका अपने देवता के साथ, जो कि किसी पौराणिक का मिथकीय देवता के साथ नहीं हो सकता ।



उत्तराखंड में देवी देवताओं की अवधारणा

इस संदर्भ में देखा गया है कि कदम-कदम पर प्राकृतिक संकटों के बीच जीवन यापन करने वाला उत्तराखण्ड का पर्वतीय जनमानस पौराणिकों द्वारा संकल्पित अदृश्य दैवी शक्तियों की अपेक्षा प्रत्यक्ष दृश्यमान दैवी शक्तियों के प्रति अधिक आस्थावान् होता है। विकंपित किये रखने में कोई कोर कसर नहीं छोड़ती थीं। अतः स्वाभाविक है कि ऐसी स्थितियों के बीच जीवनरक्षा के लिए उसकी अन्तरात्मा किसी ऐसी शक्ति का आश्रय पाने के लिए आकुल हो उठती होगी जो कि उसके चारों ओर निरन्तर मुंह बायें खड़ी इन प्राकृतिक विपदाओं से उसकी, उसके पशुधन की अथवा भोज्य सामग्री की रक्षा कर सके। क्योंकि इनमें से किसी पर भी अधिकार पाना अथवा अपने ही बलबूते पर उनसे अपनी रक्षा कर पाना स्वयं उसकी अथवा उसके अपने स्वर्गीयजनों की शक्ति से बाहर था। ऐसी स्थिति में सर्वथा अनुमेय है कि जहां एक ओर प्रकृति की उपर्युक्त मोहक पृष्ठभूमि ने उसके भावुक मानस को आनन्दोद्वेलित कर उसकी अभिव्यक्ति के रूप में उसके कंठ को उल्लासपूर्ण गीतों का स्वर प्रदान किया होगा तथा उसके थके-मांदे पैरों को स्फूर्ति प्रदान की होगी, वहीं दूसरी ओर उसे प्रकृति के उपर्युक्त विकराल रूपों के परिप्रेक्ष्य में असहाय एवं असुरक्षित होने की अनुभूति भी करायी होगी जिसने कि उसे बरबस किसी रक्षक का आश्रय खोजने के लिए प्रेरित किया होगा।
 


उत्तराखंड में देवी देवताओं की अवधारणा


साथ ही प्राकृतिक तत्वों की संरचना एवं उनके प्रकार्यों के सम्बन्ध में वैज्ञानिक दृष्टिकोण के विकास के अभाव में निश्चित ही उसे वे सारे प्राकृतिक तत्व तथा उनसे सम्बद्ध घटनाएं अतिमानवीय प्रतीत होने से उसने अपने प्राणों की रक्षा के लिए उनके समक्ष नतमस्तक होकर उनमें देवत्व की स्थापना कर डाली होगी। इसके लिए उसे न किसी मूर्ति की आवश्यकता थी और न किसी देवालय की। इस रूप में उस अलौकिक महाशक्ति का आवास स्थान घर के एक कोने से लेकर या हिमालय के उच्चतम शिखर तक कहीं भी हो सकता था। अतः कहा जा सकता है कि इस देवत्व के विकास की पृष्ठभूमि में जिन दो मानसिक वृत्तियों का प्रमुख योगदान रहा होगा वे होंगी विपत्तियों से त्राण तथा सुरक्षा की भावना। यहां के पर्वतीय मानव की दृष्टि में प्रकृति के सभी रूप दिव्यरूप एवं आराध्य थे।

बलिप्रथा  की दैवीय स्वीकृति 


उत्तराखंड में देवी देवताओं की अवधारणा

उत्तराखण्ड के सभी क्षेत्रों तथा समाज के सभी वर्गों में बलि का प्रचार व्यापक स्तर पर रहा है। किन्त बलि चढ़ाने से पूर्व बलिपशु के सम्बन्ध में देवता की स्वीकृति लेना आवश्यक माना जाता है। प्रस्तुत बलिपशु के लिए देवता की स्वीकृति है या नहीं इसे जानने के लिए उसे गन्धाक्षत करने के बाद या तो उसके ऊपर पानी के छींटे डाले जाते हैं, इस पर यदि वह शरीर को बरबरा कर उन्हें झाड़ देता है तो इसे देवता की स्वीकृति मान कर उसकी बलि चढ़ा दी जाती है। स्वीकृति का उपर्युक्त रूप में संकेत न मिलने पर उसके कान में पानी की बूंदें डाली जाती हैं। इस पर यदि वह कानों को फड़-फड़ाता है तो इसे भी स्वीकृति माना जाता है। कहीं इस स्वीकृति का संकेत पाने के लिए उसकी पीठ पर ज्यूंदाल या चावल भी डाले जाते हैं। इस पर यदि वह पैरों को टिका कर जोर से शरीर को कंपा कर उन्हें गिरा देता है तो उसे भी देवता की स्वीकृति मान कर उसकी बलि चढ़ा दी जाती है। 

                            धन्यवाद

          A.K Gudiyal Uttarakhandi



Uttarakhand Gyan

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