उत्तराखंड लोकजीवन के भोजन व्यंजन







उत्तराखंड लोकजीवन के भोजन व्यंजन




उत्तराखंड लोकजीवन के भोजन व्यंजन




 वैसे तो भोजन और जल सम्पूर्ण जगत के प्राणियों को जीवित रहने  के अति आवश्यक है। परन्तु मानव जीवन से सम्बद्ध विषय मे भोजन का अपना एक विशिष्ट स्थान होता है। तथा इससे  सम्बन्धित वस्तुओं का नाम रूप एवम बनाने की कला क्षेत्र की भौगोलिक,और प्राकृतिक स्थिति पर भी निर्भर करता है। जिनमे कुछ प्रकृति द्वारा दिए गए अन्न,फल ,कन्दमूल एवम शाकों के अनुरूप भी होती है। वैसे  ही उत्तराखंड लोकजीवन के  अभावग्रस्त जीवन में  स्थानीय जलवायु ,भौगोलिक  स्थिति एवम प्रकृति द्वारा प्राप्त,एवम स्थानीय उपलब्धता के अनुसार यहां भोजन  बनाने के अलग अलग  तौर तरीके थे।


उत्तराखंड लोकजीवन के भोजन व्यंजन



उत्तराखंड लोकजीवन में भोजन तथा व्यंजनों के 36 छत्तीस प्रकारों का वर्णन लोकगीतों एवम लोकगाथाओं में मिलता है। परंतु  इन भोजन व्यंजनों का विस्तार पूर्वक वर्णन करना असम्भव है।  परन्तु इन भोजन व्यंजनो में कुछ कुछ गिने चुने व्यंजन इस समय भी बनते हैं। लेकिन जहां तक बात यह के लोकजीवन की हो तो यहां की निर्धन जनता जिसे पहले भरपेट मोटा अन्न  भी नसीब नहीं होता था। वे लोग किसी तरह अपना गुजर बसर करते थे।
उत्तराखंड लोकजीवन के भोजन व्यंजन



परन्तु वर्तमान में विभिन्न प्रकार के भोज्य पदार्थ एवम पेय पदार्थों के अस्तित्व में आ जाने से उत्तराखंड के परम्परागत भोज्य पदाथों के उत्पादन  मोटे अन्न जैसे कोदा,झंगोरा,मुंगरी,चुवा, गहत,सोयाबीन भट्ट,काला भट्ट,ब्रह्मी भट्ट आदि के स्थान पर नकदी फसल फल सब्जी पर अधिक ध्यान देने से  परम्परागत भोज्य पदार्थों में उदासीनता आ रही है।


उत्तराखंड लोकजीवन के भोजन व्यंजन


उत्तराखंड लोकजीवन में भोज्य पदार्थों के विभिन्न रूपों में काम आने वाले अन्न,दालें, एवम शाकों  के नाम इस तरह से हुआ करते थे। धान्य फसलों में ,गेंहू,जौ,धान,मक्का,मुंगरी,झंगोरा,कोदा एवम कौणी आदि थे,शाकों में कंडाली,चुवा,बथुआ,ओगल,पालक,राई,मूली की पत्तियां,पाफड़,टुकरु सीताफल के फल इसकी पत्तियां,लिंगोड़ा,आदि शाक थे। दालों में उड़द, भट्ट, गहत ,सोयाबीन ,लोभिया,छीमी,रयांस, काले भट्ट,लाल भट्ट,मसूर,मटर आदि,होती थी इसके अलावा गांवों में निर्धन लोगों के भोज्य पदार्थों में खाद्यान्नों के अतिरिक्त शाक, फल,और कन्द मूल का विशेष महत्व होता था।और शाकों में पॉज,बथुआ, ओगल, चौलाई चुवा मरसा, मेथी,पिण्डलु,गडेरी,टोरी,चिचिंडा,बैंगन, पेठा,मूली एवम कंडाली,पाफड़ सेमल के फूल,सकीना के  फुल सेम अरबी आदि  को शाक के रूप में इस्तेमाल करते थे तथा इन सभी की मौजूदगी में यहां के लोग अपने भोजन व्यंजन बनाते थे। वनज शाको में शतावरी की कोंपले, लिंगुड़ा,च्यूं, तिमला के कच्चे फल,गीठी ,तैड़ू,जिमीकन्द,आदि।फलों में  खाद्य पदार्थो में प्रयोग होने वाले केला नारंगी,दाड़िम अनार,आम,अखरोट, बिजौरा, आड़ू, चोल आरू, सेब नासपाती, खुमानी एवम वन्य या  गांवों के नजदीक की भूमि में  बेडु, तिमला, हिसालू, किलमोडा ,काफल, जामुन, बेर,मेलु,घिंघोरा, फल,शाक एवम दालें होती थी। 

उत्तराखंड लोकजीवन के भोजन व्यंजन


गढ़वाल क्षेत्र में ग्रामीण लोगों के नित्य भोज्य पदार्थों में मंडुवा, चौन्सा, पल्यो,झोली,मंडुवे की बाड़ी, भटवाणी, गैथवानी,फाणु, मांड,काफली,भरण्या रोटी,खाजा, मुंगरी की रोटी,थिंचवाँणि, कछमोली, फ़फ़रोला,रोटाना,अरशा, चैंसु, गथवानी, लप्सी, सत्तू, बाड़ी ,गंजुड़ आदि  भोजन व्यंजन थे।  


उत्तराखंड लोकजीवन के भोजन व्यंजन


कुमाऊँ मण्डल में  कुछ भोज्य पदार्थ ऐसे हैं जो कि आधुनिकता की दौड़ में बहुत पीछे रह गए  परन्तु जो कुछ भी भोज्य पदार्थ  अभी चलन में हैं उनमे  चुड़कानी,ठाटवाणी,डुबुक,कापा, राजड़ी, गहत उड़द की बड़ी,पलयो झोली,कड़ी,गुनुवा, मक्की का दलिया, अख्वाड़ी,बेडवा  (उड़द की दाल भरवा रोटी),लसूड़ा भरवा रोटी,ऊमी, खाजा,तिल के लड्डू, च्युड़ा, गुड़ एवम शहद से बने मिष्ठान,छवाला रोटी  नित्य भोजन व्यंजन थे । 


उत्तराखंड लोकजीवन के भोजन व्यंजन


उत्तराखंड लोकजीवन के उस जमाने मे लोग मंडुवे की रोटी ,कौणी की रोटी ,कंडाली की भुज्जी,टुकुरु  पाफड़ की भुज्जी,फ़ाणु,झोली,झुंगर, कौणी बाड़ी आदि भोज्य पदार्थों का नित्य भोजन व्यंजन थे । विकास की विभिन्न योजनाओं के अंर्तगत हो रही आर्थिक  उन्नति के फलस्वरूप परिवर्तित होती जा रही है। आधुनिक परिस्थितियों में यहां के परम्परागत भोज्य पदार्थों एवम उनके उत्पादनों का बड़ी तेजी के साथ विलुप्तीकरण होता जा रहा है। आधुनिकता की भागम  भाग में हमारी आने वाली पीढ़ी को शायद ये पता भी नहीं रहेगा कि हमारे दादा पड़दादा किस तरह का अभावग्रस्त जीवन जीते थे।

                                                                             धन्यवाद 

                                                          A.K Gudiyal Uttarakhandi


Uttarakhand Gyan

i am a blog writer uttarakhand folk lifestyle, folk culture, tradition, dress, ornaments, folk modesty, customs, folk songs, folk dances, rituals, lifestyle, farming, animal husbandry, mutual brotherhood, sense of cooperation and dedication towards each other,

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