उत्तराखंड में नैतिकता एवम शिष्टाचार
उत्तराखण्ड के लोकजीवन का महत्त्वपूर्ण तत्व है शिष्टाचार। सर्व विदित है कि विश्व के सभी मानव समाजों में शिष्टाचार सम्बन्धी अनेक सामान्य-विशेष रूपात्मक विधान होते हैं। यों तो मानव वर्ग विशेष का सम्पूर्ण लोकजीवन ही इनका प्रयोग क्षेत्र हुआ करता है, किन्तु प्रत्येक समाज में इनके कुछ रूप ऐसे भी होते हैं जो कि किसी समाज विशेष का अथवा क्षेत्र विशेष का प्रतिनिधित्व करते हैं तथा उस समाज में अपना एक विशिष्ट स्थान रखते हैं।
नैतिकता में विश्वास
उत्तराखंड के विषय में यह तो सर्व विदित है कि पिछले कुछ दशक पूर्व तक यहां के ग्रामीण लोग अपने घरों में ताला नहीं लगाते थे। यहां तक कि शीतकाल में नीचे के भावरी एवं तराई के क्षेत्रों में घर से बाहर जाने वाले लोग भी घरों पर ताला लगाये बिना ही कई महीनों तक अपने घरों को वैसे ही छोड़ जाया करते थे। क्योंकि चोरी करना अपराध ही नहीं अनैतिकता भी समझा जाता था। इस सम्बन्ध में उल्लेख किया गया है कि यहां के पूर्वी व्यवसायी जब व्यापार करने के लिए निचले क्षेत्रों में जाते थे तो अपना अतिरिक्त सामान महाकाली के तट पर स्थापित कुचिया देव गुफा में रख जाते थे, और लौटने पर उसे ले जाते थे। इसी प्रकार जब अपना सामान बेचकर घरों को लौटते थे, तो अपने बचे हुए सामान को यहीं पर रखकर अपने घरों को चले जाते थे। फिर बाद में आवश्यकतानुसार उसे ले जाते थे। वहां पर कोई रखवाला नहीं होता था। एक व्यक्ति के रखे हुए सामान को कोई अन्य व्यक्ति छूता भी नहीं था। इसी प्रकार जब वे लोग जंगलों में घास,लकड़ी के अतिरिक्त बोझे को वहीं छोड़ना होता था, तो वे उसके ऊपर पत्थर के दो टुकड़े रख कर आ जाते थे ।और रखा हुआ कोई भी सामान सुरक्षित वहीं पर मिलता था ,उसी प्रकार किसी से लेना देना कर्जे को गुप्त रूप से लेना और फिर वापस कर देना, और पूरा गांव अपनी बहू बेटियों को अपनी बेटी समझता था । प्रेम प्रसंगों की तो बात भी नहीं सुनी जाती थी सभी लोग बेझिझक बिना आशंका के अपनी बहू बेटियों को एक दूसरे के घर भेज देते थे।
रिश्ते नातों में शिष्टाचार
उत्तराखंड लोकजीवन की सांस्कृतिक परिधि में नाते-रिश्ते के सम्बन्धों की वरीयता का आधार आयु नहीं, अपितु नाते-रिश्ते का सम्बन्ध हुआ करता था। यहां पर देवर, ननद, भांजा भानजी, दामाद, चाचा,चाची मौंसी आदि सम्बन्धियों को आयु में कनिष्ठ होने पर भी सम्मान जनक शब्दों से सम्बोधित किया जाता है। दामाद ,मामा और भानजे को तो आदरणीय ही नहीं पूज्य भी माना जाता है। धार्मिक अनुष्ठानों के संदर्भ में इन्हें वही स्थान दिया जाता है जो कि ब्राह्मण पुरोहित को दिया जाता है। महिलाएं अपने से सभी नाते-रिश्ते तथा आयु में बड़ी उम्र के व्यक्ति के पैरों में झुककर पैलागन करती हैं। बहुएं पैलागन करते समय अपने जेठ का स्पर्श नहीं करती हैं।उत्तराखंड में यदि कोई विवाहिता स्त्री किसी के घर में चली जाय या आमंत्रित की जाय तो उसके सम्मान में कढ़ाई चढ़ती है पूरी ,पकोड़े एवं अन्य पक्वान्न बनाया जाता है और उसे इस रूप में विशेष सम्मान दिया जाता है। जाते समय कुछ न कुछ शगुन के रूप में भी दिया जाता है। सामान्यतया वहां पर कोई विवाहिता महिला बिना किसी विशेष काम के एवं बिना बुलावे के किसी अन्य व्यक्ति के घर नहीं जाती थी। घर की औरतों का अपने से बड़े व्यक्तियों या बाहर वाले व्यक्तियों के सामने बैठना या खड़ा होना अशिष्ट माना जाता था। और अपने बड़ों के नाम का मिलता जुलता नाम या कोई वस्तु का नाम भी नहीं लेते थे एवं अपने या पराये घर में जेठ या ससुर की चारपाई में बैठना ,सोना,अपने से बड़ों के नाम की किसी भी चीज का नाम नहीं लेना शिष्टाचार के खिलाफ माना जाता था। जेठ के सम्बन्ध में तो माना जाता है कि वे परस्पर उस आसन ,चटाई, दरी का भी स्पर्श नहीं कर सकते जिस पर कि उनमें से कोई बैठा या खड़ा हो।
किसी पुरुष या स्त्री का वरिष्ठ जनों के सम्मुख नंगे सिर जाना ,नंगा सिर का रखना न केवल अशिष्टता का, अपितु अमंगल का भी सूचक समझा जाता था। स्त्रियों का पर पुरुषों के समक्ष पर्दा करना आवश्यक न होने पर भी शिर को ढके रखना उनकी शिष्टता एवं शालीनता का अंग माना जाता था। पुरुष भोजन और शयन काल के अतिरिक्त हमेशा सिर को टोपी या पगड़ी पहनते थे। स्त्रियां तो किसी भी स्थिति में पुरुषों के समक्ष बिना सर ढके नहीं जाती थीं। विवशता की स्थिति में और कुछ उपाय न होने पर दोनों हाथ रख कर उनसे ही सिर पर रख लिया करती थीं। शिष्टाचार के नाम से हमेशा सर ढकने का का यह आचरण स्वास्थ्य रक्षा का एक अप्रत्यक्ष विधान हुआ करता था।
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अतिथि सत्कार सम्बन्धी शिष्टाचार
उत्तराखण्डी समाज अपनी अतिथि सत्कार की भावना के लिए विख्यात रहा है। यहां जो भी बाहर से आया उसका स्वागत ही किया गया। यही कारण है कि पिछले समयों में यहां पर विदेशों, भारत के विभिन्न प्रदेशों एवं नेपाल, तिब्बत आदि से आने वाले सभी वर्गों, जातियों व धर्मों के जो भी अनुयायी आये सभी को इस भूमि में स्थान दिया जाता रहा। पिछले समयों में जब ये लोग अति निर्धन होते थे और सीमित साधनों से ही अपना गुजारा करते थे तो अपने परिवार का एकमात्र ओढ़ना- बिछौना अतिथि को देकर स्वयं ओढ़ने- बिछौने के बिना शीत का प्रकोप झेलते हुए रातें बिता लिया करते थे।घर में आये अतिथियों को हल्दी टीका फिटाई करके भेजना उनके लिए अच्छे से अच्छा भोजन व्यंजन बनाकर खिलाना। उसके विदाई के समय बड़े बुजुर्गों का घर मे छोटे बच्चों को कुछ रुपये पैसे देने एवम घर से विदाई के समय जाते हुए सभी मेहमानों को विदाई की हल्दी फिटाई कर छोटे मेहमानों को कुछ न देकर विदा करना ऐसा शिष्टाचार होता है उत्तराखंड में।
सम्बोधन सम्बन्धी शिष्टाचार
उत्तराखंड के ग्रामीण परिवेश में सामाजिक शिष्टाचार के अन्तर्गत अपनी जाति-बिरादरी के ज्येष्ठ सदस्यों एवं नाते रिश्तेदारों का नाम लेकर सम्बोधित करना तथा उनसे सम्बधित सम्मानजनक शब्दों से सम्बोधित न करना शिष्टाचार के विरुद्ध समझा जाता है। इसे अशिष्टता का प्रतीक माना जाता है। ऐसा आचरण करने वाले व्यक्ति को वरिष्ठ लोग तत्काल टोक कर शिष्ट सम्बोधन करने का आदेश देते हैं। बन्धुत्व गठन की परिधि के बाहर के ज्येष्ठ व्यक्तियों को भी उनकी आयु के अनुसार बन्धुत्व वाचक सम्बोधनों से ही सम्बोधित किया जाता था। यहां तक कनिष्ठ जनों को भी उनके लिंग के अनुसार भया/भुला, भुली, ब्वारी, आदि सम्बोधनों से ही सम्बोधित किया जाता है । बन्धुत्व गठन की परिधि से बाहर के बड़े भाई वर्गीय एवं चाचा वर्गीय पुरुषों का नाम ग्रहण आवश्यक होने पर उसके साथ उपयुक्त बन्धुत्ववाची शब्दों का संयुक्त शिष्ट सम्बोधन अवश्य किया जाता है।
सामाजिक शिष्टाचार
सामाजिक शिष्टाचार के परिवेश सम्बोधन शब्दावली का भी महत्त्वपूर्ण स्थान होता है। इनका प्रयोग समाज विशेष के द्वारा नियत पारस्परिक सम्बोधनों की स्थिति एवं बन्धुत्व की परिधि के अन्तर्गत व्यक्ति विशेष के प्रति अभिव्यक्त मान-मर्यादा का प्रदर्शक हुआ करता है। आयु में वरिष्ठ व्यक्ति के लिए किये जाने वाले सम्बोधनों अर्थात् मानार्थक का प्रयोग प्रायः अनेकों समाजों में पाया ही जाता है, किन्तु इस संदर्भ उत्तराखण्डी समाज, विशेष कर कुमाउनी समाज में, आयु के अतिरिक्त बन्धुत्व सम्बन्ध विशेष की भी विशिष्ट भूमिका पायी जाती है। इस संदर्भ में यहां के सामाजिक शिष्टाचार में आयु में छोटे होने पर भी भानजा, भानजी, दामाद, चाचा, मामा, मामी जैसे बन्धुत्व सम्बन्ध से सम्बद्ध व्यक्तियों के लिए 'तुम' का प्रयोग। स्त्री वक्ता की स्थिति में इनके अतिरिक्त ननद, देवर,जेठानी भी इसी सम्बोधन का पालन करते हैं।
शिष्टाचार में परिवर्तन
किन्तु रूढ़िवादी उत्तराखण्डी समाज का यह परम्परागत सामाजिक शिष्टाचार का ढांचा अब नये युग के प्रभाव के अन्तर्गत एक अपूर्व संक्रमण की स्थिति से गुजर रहा है। फलतः अन्य सामाजिक परम्पराओं के विशृंखलन के समान ही सम्बोधन शिष्टाचार की श्रृंखला भी छिन्न-भिन्न होने लगी है। पहले जहां पति या पत्नी को नाम निर्देश पूर्वक सम्बोधित करना एक सामाजिक शिष्टाचार का उल्लंघन समझा जाता था वहां अब नागरिक तथा अर्धनागरिक वातावरण में एक दूसरे का नाम सम्बोधित किया जाना शिष्टता का प्रतीक बनता जा रहा है। इसके अतिरिक्त इन सम्बोधनों में जो एक अन्य उल्लेखनीय तथ्य सामने आ रहा है वह है पत्नी एवं पति के द्वारा एक दूसरे के सम्बन्धियों को अभिन्न सम्बोधनात्मक शब्दावली में सम्बोधित किया जाना, जिससे सारा पम्परागत सम्बोधन ढांचा ही चरमरा गया है। इसके अन्तर्गत विशेषकर ' सासु जी सुसर जी,जेठ जी जैसे सम्बोधनों के लिए तो कोई महत्व ही नहीं रह गया है। इसके अतिरिक्त सामाजिक शिष्टाचार के रूप में अनुपालित किये जाने वाले कुछ अन्य तत्व जिनका यहां के ग्रामीण परिवेश में पूरी शिष्टता के साथ पालन किया जाता है।
धन्यवाद
A.K Gudiyal Uttarakhandi


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