उत्तराखण्ड की सामाजिक एवं सांस्कृतिक परम्पराएँ
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| उत्तराखण्ड की सामाजिक एवं सांस्कृतिक परम्पराएँ |
उत्तराखंड एक मिला-जुला सांस्कृतिक क्षेत्र है। जैसा कि सस्कृति के संदर्भ में पहले भी बताया गया है कि अतः इसके सामाजिक एवं सांस्कृतिक परम्पराओं में विभिन्नताओं का होना भी अनिवार्य होगा। किन्तु साथ ही इसमें अनेक ऐसे परम्पराओं का भी पालन किया जाता है जो सम्पूर्ण क्षेत्र में पाये जाते हैं इसकी अलग पहचान बनाते हैं। यहां पर सभी का आकलन कर पाना तो संभव नहीं है। उत्तराखण्ड के निवासियों का एक सर्वसामान्य लोकाचार यह भी है जब कोई भी परिचित व्यक्ति या रिश्तेदार दुःख या हर्ष किसी भी अवसर पर किसी के घर जाता है तो यथा सम्भव खाली हाथ नहीं जाता है। इसके अतिरिक्त जब घर का कोई व्यक्ति या घर में आया हुआ कोई निकट सम्बन्धी अतिथि अपने लक्ष्य स्थल के लिए प्रस्थान करता है तो भी अनिवार्यतः उसके माथे पर पिठांई करके तथा चीनी, गुड़,मिठाई आदि से उसका मुंह मीठा करवा कर ही उसे विदा किया जाता है।
घर के मुख्य द्वार को नमन
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उत्तराखण्डी संस्कृति का एक उल्लेखनीय प्रसंग है बहू-बेटियों के द्वारा मायके एवं सुसराल को आते एवं जाते समय चावल अर्पण साथ घर के बाहरी प्रवेश द्वार को नमन करना। इसमें मायके में आने पर विवाहिता नारी अपने माता-पिता के घर में प्रवेश करने से पूर्व दोनों हाथों की हथेलियों के बीच में चावल या ज्यूंदाल लेकर दरवाजे की ओर मुंह करके घर की सुख समृद्धि की कामना करते हुए नमस्कार की स्थिति में देहली पर उन चावलों या ज्यूंदालों को डालती थी और ऐसे ही वहां से ससुराल को जाते समय भी दरवाजे की ओर मुंह करके चावल या ज्यूंदाल डालती हुई तथा पीछे को कदम बढाती हुई उसी प्रकार सुख,शान्ति एवं समृद्धि की कामना करती हुई पीछे को हटती थी। यहां के नागरिक परिवेश में तो अब केवल विवाह में विदाई के समय ही इसका पालन किया जाता है पर ग्रामीण अंचलों में कहीं अभी भी इसका परम्परागत रूप में पालन किया जाता है। विवाहिता कन्याओं द्वारा द्वार को नमन करने की यह परम्परा कुमाऊ, तथा जौनसार-बावर में समान रूप में पायी जाती है।
गोबर से घरों को लीपना
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पिछले कुछ समय पूर्व शुभ या अशुभ अवसरों पर घरों को गोबर मिटटी से लीपना यहां की सांस्कृतिक परम्परा का एक आवश्यक अंग हुआ करता था। किन्तु लोक मान्यता के स्तर पर इसका अनुपालन दो भिन्न रूपों में किया जाता है अर्थात शुभ एवं मांगलिक अवसर पर तो उनकी लिपाई का प्रारम्भ देहली से करके भीतर की ओर को, किन्तु मृत्यु के अवसर पर भीतर से बाहर को लीपन किया जाता था। क्योंकि गोबर से घरों के मुख्यद्वार और कमरों के लिम्पन के सम्बन्ध में धर्मशास्त्रों में तथा महाभारत में गोबर तथा गोमूत्र के प्रयोग को शरीर शुद्धिकारक था इसके घर के मुख्य द्वार के लिम्पन को गृह शुद्धि कारक माना जाता है।लेकिन गढ़वाल में यह परम्परा केवल शुभ अवसरों ,या तीज त्योहारों ,पर्व उत्सवों में ही चलन में है. गोबर मिटटी से लिम्पन व गोमूत्र से शुद्धीकरण की परम्परा पश्चिमी जनजातीय क्षेत्रों भी इसी रूप में पायी जाती है। रंवाई-जौनपुर में तो लकड़ी के घरों की दीवारों को गोमूत्र से ही स्वच्छ किया जाता है।
पिठांई या हल्दी चावल का टीका
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उत्तराखण्डी समाज में यहां की सांस्कृतिक परम्पराओं में पिठांई अपना एक विशेष स्थान रखता है। पूजा सम्बन्धी कार्यों को तो अन्य क्षेत्रों के समान ही, यह एक अभिन्न अंग होता है, पर इसके अतिरिक्त अन्य भी अनेक ऐसे अवसर होते हैं जहां इसकी अनिवार्यता समझी जाती है। मांगलिक कार्यों के अवसर पर आमंत्रित अतिथियों के अतिरिक्त घर में आने वाले नाते-रिश्तेदारों की विदाई अथवा बारात में आये हुए बारातियों की विदाई के अवसर पर उनका दक्षिणा के साथ पिंठाई किया जाना एक खास सँस्कार हुआ करता है। गढ़वाल में तो विवाह के अवसर पर बारात के स्वागत के अवसर पर पिठाई का आयोजन करना आवश्यक हुआ करता है। इसके अतिरिक्त शुभ एवं मंगलकारी मान कर उस समय भी जाने वालों तथा भेजने वालों सभी का टीका पिंठाई किया जाता हैं। उत्तराखण्ड के कुमाऊं क्षेत्र में पिठांई का अपना एक विशेष रूप होता था। सुहागिन स्त्रियों का टीका नाक की नोक से लेकर सीमन्त तक तथा कुमारियों एवं विधवाओं का माथे से सीमन्त तक होता था। पुरुष केवल माथे पर खड़ा टीका लगाते थे। टीके में गीली रोली,पिठयां,पिठाई ,हल्दी को नीबूं के रस में पकाकर बनाई गयी पिठां की गांठों को घिसकर तैयार की गयी रोली के ऊपर चावल लगाये जाते हैं। मांगलिक अवसरों पर अथवा वैवाहिक सम्बन्धों से सम्बद्ध नाते-रिश्तेदारों व विवाहिता बेटियों की विदाई के अवसर पर गन्धाक्षत करने के साथ-साथ दक्षिणा देना भी आवश्यक होता है। गढ़वाल में अन्य अवसरों पर लायी जाने वाली पिठांई के अतिरिक्त बारात के स्वागत के रूप में उसके आगमन के समय भी सभी बारातियों को पिठांई लगायी जाती है।
भांजा-भांजी के विवाह में मामा की विशेष भूमिका
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गढ़वाल की सामाजिक परम्परा के अनुसार भांजी की शादी में मामा द्वारा गाय का दान तथा उसे सुहाग की प्रतीक नथ का दिया जाना तथा भांजे की शादी में बारातियों के लिए राशन भोजन सामग्री दिया जाना आवश्यक माना जाता है। इसी प्रकार भांजों के जन्म पर बहिन को एक दूण अन्न तथा वस्त्र देने की तथा उसके नामकरण पर हंसुली धागुली देने की भी परम्परा है।
कुमाऊं मंडल कल्यो-भिटौली
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कुमाऊं मंडल की अन्यतम विशिष्ट सांस्कृतिक परम्परा रही है,चैत के महीनें में विवाहित बहिनों को कल्यो-भिटौली देना भी यहां की सांस्कृतिक परम्परा का एक अभिन्न अंग है। कुमाऊं में यह भेंट भाई के द्वारा बहिन के घर जाकर दी जाती है । चैत के महीने में भाइयों की ओर से विवाहिता बहिनों को दिया जाने वाला विशिष्ट उपहार, जिसे भिटौली या आला कहा जाता है। इसमें नियत रूप से बहिन को उपहार स्वरूप नये वस्त्र पकवान एवं दक्षिणा भेंट किये जाते हैं। जिन्हें भाई स्वयं लेकर उसकी ससुराल में जाता है। बहिन के लिए भाई के द्वारा इस प्रकार स्वयं उपहार लेकर जाना जहां भाई-बहिनों के पावन स्नेह सम्बन्धों का प्रतीक होता है वहीं ससुराल में विवाहिता की मान-मर्यादा का अभिवर्धन भी। इसलिए प्रत्येक विवाहिता बहन बड़ी उत्सुकता पूर्वक इस दिन की प्रतीक्षा किया करती हैं।
गढ़वाल मंडल कल्यो-भिटौली
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गढ़वाल मंडल की विवाहिता कन्याएं इस महीने बड़ी उत्सुकता पूर्वक माता-पिता की ओर मायके आने के बुलावे की प्रतीक्षा किया करती हैं। किन्तु जैसा कि कहा गया है गढ़वाल में भिटौली लेकर भाई के द्वारा बहिन के घर जाने की परम्परा के स्थान पर मां-बाप के द्वारा उसे ही घर बुलाये जाने की परम्परा है। जबकि गढ़वाल में माता-पिता के द्वारा उसे अपने घर यानी मायके में आमंत्रित करके दी जाती है। सामाजिक स्तर पर यह इस तथ्य का भी प्रतीक है कि उत्तराखण्डी समाज में कन्या के रूप में नारी को विशेष स्नेह व सम्मान प्राप्त रहा है। इसमें कन्या जन्म को न तो अवांछित समझा जाता है और न उसे माता-पिता के ऊपर भार स्वरूप ही माना जाता है।
वरिष्ठ लोगों का सम्मान
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पिछली शताब्दि तक कुमाऊँ मण्डल के अनेक क्षेत्रों की यह एक सर्वमान्य सांस्कृतिक परम्परा हुआ करती थी कि मकर संक्रान्ति के दिन गांव के बच्चे अपने वरिष्ठ लोगों का अभिवादन सम्मान करने तथा उनका आशीर्वाद लेने के लिए उनके घरों में जाकर उन्हें पैलागन चरणस्पर्श प्रणाम करते थे, और आशीर्वाद के साथ उन्हें गुड़ एवं आटा मिलता था जिसके वे शाम को घुगुते बना कर अगले दिन प्रातः कौवों को खिलाते थे,किन्तु अब यह परम्परा लग़भग ही समाप्त है।
बारातियों के साथ निशाण ध्वज
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कतिपय दशक पूर्व तक जब कि यहां पर यातायात की सुविधाएँ अत्यन्त सीमित हुआ करती थीं लोगों के वैवाहिक सम्बन्धों की स्थापना नजदीकी गाँवोँ में ही हुआ करती थी और बारातें पैदल ही जाया करती थीं। तब विशेषकर बारातों में कन्या के घर को जाते समय बारात के आगे-आगे एक विशाल लाल रंग का ध्वज चलता थ। इसके पीछे वाद्यवादक अपने वाद्यों ढोल दमाऊ नगाड़े, तूरी आदि वाद्यों को लेकर चलते थे, फिर पालकी ,घोड़े में दूल्हा, उसके पीछे बराती चलते थे और अन्त में होता था सफेद ध्वजवाहक। बारात की वापसी भी इसी क्रम में होती थी किन्तु इस बार बारात के आगे लाल ध्वज के स्थान पर सफेद ध्वज होता था और सफेद ध्वज के अन्त में दुल्हन का वाहन (डोली) दूल्हे के वाहन के साथ होता था।
दुल्हन का हरण
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बारात में सर्वसामान्य बारातियों के अतिरिक्त कुछ योद्धा वर्गीय लोग भी सम्मिलित होते थे जो अपनी ढाल-तलवारों से सज्जित होते थे, जिसका अवशेष अब ढाल-तलवारों को हाथ में लेकर नृत्य करने वाले, मनोरंजन के साधनभूत,के छोलिया नर्तकों में देखा जाता है। सुना जाता है पहले जब कभी मार्ग में आते-जाते दो बारातें आमने-सामने हो जाती थीं तो उनमें दुल्हन का हरण करने के ले लिए संघर्ष हो जाता था और विजयी दल दुल्हन का हरण करके इस सम्भाव्यता को लक्ष्य करके ही इन योद्धाओं को ले जाया जाता छोलिया की परम्परा सम्भवतः कुमाऊँ तक ही सीमित है।
कमलिया रुपया
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| उत्तराखण्ड की सामाजिक एवं सांस्कृतिक परम्पराएँ |
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सुना जाता है कि बीसवीं शताब्दि के प्रारम्भिक दशकों तक कुमाऊँ के कुछ भागों में एक ऐसी सामाजिक परम्परा प्रचलित थी जिसके अनुसार लड़के की बारात में भाग लेने वाले सभी लोग अथवा उनकी अपनी बिरादरी के लोग सहयोग राशि के रूप में वर के अभिभावकों को जो आर्थिक सहयोग देते थे, उसे 'कमलिया रुपया' कहा जाता था। इसके इस नाम का आधार यह था कि कन्या के घर के निकट पहुंचने पर वर का पिता या अभिभावक बारात को रोक कर वहां पर कम्बल बिछाता था, जिस पर सभी वरयात्री अपनी ओर से एक रुपया डालते थे। इसका हिसाब रखा जाता था तथा उनके विवाहों पर उन्हें लौटाया जाता था।
मंगल पुष्प कलश
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लड़के की बारात जिस गली,मुहल्ले या गांव से होकर जाती थी वहां के बालक- बालिकाएँ छोटे-छोटे पात्रों में जल भर कर तथा उसमें दूब या पुष्प डालकर बारात का शगुन करते थे और उसके प्रतिदान के रूप में वर के अभिभावक उनमें एक सिक्का (पैसा) डालते थे। कन्या के घर पर उसके विशिष्ट मंगल कलशों का आयोजन होता था और उनकी दक्षिणा भी अधिक होती थीं, जो कि ग्रामीण क्षेत्रों में कहीं कहीं अभी भी जीवित है।
दहेज परम्परा
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दहेज परम्परा के विषय में उल्लेख्य है कि दहेज की आधुनिक सुरसा के सर्वग्राही मुख के विस्तार से पूर्व तक यहां की सामाजिक परम्परा के सर्व सामान्य रूप में कन्यादान के विवाह के अवसर पर निर्धन माता-पिता की ओर से कन्या के परिधान के रूप में तीन वस्त्र घाघरी,आंगड़ी,अंगिया तथा पिछौड़ी आभूषण के रूप में एक सोने की नथ तथा । भांडे-बतैन के रूप में पांच बर्तन परात, थाली, पतीली, डाडू व करछी,पल्टा अवश्य दिये जाते थे, जिन्हें 'पंचौली के बर्तन' कहा जाता था। अन्य संगे सम्बन्धी लोग अपनी सामर्थ्य के अनुसार एक सिक्के के साथ लोटा, गिलास, थाली, परात आदि बर्तन दिया करते थे। विदाई के समय दूल्हा-दुल्हन इन एक नारियल के गोले के साथ प्रणाम कर उनका आशीर्वाद प्राप्त करते थे।
विलुप्त होती लोकपरम्पराएँ
उत्तराखण्ड के सामाजिक एवं सांस्कृतिक जीवन से सम्बद्ध परम्पराएँ ऐसी हैं जो या तो विलुप्त हो चुकी हैं अथवा उपेक्षित होती जा रही हैं। इसके अतिरिक्त यहाँ के लोक जीवन में प्रचलित और भी अनेक परम्पराएँ थीं जो कि अब विलुप्त हो चुकी हैं या विलुप्ति की कगार पर खड़ी हैं। इनकी सूची पर्याप्त लम्बी है। उन सबका आकलन करना बहुत मुश्किल है। आधुनिक युग में अनेक सामाजिक परम्पराओं के तोड़ने या विलुप्त होने के संदर्भ में उल्लेख है कि उनके पालन करने वालों के द्वारा स्वयं उनका तोड़ने या विलुप्त इसलिए किया जा रहा है कि अन्य वर्गों के द्वारा उन्हें निन्दनीय कहा जाता है या उन्हें उनके जातीय अथवा क्षेत्रीय पिछड़ेपन की निशानी माना जाता है। अत: अपने इस कलंक से मुक्त होने तथा स्वयं को उन्नत समझे जाने वाले सामाजिक वर्गों में सम्मिलित किये जाने की दृष्टि से ये लोग बड़ी तीव्र गति से इनका त्याग करते जा रहे हैं। फलतः किसी ऐतिहासिक लेखे-जोखे के अभाव में आगे आने वाली पीढ़ियों को शायद इस बात का ज्ञान भी नहीं हो सकेगा कि किसी सामाजिक वर्ग विशेष में कभी कोई विशेष सामाजिक परम्पराएँ भी हुआ करती थीं। सामाजिक परिवेश के लिए ऐसा होना भले ही एक स्वागत योग्य कदम हो, पर इतिहास के लिए, विशेषकर इस क्षेत्र के अतीत के सामाजिक इतिहास को जानने के लिए, यह एक कभी पूरी न की जा सकने वाली क्षति होगी। किन्तु खेद का विषय है, कि अभी पुरानी पीढ़ियों के कुछ जीवित व्यक्तियों के रहते यदि इनका संरक्षण नहीं किया गया तो ऐसी परम्पराएं इतिहास के अंधकार में विलीन हो जाएगी।
धन्यवाद
A. K. Gudiyal Uttarakhandi