उत्तराखण्ड की सामाजिक एवं सांस्कृतिक मान्यताएं


      उत्तराखण्ड की सामाजिक एवं सांस्कृतिक मान्यताएं



उत्तराखण्ड की सामाजिक एवं सांस्कृतिक मान्यताएं 

उत्तराखण्ड के ग्रामीण जनों में अनेक सामाजिक एवं सांस्कृतिक मान्यताएं ऐसी हैं जिनका बड़ी कठोरता से पालन किया जाता है। इनमें से अनेक तो अभी अपने परम्परागत रूपों में ही प्रभावी हैं, किन्तु कुछ आधुनिकता से प्रभावित होकर शिथिल हो रही हैं। उत्तखण्ड जैसे क्षेत्र में जहां सारा क्षेत्र अनेक धरातलीय खण्डों,घाटियों एवम अनेक प्रजातियों के अतीत से सम्बंधित मानवों में विभक्त हो वहां पर उत्तखण्ड की सामाजिक,सांस्कृतिक धार्मिक मान्यताएं रही हैं  कुछ मान्यताएं तो अब भी जीवन्त हैं।पारिवारिक व्यभिचार को जघन्य पातक एवं अक्षम्य अपराध समझा जाता है। यहां के ज्यादातर समाजों में छोटे भाई की पत्नी को पुत्रबधू के समान माना जाता है और उसे उसी नाते ब्वारी या पुत्रबधू से सम्बोधित किया जाता है। उसे अस्पृश्य समझा जाता है। यहां तक कि वह उस आसन ,दरी, चटाई का भी स्पर्श नहीं करती जिस पर उसका जेठ बैठा हो। यही मान्यता भानजे की पत्नी के सम्बन्ध में भी पायी जाती है, दामाद को पीपल के वृक्ष के समान पूजनीय माना जाता है। उसके प्रति किसी अभद्र व्यवहार एवं अपशब्दों के प्रयोग को पाप माना जाता है। दामाद को सम्बोधित भी आदर के शब्दों में ही किया जाता है।

प्राकृतिक घटनापरक मान्यताएं

भूकम्प के सम्बन्ध में माना जाता है कि पृथ्वी को अपने फणों पर धारण करने वाला शेषनाग जब विश्राम के लिए इसे अपने एक फण से दूसरे फण पर लेता है तो भूकम्पन के बारे में  रामायण में इसका कारण पृथ्वी को धारण करने वाले आठ  फणों वाले शेषनाग के करवट बदलने को माना गया है। वर्षा आगमन की सूचना जैसे कि पक्षियों का नीचे उतरकर पानी मे स्नान करना,मेंढकों का बिना वर्षा के टरटराना,विना बारिश के जोंकों का निकलना,छोटे बच्चों का होठों से तुर्री बजाना।,चींटियों का अपने अंडों को लेकर  बिल से बाहर निकल कर कतार बनाकर चलना। सापों का पेड़ पर चढ़ जाना,गठिया के रोगी के जोड़ों में दर्द का बढ़ना ये सभी वर्षा के आगमन की सूचक मानी जाती हैं।


कौवे का दर्शन


उत्तराखण्ड की सामाजिक एवं सांस्कृतिक मान्यताएं 


कौवे के दर्शन से शरीर की पुष्टि छोटे शिशुओं के सम्बन्ध में मान्यता है कि उन्हें कौवा दिखाने से उनकी गर्दन पुष्ट होती है, अर्थात् वह स्वयं सिर के भार को उठाने में समर्थ होता है। इस मान्यता का कारण सम्भवतः बच्चे का ध्यान पक्षियों की ओर विशेष रूप से आकृष्ट होना होता होगा। कौवा अन्य पक्षियों की अपेक्षा काफी बड़ा होने तथा एकदम काला होने के कारण उसकी नजर उस पर अधिक देर तक टिक सकती है।

नमक सम्बंधी मान्यता 

नमक के विषय में लोकमान्यता है कि इसे भूमि पर गिराने से अगले जन्म में उसे आंखों की पलकों से चुनना पड़ता है। पैंचा या उधार लिए गये नमक का वापस करना अत्यन्त आवश्यक माना जाता है। नमक को सीधे ही किसी के हाथ में पकड़ाना भी वर्जित होता है। माना जाता है कि ऐसा करने से उन दोनों व्यक्तियों के बीच कलह या क्लेश उत्पन्न हो जाती है।

विवाह के दिन बारिश का होना

वर या वधु का शादी से पहले पित्रों के लिए चूल्हे के खांद  में चढ़ाये  गये  भोजन को खाना या  शादी के पहले पल्टा या पनाई को जीभ से चाटने का परिणाम माना जाता है तो इनके विवाह के दिन बारिश होती है । यदि लड़की के घर पहुंचने वाले दिन वर्षा हो तो लड़की को 'पनचट्टी' या पलटा चाटने वाली तथा वापसी के दिन वर्षा हो तो लड़के को 'पनचट्टा' कहा जाता है।


भाद्रपद या भादौ को काला महीना 

भाद्रपद या भादौ को काला महीना कहा जाता है। क्योंकि इसमें शुभकार्य नहीं किये जाते हैं। इसके आठ गते तक इसका नाम लेना भी वर्जित माना गया है। चैत्र मास का नाम सबसे पहले पुरोहित के मुख से सुना जाता है। इसलिए पुरोहित लोग अपने जजमानों के घर जाकर इस महीने का नाम तथा उस वर्ष का वर्षफल सुनाते हैं। 

जेठ-बहू की अस्पृश्यता 

पारिवारिक सम्बन्धों में जेठ तथा ब्वारी( बहू) या छोटे भाई की पत्नी के सम्बन्धों को विशेष महत्त्व दिया जाता था। जेठ के द्वारा उसे पुत्रबधू की तरह समान माने जाने की मान्यता है। इन दोनों के पारस्परिक स्पर्श को भी एक वर्जित माना गया है। यहां तक कि बहू छोटे भाई की पत्नी उस चटाई या दरी आदि को छूने का भी वर्जन करती थी जिस पर कि जेठ बैठा हो । उसके सामने न सिर नंगा कर सकती थी और न मुंह खोलकर कर आमने-सामने वार्तालाप कर सकती थी ।

प्रसूता सम्बंधी मान्यता 

प्रसव के बाद प्रसूता की छूत मानी जाती है। ग्रामीण परिवेश में उसका स्पर्श हो जाने पर स्नान से शुद्धि मानी जाती है। दूध पीने वाले शिशुओं को कपड़े उतार कर उसे प्रसूता के कमरे में जाने दिया जाता है तथा वापस लेते समय उन पर दूर से गोमूत्र छिड़क कर वापस लिया जाता है।  पिछले समयों में उसे तीन दिन तक घर के बाहर बनी घास-फूंस की कुटिया में या किसी निकटस्थ गुफा में रखा जाता था । उसे घर के किसी व्यक्ति वस्तु को अथवा किसी फलदार वृक्ष, सागसब्जी के बेल को छूना अथवा हल्दी-पिनालू अरबी के खेत में जाना वर्जित होता है। उसके आने-जाने के मार्ग पर गोमूत्र छिड़का जाता है। 

शवयात्रा सम्बंधित मान्यता 

महिलाओं का शवयात्रा तथा वरयात्राओं में भाग न लेना,शवयात्रा या शवदाह के संदर्भ में यह भी एक मान्य परम्परा रही है कि मृतक स्त्री का अपना पति उसके दाह संस्कार में भाग नहीं लेता है। पति के द्वारा पत्नी की चिता का अथवा पत्नी के द्वारा पति की चिता का धुआं देखना वर्जित माना जाता   रहा है। शवदाह के समय उसमें भाग लेने वाले लकड़ी डालने वालों कठेरुओं की संख्या के विषय में माना जाता है कि यदि यह संख्या सम हो तो उस क्षेत्र में एक और मृत्यु होगी और उन्हें पुनः शवदाह के लिए वहां आना पड़ सकता हैं।

रोग मुक्ति के बाद स्नान  

छोटी माता काकड़ा अथवा खसरा ददरा के रोग से मुक्त होने पर शिशुओं को जो प्रथम स्नान कराया जाता है उसे 'वाला देना' कहा जाता है। इसके उपरान्त उसे किसी देवी-देवता के मन्दिर में ले जाकर उसका माथा टिकवाया जाता है। इस संदर्भ में उल्लेख्य है कि जम्मू में भी छोटी माता को काकड़ा' तथा खसरे से मुक्त होने पर शिशुओं को इसी प्रकार प्रथम स्नान के उपरान्त देवस्थल में माथा टिकाने के लिए ले जाया जाता है। उत्तराखण्डी समाज में अनेक सांस्कृतिक परम्पराएं ऐसी हैं जिनका सम्बन्ध वर्ष के विभिन्न महीनों से हुआ करता है। इस प्रकार की कुछ परम्पराएं इन रूपों में पायी जाती हैं।

नव विवाहिता सम्बंधित मान्यता

नव विवाहिता दुल्हन को विवाह के बाद पड़ने वाले प्रथम चैत्र मास में तथा परिवार में उसके जेठ के होने पर ज्येष्ठ मास में, तथा प्रथम बार पड़ने वाले अधिमास में ससुराल में नहीं रखा जाता है, अर्थात् इन समयों में उसे अपने मायके भेज दिया जाता है। इसके सम्बन्ध में सामाजिक मान्यता है कि जेठ वाली बहू का ज्येष्ठ महीने में ससुराल में रहना जेठ के लिए अशुभकर तथा अधिमास व भाद्रपद में में वहाँ रहना पति के लिए व चैत्र में सास के लिए अशुभ होता है। इसके अतिरिक्त यह भी सामाजिक मान्यता रही कि होलिका दहन मृतक संस्कार का सूचक होने को प्रथम होलिका दहन के अवसर पर ससुराल में नहीं रहना चाहिए।

भेंट या उपहार की औपचारिकता 

उत्तराखण्ड में सामान्यतः किसी इष्ट मित्र के घर जाने पर खाली हाथ न जाना। अवसर चाहे हर्ष का हो या शोक काखाली हाथ जाना उचित नहीं समझा जाता है। अत: चाहे किसी रोगी का हाल पूछना होकिसी के यहां शोक के लिए जाना होया किसी जन्म या संस्कार में अथवा सामान्य भेंट-घाट के लिए जाना हो तो जाने वाला व्यक्ति अपने सामर्थ्य एवं वस्तु विशेष की सुविधा के अनुसार अपने साथ कोई न कोई वस्तु भेंट अवश्य ले जाता है। 

बारिश के आगमन सूचना की मान्यता

निम्नलिखित घटनाओं व क्रियाकलापों से वर्षागम का सूचक माना जाता है, पक्षियों को नीचे उतर कर पानी में स्नान करना, सांप का पेड़ पर चढ़ जाना ,चीटियों का अपने बिल से अपने अण्डों को बिल से बाहर लाकर कतार में जाना  मेंढकों का बिना वर्षा के टरटराना,बिना वर्षा के जोंकों का प्रकट होनाछोटे शिशुओं का होंठो से तुर्री बजाना आदि उत्तराखंड में इन सभी सामाजिक एवं सांस्कृतिक मान्यताओं का पालन किया जाता था या अब  भी किया जाता है।

                                    धन्यवाद 

                           A.K.Gudiyal Uttarakhandi  

 


Uttarakhand Gyan

i am a blog writer uttarakhand folk lifestyle, folk culture, tradition, dress, ornaments, folk modesty, customs, folk songs, folk dances, rituals, lifestyle, farming, animal husbandry, mutual brotherhood, sense of cooperation and dedication towards each other,

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