उत्तराखंड में भूत प्रेत की मान्यताएं


          उत्तराखंड में भूत प्रेत की मान्यताएं 


उत्तराखंड में भूत प्रेत की मान्यताएं


उत्तराखंड की विशेष मान्यताओं में भूत प्रेत के सम्बन्धों में अपनी एक अलग ही  मान्यता हैं कहा जा सकता है कि भूत प्रेतों के अस्तित्व  के विषय में अति विश्वासी होने के कारण उत्तराखंड के लोगों  में इनके प्रति  अनेक प्रकार के विश्वास प्रचलित हैं. उत्तखंड के शुरूआती दशकों में इनके मतों में  इनकी समस्त धारणा,बल  एवं बलबुद्ध पाई जाती थी इनके हिसाब से इनकी समस्त कष्टों एवं दुःख  बिमारियों की मूल कारण ये अतिमानवीय शक्तियाँ ही हुआ करती थी परन्तु साथ में यह बात थी कि इनके एक बार रुष्ट होने पर अनेकों प्रकार के संकटों को दे सकती हैं दूसरी तरफ इनको खुश या संतुष्ट क्र देने पर कष्टों का संहार एवं सभी कार्यों की सिद्धि में भी सहायक होते हैं. अतः इनके रुष्ट एवं संकटों से  बचने के लिए इनको किसी भी माध्यम से  संतुष्ट किये जाने की भावना से प्रेरित होते हैं,भूत प्रेतों अथवा वायुयीय शक्तियों की सत्ता के सम्बन्ध में इन पर्वतीय क्षेत्रों के निवासियों में जो एक एनी विश्वास पाया जाता था वो है उपरी हवाएं  या वायुयीय  आत्माएं जिसे भूत प्रेत ,पिशाच परियों ,अन्छरियों  आदि अनेक रूपों में व्यक्त हुआ करती थी या अब भी मानी जाती  है.

भूत प्रेतों का अस्तित्व 

उत्तराखंड निवासियों के इनके अस्तित्व एवम प्रभावों के विषय में इनका मानना है की  इन भटकती आत्माओं के कई बजह या कारण हो सकते हैं जैसे चट्टानों से गिर जाने ,गले में फांसी लगाकर मरने वाला किसी भी  कारण आत्महत्या करने वाला, जंगल में शिकार करने समय पहाड़ियों से गिरकर मर जाने,ससुराल  में बहुओं को प्रताड़ित करके  बहु द्वारा आत्महत्या कर देने या नदी में कूद कर मर जाने के कारण, कुल मिलाकर बेबजाह मौत हो जाने इच्छा अधूरी रह जाने आदि कई कारणों से मर जाने से कारण यह मृतात्माएं भूत प्रेत,पिशाच ,के रूप  में किसी के ऊपर या परिवार वालों के ऊपर आविष्ट होकर उनके मुहं  से अपनी अपनी इच्छा जाहिर करती हैं इनके कई रूप होते है .

कैसे पैदा होती थी ये आत्माएं

भुत प्रेत सम्बन्धी अवधारणा के सन्दर्भ में जो उनकी दृष्टि में थोड़ी बहुत धूमिल धारणाएं  पाई जाती थी वे भी किसी पौराणिक कर्म कांडी से सुनी सुनाई बातों पर आधारित हुवा करती थी किन्तु उन मृत आत्माओं के विषय में उनकी जो एक मूल धारणा यह  थी कि जो लोग किसी प्रकार के अन्याय से पीड़ित आत्मघात करके मृत्यु को प्राप्त होते हैं अथवा जो जीवित रहकर भी सांसारिक सुख्बोग की अतिप्त इच्छाओं के साथ मर जाते हैं या मृत्यु हो जाने पर  जिनकी उचित गति क्रिया नहीं हो पाती उनकी आत्माएं मृत्यु के बाद भी अपने परिवेश या इलाके में ही घूमती भटकती रहती हैं.और अपनी गतिक्रियाकरवाने एवं अपनी अतिप्त वासनाओं की पूर्ति के लिए कई रूपों में प्रकट होकर अपनी सत्ता एवं स्थिति का अहसास कराती है.इसी कारण इनकी आत्माएं  प्रेत या पिशाच के रूप में भटकती रहती हैं. ये आत्माएं  कई रूपों में मानी जाती हैं। 

परी या आन्छरी

इनको अफ्सराओं  का रूप माना जाता है,इनके विषय में कहा जाता है कि ये पर्वत शिखरों में रहती हैं.व् छाया के रूप में इधर उधर घूमती रहती  हैं.ये मुख्य रूप से लाल वस्त्र पहने हुए बालक, बालिकाओं तथा युवा महिलाओं को अपना लक्ष्य बनती हैं.लोगों का विश्वास है कि गले  में लाल रंग का डोरा बांधे हुए व्यक्ति पर इनकी कुदृष्टि नहीं पडती है, इसलिए लोग बच्चों के गले में ऐसा डोरा बाँधा करते है इस प्रकार की विभिन्न आकृति वाली चलती फिरती छायाएं वहां के निवासियों द्वारा प्रायः सूर्यास्त के समय देखी जाती हैं।.

भूतनी या डाकिनी 

उत्तराखंड में लोक मान्यता है कि रात को प्रायः संध्याकाल या आधी रात में ये देवी देवता ऊँचे पर्वत शिखरों पर शंख बजाते हुए जुलुस लेकर चलते हैं जिन्हें बाण कहा जाता है।

मृत आत्मा का किसी के शरीर में प्रवेश होना  

किसी भी व्यक्ति की प्रेतात्मा का भूत प्रेत के  रूप में लोगों को परेशांन करने की तथा जागर के माध्यम से अपनी बात का बखान करने की  करने लगता है आस्था तो इन पहाड़ी क्षेत्रों में सर्व मान्य रूप से  पायी जाती है उत्तराखंड में जब किसी व्यक्ति की अचानक किसी दुर्घटना में मृत्यु हो जाती तो उसका मृतक संस्कार पूर्ण होने से पहले मृतक की आत्मा अपने किसी परम स्नेही सदस्य के शरीर में  प्रविष्ट हो जाती है  और मृतक की आत्मा उस व्यक्ति के शरीर से अपनी बात बयाँ करके अपनी बात से अपनी इच्छा पूर्ण करने की बात  करता है। 

सैयद  या सैद

इन आत्माओं की टोली रात में या दिन में दोपहर को जिस समय कोई इंसान चलता फिरता न हो उस समय इनकी टोली  बारात के रूप में पहाड़ियों में या गांवों के नजदीक पाई जाती हैं ,और जिधर से भी इनकी टोली निकलती है उस तरफ सिगरेट या तम्बाकू की गंध आती है इनकी टोली अपने जरुरत का सामान भी कई दुकानों से लेती है लेकिन कुछ ख़ास दुकानों में ही ये टोली खरीददारी करती हैं  इनका पहनावा सफेद कपड़ों में होता है. इनको गढ़वाल में सैद बोला जाता है.माना  जाता है कि ये टोली मुस्लिम कौम की होती है।

भूत प्रेतों की पूजा का विधान 




उत्तराखंड में भूत प्रेत की मान्यताएं

भूत प्रेत  की प्रेत आत्माएं  नदियों में ,पहाड़ियों में ,पर्वत शिखरों में,पर्वत घाटियों में  घुमती रहती हैं ,जिस पर भी यह छाया लगती है उस व्यक्ति का उतारा किसी जागरी के द्वारा  पूजा के रूप में उसी स्थान में किया जाता है जहाँ पर प्रेतात्मा के साए ने उस व्यक्ति को पकड़ा हो ,उस पूजा का विधान अलग ढंग से होता है अगर नदी वाला भूत होगा तो पूजा काला  मुर्गा या भेड़ की बलि से होगी पूजा सम्पन्न होने तथा पूजा के बाद स्नान अदि के बाद वह व्यक्ति काले वस्त्र पहनता है अगर किसी पर्वत शिखर या घाटी की प्रेत आत्मा हो तो पूजा सफेद या  लाल मुर्गा,नारियल आदि से होगी पूजा के उपरांत स्नान के बाद सफेद वस्त्र पहनाये जाते हैं तो भूत पिशाचों या इन  भटकती आत्माओं को कई रूपों में माना जाता है और कई रूपों में इनकी पूजा होती  जिनका विस्तार से वर्णन करना मुश्किल है.।

                                                                       धन्यवाद

                                                      A.K..Gudiyal.Uttarakhandi  

Uttarakhand Gyan

i am a blog writer uttarakhand folk lifestyle, folk culture, tradition, dress, ornaments, folk modesty, customs, folk songs, folk dances, rituals, lifestyle, farming, animal husbandry, mutual brotherhood, sense of cooperation and dedication towards each other,

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