उत्तराखंड लोकजीवन के देवी देवता
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| उत्तराखंड लोकजीवन के देवी देवता |
उत्तराखण्ड देवभूमि में प्रकृति की गोद मे पलने वाला मासूम मानव जब किसी अद्भूत या चमत्कारी शक्ति को देखता या महसूस करता है तो यह मानव उसकी अलौकिकता से अभिभूत होकर उसे कुछ दिव्यता का स्थान दे देता है। एवम उससे हानि या लाभ की भावना से प्रभावित होकर उसके मंगलकारी एवम चमत्कारी शक्तियों के आगे नतमस्तक हो जाता है। और शायद यही है उस भोले भाले मानव की देवताओं के प्रति भावना और इसी भावना से अपनी सुरक्षा की कामना से उसकी पूजा आराधना करने लगता है। उत्तराखंड की देवोँ के प्रति भावना इतनी व्यापक और प्रबल है इसी कारण सम्पूर्ण उत्तराखंड को ही देवभूमि का नाम दिया जाता है। इसीलिए यहाँ की अद्वितीय,प्राकृतिक सौंदर्य,के कारण प्राचीन काल से ही देव ,यक्ष ,गन्धर्व,किन्नर,आदि देव जातियों की क्रीड़ास्थली एवम अपनी पावनता के कारण ऋषि मुनियों की तपस्थली रहा है।
लोकदेवताओं के अस्तित्व
धार्मिक,सामाजिक,सांस्कृतिक एवम आध्यत्मिक परम्पराओं के सम्बंध में अनादि काल से ही उत्तराखंड के निवासियों को देवभूमि के गौरव से गौरवान्वित किया गया है। यहां के मूल निवासियों यक्ष,गन्धर्व,किन्नर एवम ,किरात आदि के अतिरिक्त समय समय पर विभिन्न जाति धर्म,समुदाय एवम संस्कृतियों से सम्बन्ध होने के कारण प्राकृतिक सौंदर्य,स्वच्छ एवम शांत वातावरण की वजह से हमेशा ही अपनी ओर आकर्षित करता रहा है।यहां की धरातलीय स्थिति ऐसी है कि एक क्षेत्र या घाटी के लोगों को किसी अन्य क्षेत्र के देवी देवताओं के विषय मे कुछ भी पता नहीं होता है यहां का कोई पर्वत शिखर,नदी नाले,विशाल वृक्ष,या कोई पत्थर की शिला ऐसी नहीं जो किसी देवी देवता से सम्बद्ध न हो। उत्तराखंड को देवभूमि कहे जाने की सार्थकता पौराणिक देवकुलों की स्थिति के कारण ही नहीं बल्कि कदम कदम पर विराजमान लोकदेवताओं के अस्तित्व के कारण मानी जाती है।
देवताओं के प्रति अवधारणा
उत्तराखंड की पहाड़ियों में रहने वाले पर्वतीय मानव ने जब अपने चारों तरफ प्रकृति की मनमोहक सुंदरता एवम भयानक दृश्यों दोनों रूपों को देखा होगा तो उसके मन मे एक तरफ खूबसूरत दृश्य दूसरी तरफ जंगली जानवर,बादलों की गड़गड़ाहट, नदियों की भयानक आवाज,काले बादलों के बीच बिजली कड़कें,दैत्याकार पर्वत कन्दराएँ के ख्याल से आशंकाओं से भर गए होंगे । तो ऐसी स्थिति में जीवन रक्षा के लिए अपनी अंतरात्मा किसी ऐसी शक्ति का सहारा पाने के लिए व्याकुल हो उठी होंगी और फिर अपनी सुरक्षा के लिए प्रार्थना कर उस अदृश्य शक्ति को खुश करने के लिए जैसे तैसे कुछ सामग्री कट्ठा करके पूजा करने लगा और धीरे धीरे बलि भेंट भी करने लगा । और इस देव भावना का उन पर ऐसा प्रभाव पड़ा कि समय के साथ देवत्व की भावनाओं से मुक्त नहीं हो सका। उत्तराखंड के जनमानस की कल्पना के अनुसार ये लोकदेवता जहां एक ओर नियमित पूजा करने पर सुख समृद्धि एवम संकटों को दूर कर देते है वहीं दूसरी ओर क्रुद्ध एवम रुष्ट होने पर विपत्तियों का पहाड़ भी खड़ा कर सकते हैं।
देव भावना की शुरुआत
जैसा की सर्वविदित है की भारतीय संस्कृति में देवत्व की भावना वैदिक युग से ही पाई जाती है वैदिक मानव का मन प्रकृति की नैसर्गिक घटनाओं के वैज्ञानिक रहस्य को समझने की शक्ति इतनी प्रवल न होने के कारण सूर्य का तेज प्रकाश,हवा की तेज सरसराहट,आग की तीब्र प्रचण्डता,बादलों का गर्जना, बिजली की चंचल कड़कड़ाहट,आदि के प्रकोपों से बचने के लिए एवम उनकी कृपादृष्टि प्राप्त करने की भावना से अलग अलगरूपों में इनकी पूजा,आरधना,करने लगा,इसी कारण उसे जीवन में जहां कहीं भी संकट या खतरा महसूस हुआ उसने इसी देवत्व की भावना से देवताओं की स्थापना कर डाली।
पर्वतीय मानव की दृष्टि में देवता
उत्तराखंड के पर्वतीय मानव की दृष्टि में देवता का अर्थ है ,वह सर्वशक्तिमान दिव्यशक्ति जो सर्वग्य सर्व समर्थ है जो प्रसन्न होने पर सब प्रकार का कल्याण ल्रती है अन्न धनं जन सभी प्रकार से उस की समृद्धि करती है रोग शोक भूत प्रेत आदि सभी प्रकार की आपदाओं का निवारण करती है अपराधी को दंड दे सकती है उन अपराधों या अत्याचारों को भी दंड दे सकती है। जिन अपराधों या अत्याचारों का निर्माण न्यायालयों में नहीं हो पाटा है जहाँ साक्ष्य न मिलने अथवा असत्य भाषण से अपराधी दंड से मुक्त हो जाता है वह सर्वज्ञ सर्व व्यापी देवता उसे दंडित कर सकता है। वह अपने श्र्द्धालों की रक्षा हेतु सदा उनके साथ रहता है यहाँ तक कि किसी कन्या का विवाह होने पर उसके साथ उसके ससुराल भी चला जा सकता है।
देवी देवताओं के प्रति श्रद्धा और विश्वास
उत्तराखंड के निवासियों पर देवताओं का इतना प्रभाव होता है कि अपने मूल स्थान से बाहर रहकर भी इनकी पूजा अर्चना की उपेक्षा करने का साहस भी नहीं कर सकता,उसे अपने देवी देवताओं की प्रतिवर्ष या दो चार वर्ष में एक बार सपरिवार आकर स्थानीय देवी देवताओं की पूजा अर्चना करनी ही पडती है। उत्तराखंड के स्थानीय देवी देवताओं की वैदिक या पौराणिक पूजा अर्चना की सामग्री पहले तो निर्धारित मन्त्र ही होते थे किन्तु समय परिवर्तन के साथ इनकी पूजा की सामग्री एवं अनुष्ठान विधि भी अलग तरह से होने लगे यहाँ के देवी देवता कुछ शाकाहारी और कुछ मांसाहारी भी होते हैं,उसके हिसाब से इनकी पूजा अर्चना की जाती है।
देवी देवताओं की प्रकृति एवं प्रभाव क्षेत्र
उत्तराखंड के देवी देवताओं का अपना अपना प्रभाव स्वरुप एवं व्यक्तित्व होता है । इनमे अपने उपासकों को वरदान या श्राप देने की क्षमता के अतिरिक्त न्याय करने ,अन्याय के विरुद्ध अपने भक्तों की पुकार सुनने एवं अपराधी को सजा देने व् दंड के रूप में न केवल की गयी हानि की पूर्ति करनी होती है बल्कि देवता की पूजा भी करनी पडती है देवी देवताओं का प्रभाव क्षेत्र भी अलग अलग होता है इनमे न्याय ,रक्षा जमीन,कृषि पशुधन एवम सम्बन्धित परिवार को सुरक्षा ,न्याय एवं अपनी कृपादृष्टि और छत्रछाया आदि सभी कुछ इन देवी देवताओं की कृपा होती है।
उत्तराखंड के बदलते परिवेश में देवता
उत्तराखंड प्राचीन काल से अब तक देवी देवताओं का कृपा का पात्र रहता आया है परन्तु आज के बदलते परिवेश में शिक्षा के प्रसार तथा सम्बन्धी सुविधाओं के कारण यहाँ के स्थानीय देवी दवताओं के प्रति लोगों की आस्था कम होती जा रही है आज की युवा पीडीअपने शारीरिक एवं भौतिक कष्टों के निवारण के लिए डॉक्टरों वैद्यों का सहारा ले रहे हैं फिर भी जब उन्हें किसी भयानक विपत्ति या असाध्य बीमारी का सामना करना पड़ता है तो उनके परम्परागत संस्कार उन्हें अपने देवी देवताओं की शरण में आने तथा पूजा अर्चना करने पर विवश कर देती है अंत में इस सन्दर्भ में हमने आज के ब्लॉग में उत्तराखंड के निवासियों का देवताओं के प्रति आस्था ,श्रद्धा ,विश्वास, उनका प्रभाव क्षेत्र,न्याय व्यवस्था के बारे में बताया ,आपको हमारा यह लेख कैसा लगा अपनी राय एवं सुझाव कमेन्ट के माध्यम से हमें देते रहें ताकि हमारा और आपका सम्पर्क अनवरत यूँ ही बना रहे। इससे आगे आगे हम उत्तराखंड के देवी देवताओं के बारे में आपको समय समय पर जानकारी देते रहेंगे ताकि आज की युवा पीड़ी भी अपनी देव संस्कृति के बारे में विस्तार से जान सके और अपने देवी देवताओं के प्रति आस्था ,श्रद्धा और विश्वास बनाये रखें।
धन्यवाद
A.K.Gudiyal Uttarakhandi
