उत्तराखंड के लोक देवताओं की पूजा पद्धति
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| उत्तराखंड के लोक देवताओं की पूजा पद्धति |
जैसा कि आप सभी जानते हैं कि इस मानव समाज ने जहां एक ओर ऐसे सज्जन ,न्यायप्रिय ,सदाचारी,और एक दूसरे के प्रति परोपकार की भावना रखने वाले उदार स्वभाव के महापुरुषों का अवतरण होता रहा है जो मानव सेवा पर अपने एक ऐसी छाप छोड़ जाते हैं जो कि उनके मरने के बाद भी लोग उन्हें केवल याद ही नहीं बल्कि उसको देवता की तरह पूजते भी हैं उनकी यादगार के रूप में लोग मन्दिर एवम देव स्थलों की स्थापना कर देते हैं। वही दूसरी ओर इसी समाज मे ऐसे दुर्जन ,दुराचारी ,क्रूर,नृशंस एवम अन्यायी लोग भी पैदा होते हैं जो जीते जी तो लोगों को परेशान करते ही हैं साथ कि इनके मरने के बाद इनकी आत्माएं भी इस समाज में रहने वाले लोगों को विभिन्न प्रकार से यातनाएं देते हुए अपने आप को देवता स्वरूप मनवाकर अपनी पूजा भी करवाते हैं। उत्तराखंड के देवी देवताओं की प्रकृति यहां के भाई बन्धुओं जैसी होती है यहां के निवासी अपने देवी देवताओं से अपने हिसाब से अपनी भाषा मे अपनी बात रख सकते है ,अपने घर के सदस्य की तरह ही आचरण कर सकते हैं।
आडम्बर रहित पूजा
वैदिक एवम पौराणिक देवी देवताओं से यहाँ के निवासी का न तो कभी उसका पाला पड़ता है और न ये उसके दैनिक सुख दुख के क्रिया कलापों अथवा कृषि एवम पशुधन की रक्षा व समृद्धि में ही कोई योगदान करते हैं। क्योंकि वह उनके जीवन चरित्र से भी परिचित नहीं होता परन्तु इन सबके विपरीत इन लोक देवताओं के सभी अनुष्ठानों को अपने ढंग से सम्पन्न करता है। अपने हिसाब से आडम्बर रहित पूजा करके अपनी गाथा और व्यथा सुनाकर उसकी पूजा करता है। और जो भी सामग्री उपलब्ध हो जाये उसी से पूजा सम्पन्न भी करता है। यहां का निवासी स्वयम देवता की पूजा करता है खुद ही आचार्य या पुरोहित होता है उसकी प्रार्थना आराधना में उसका स्वयम का श्रद्धापूर्वक भाव होता है। और निष्पाप विचारों से खुशी से पूजा अर्चना सम्पन्न करता है। ईश्वर के कई रूप कई नामों के होते हुए भी वह केवल परमशक्ति के रूप में स्मरण करता है ,इस निस्वार्थ और निष्पाप पूजा से प्रसन्न होकर इनकी हर मनोकामना को पूर्ण भी होती है।
देवता एवं मानव का आपसी रिश्ता
उत्तराखंड के लोक देवता पौराणिक देवताओं जैसे ब्रह्मा, विष्णु ,महेश के समान न सर्वव्यापक होता है और न सृष्टि स्थिति और संहार का आधार । उसका तो कार्यक्षेत्र सीमित होता है,किसी देवता पर क्षेत्र विशेष की कृषि की सुरक्षा एवं समृद्धि का दायित्व होता है तो किसी पर पशुधन की रक्षा का और किसी देवता पर दोपाए एवं ,चौपाए की रक्षा का । वह उनके भाई बन्धुओं के समान ही होता है जिसकी भागीदारी उसकी प्रत्येक उपलब्धि में रहती है । वह चाहे नई फसल हो या किसी मानव या पशु का आगमन, जन्म हो या किसी त्यौहार की ख़ुशी का मौका। ऐसे अवसरों पर यदि उसकी उपेक्षा की जाती है तो वह उसके भाई बन्धुओं से रिश्तेदारों की तरह नाराज हो जाता है रुष्ट होकर बदले की भावना से प्रेरित होकर उन्हें कष्ट पंहुचाने में भी नहीं चुकता है ।
जागरी द्वारा आवाहन
यहां के देवी देवताओं में वे सभी गुण होते है जो कि किसी आम मानव में हुआ करती है अर्थात उनके भाई बन्धोंकी तरह ही ये देवगण भी उनके साथ हंसते खेलते हैं,रूठते एवम प्रसन्न होते है उनके हर कार्यों में सहायक एवम बाधक भी होते है। वह जब चाहे जागरी के माध्यम से उन्हें साक्षात रूप में प्रकट करवा सकते है,और उनसे अपने कष्टों,दुखों का निवारण के उपाय भी जान लेते हैं ,एवम किसी भी विषय पर वाद विवाद भी कर सकते हैं वह अपने साथ हुए अन्याय के लिए पुकार कर सकते हैं अपने लिए न्याय एवम अपराधी के लिए सजा की याचना भी कर सकते हैं।यहाँ के देवता अप ने पश्वा या डांगर आदि के माध्यम से इनके दुखों का कारण एवं उनके निवारण का उपाय भी बताते हैं अकाल,महामारी दैवी आपदाओं से इनकी रक्षा करते हैं।
देवताओं के थान स्थान
उत्तराखंड के नदी पर्वत विशाल वृक्ष कुंड,गुफा,जलस्रोत पर्वत शिखर एवं आवासीय स्थल में यहाँ के देवी देवताओं का स्थान हो सकता है क्योकि यहाँ के कण कण में देवता निवास करते हैं मनुष्य ,पशु ,पक्षी,कोई भी जीव अग्नि जल वायु वर्षा अदि कोई ऐसा प्राकृतिक तत्व नहीं जिसमे कोई देवता निवास न करता हो या जिसकी यहाँ के मानव ने नियत रूप में आराधना न की हो।
पुरोहित या आचार्य रहित पूजा विधान
उत्तराखंड के लोकजीवन में इन स्थानीय देवी देवताओं का स्थान वैदिक एवम पौराणिक देवी देवताओं की तरह श्रेष्ठ होता है। इसका मुख्य कारण यह है कि कर्मकाण्डी ब्राह्मणों द्वारा वैदिक एवम पौराणिक देवी देवताओं का अनुष्ठान न तो आम लोगों की सामाजिक एवं भौतिक जीवन का हिस्सा होता है, न वह उनकी अनुष्ठानिक प्रक्रियाओं को तथा उनके महत्व को समझ पाता है। इसके लिए ब्राह्मण न जाने कितने ढकोसले और धार्मिक औपचारिकताओं का पालन मात्र हुआ करता है। पुरोहित या आचार्य जो कुछ भी करने को बोलता है उसे मशीन की तरह करता चलता है साथ ही पुरोहित द्वारा बोले गये मन्त्रों के अर्थों से सर्वथा अनजान होंने के कारण उस सम्पूर्ण प्रक्रिया में उसकी अपनी कोई व्यक्तिगत भागीदारी भी नहीं हो पाती है कर्मकाण्डीय पद्ध्ति से सम्पन्न पौराणिक देवी देवताओं के पूजन में पूजा संकल्प,कलश स्थापना,एवम कई अनुष्ठानिक आडम्बर और पूजा सामग्री जौ तिल, चन्दन सुपारी,पंचरत्न,पंचमेवा,एवम मोटी दक्षिणा का होना आवश्यक होता है। जबकि देवता तो मात्र फूल पत्ती धूप दिया रोट पुवे प्रसाद आदि से ही प्रसन्न हो जाता है।
धन्यवाद
A.K.Gudiyal.Uttarakhandi
