उत्तराखंड के वैदिक पौराणिक एवम लोकदेवताओं में अंतर
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| उत्तराखंड के वैदिक,पौराणिक एवम लोकदेवता |
उत्तराखंड के जनमानस में वैदिक एवम पौरणिक देवी देवताओं की अपेक्षा लोक देवताओं की अधिक मान्यता है। यहां के मुख्य कुछ जनजातीय वर्ग में शिव एवम शक्ति को ही मान्यता प्राप्त रही है। पुरातन काल में यह क्षेत्र भले ही ऋषि मुनियों की तपस्थली रहा हो परन्तु यहां पर वैष्णवी परम्परा के देवी देवताओं की आराधना का प्रचार मध्यकाल में अप्रवासी लोगो के आने से ही हुआ है। क्योंकि दूर दराज के क्षेत्रों के ग्रामीण समुदाय में इनकी स्थिति अभी भी नगण्य है । इनकी आराधना केवल पुरोहित वर्ग द्वारा आरोपित धार्मिक अनुष्ठानों तक सीमित होता है। आम जनमानस तो उसके पूजा विधान से अनभिज्ञ होता है। और न उसके अनुष्ठानिक ढकोसले की प्रक्रिया से ही परिचित होता है। केवल पुरोहितों द्वारा सुनी सुनाई गाथाओं के आधार पर वह केवल इतना ही जानता है कि इन शक्तियों की पूजा करने से उन्हें सुख शांति,समृद्धि मिलती है। इस रूप में उनके लिए उनकी स्थिति उनके अपने लोकदेवताओं से किसी प्रकार अलग नहीं होती है। उत्तराखंड के पर्वतीय क्षेत्रों में पूजे जाने वाले देवी देवताओं को मुख्यतः दो वर्गों में रखा गया है। जिसमे पहला है लोकदेवता और दूसरा वैदिक/ पौराणिक देवता। अब हम लोकदेवता और वैदिक ,पौराणिक देवताओं की आराधना ,देव स्थान एवं पूजा विधि का विवरण विस्तार से बताते हैं।
लोकदेवता
लोकदेवता और पौराणिक देवताओं में अंतर कुछ इस प्रकार है कि लोकदेवता डांगर अथवा पश्वा में प्रकट होकर साक्षात रूप में लोगों के सामने उनकी समस्याओं का निवारण करते है। ,जबकि पौराणिक देवी देवता न तो किसी व्यक्ति पर प्रकट होते हैं न व्यक्त रूप से अपना प्रसन्न होने या प्रसाद भेंट चढ़ाने की बात करते हैं। लोकदेवताओं के बारे में यह देख,पढ़ या किसी से सुनकर देखा गया कि इनमें से कुछ गिने चुने देवता ही ऐसे हैं जिनका प्रभाव क्षेत्र व्यापक हो अन्यथा कई ऐसे भी देवता हैं जिनका प्रभाव क्षेत्र सीमित होता है। जिनमे ग्राम देवता ,कुलदेवता ,इष्टदेवता,पित्र देवता,आदि होते हैं। इसके अलावा लोकपूजित दैवी शक्तियों में प्रत्येक ग्राम या गाँव की एक स्थानीय देवी होती है। जिसका नाम किसी पहाड़,नदी,गुफा के नाम पर रख गया होता है। प्रर्त्येक गाँव का रक्षक भूमिया देवता होता है जिसको नई फसलों के नए अनाज का भोग एवम बलि भी भेंट की जाती है।
पौराणिक देवता
पौराणिक देवी देवताओं की पूजा आराधना किये जाने पर वह भक्तों के दुख कष्ट मिटाकर उनका कल्याण करते हैं। पौराणिक शक्तियों में जिस एक शक्ति को पर्वतीय जनसाधारण में विशेष श्रद्धा का स्थान मिला वह है दुर्गा,काली,महाकाली आदि नामों से जानी जाने वाली शक्ति। इस क्षेत्र में देवी,काली आदि नामों से स्थापित अनेकों देवालयों के अतिरिक्त कई ऐसे स्थान भी हैं जिन्हें पुरातन काल से ही शक्तिपीठों के रूप में मान्यता प्राप्त रही है।
गढ़वाल में चन्द्रबदनी, सिद्धपीठ, सुरकंडा सिद्धपीठ,कालीमठ,सिद्धपीठ विशेष आदि शक्तियां मानी जाती हैं।इस क्षेत्र में देवी ,काली आदि नामों से स्थापित अनेकों देवालयों के अतिरिक्त कुछ ऐसे भी स्थान हैं जिन्हें पुरातन कल से ही शक्तिपीठों के रूप में मान्यता प्राप्त रही है इनमे से अति प्रसिद्ध चम्पावत के बालेश्वर मन्दिर के परिसर में स्थित कालिंका मन्दिर महाकाली शक्ति पीठ के नाम से प्रसिद्ध गंगोलीहाट का महाकाली मन्दिर तथा ललित जिह्वा के नाम से पूज्य देवीधुरा का बाराही देवी का मन्दिर, इसके अतिरिक्त पौराणिक देवकुल में भूतनाथ भैरव का नाम है जोकि पहले से ही शिव का ही एक रूप है। यहां के मृत्युंजय मन्दिर में स्थित भैरव नाथ की मूर्ति के अलावा कुमाऊ के अल्मोड़ा में अष्ट भैरव जोकि काल भैरव, बटुकभैरव , बालभैरव ,शाहभैरव ,गड्डीभैरव , आनन्दभैरव ,गीरभैरव ,खुटकनिया भैरव की स्थिति भी पाई जाती है। इसके अलावा पौराणिक देवकुल में आर्येत्तर वर्ग के लोगों के पूजनीय देवताओं में यक्ष,असुर,नाग,आदि वर्गों से भी हैं।
लोकदेवता और पौराणिक देवताओं का महत्व
उत्तराखंड में वैदिक एवम पौराणिक देवी देवताओं की अपेक्षा लोकदेवताओं का महत्व ज्यादा था। और जहां तक पौराणिक देवताओं की आराधना का प्रश्न है तो इसमें यहां के जनमानस में मुख्य रूप से जनजातीय वर्ग में शिव एवम शक्ति का महत्व रहा है। इनकी पूजा पद्धति में भी देखा गया है कि पौराणिक देवताओं में दुर्गा कालिंका को छोडकर और कोई भी देवता बलि ग्रहण नहीं करता जबकि लोकदेवताओं में ज्यादातर ऐसे देवता हैं जो स्वयम एवं अपने गणों के लिए बलि चाहते हैं इन दोनों के बीच पाए जाने वाली भिन्नताओं में एक भिन्न अंतर यह है कि लोकदेवताओं की कोई साकार मूर्ति या प्रतिमा नहीं होती है इनके पूजा स्थानों में तो केवल झंडा ,त्रिशूल दीप एवं शिला आदि होती है। इनके मन्दिर प्रायः खुले आकाश के नीचे ,किसी विशाल वृक्ष के मूल में, किसी गुफा में या किसी पहाड़ की चोटी में होता है।
आराधना एवं देवस्थानों में अंतर
पौराणिक एवं लोकदेवताओं की आराधना में एक प्रमुख अंतर होता है कि किसी वर्ग में भी लोकदेवताओं के न तो कोई मूर्ति होती है न कोई पक्के देवालय होते हैं कुछ क्षेत्रों में पक्के देवालयों में पत्थरों के लिंग की पूजा की जाती है। और कुछ क्षेत्रों में देवस्थान में धूनी के पास मूर्ति की जगह दो चार पत्थर होते हैं जिनकी पूजा की जाती है।.जबकि पौराणिक देवताओं की प्रतिमा या मूर्ति की पूजा पुरोहित द्वारा मन्त्र उच्चारण के साथ की जाती है। यहाँ के लोकदेवताओं का सम्बन्ध मुख्य रूप से कृषि एवं पशुपालन करने वाले लोगों से होता है जबकि पौराणिक देवताओं का मुख्य सम्बन्ध ब्राह्मण वर्गीय पुरोहित से होता है।
धन्यवाद
A.K.Gudiyal.Uttarakhandi
