उत्तराखण्ड के देवी देवताओं का वर्गीकरण


                       उत्तराखण्ड के देवी देवताओं  का वर्गीकरण 



उत्तराखण्ड के देवी देवताओं का वर्गीकरण 



लोक देवताओं के प्रभाव क्षेत्र के आधार ओर इनका वर्गीकरण क्षेत्रीय, जनपदीय, अथवा स्थानीय रूप से किया जा सकता है। क्योंकि देवता के रूप में पूजे जाने वाले  इन शक्तियों में कुछ तो सामान्य भेंट पावर,पूजा ,धूप दीप आदि से ही प्रसन्न हो जाते हैं किंतु कुछ देवता ऐसे भी हैं जो भेंट पूजा के अलावा पशुबलि भी मांगते हैं। इसी प्रकार  इनमे भेद या अंतर पाया जाता है। जिसमे कुछ सन्तोष प्रवृति,कष्ट निवारक ,न्याय करने वाले सुफल देने वाले होते है तो कुछ अपनी प्रकृति से आतंकी,अनिष्ट कारी,एवम संकटो को देने वाले होते है। इन देवताओं की प्रकृति के हिसाब से इन्हें दो रूपों में माना जाता है।

देवांगी  देवता 

इस वर्ग में उन देव शक्तियों को रखा गया है या माना गया है जो मानवीय रूप में अवतरण होते या प्रकट होते है। और अपने उदार प्रकृति ऊंचे आदर्शों एवम मानव कल्याणकारी कार्यों के कारण लोगों के दिलों में श्रद्धा और सम्मान की ऐसी पहिचान छोड़ देते हैं  कि मरने के बाद भी उन्हें लोग देव शक्ति के रूप में पूजते है। और अपने मांगलिक कार्यक्रमों  में अपने मंगल कल्याण के लिए याद किया जाता है  और इनको बलि सहित पूजा अर्चना भी  करते है।

भूतांगी देवता 

इस वर्ग में उन मृत आत्माओं को माना जाता है जो दुर्घटना आदि में अकाल मृत्यु के शिकार होते है। किसी मजबूरी वश आत्मघात करके मर जाते हैं। या जिनकी गति मुक्ति नहीं हो पाती है।ऐसी स्थिति में ये आत्माएं अपनी पूजा आराधना लेने  के लिए किसी परिवारजन,या आसपास के खास लोगों को परेशान करते हैं जिसके कारण लोग परेशान  होकर पुछेरों या बकिया के पास जाकर उन्हें प्रसन्न करने का उपाय जानकर इनकी पूजा करते हैं और इनको थान स्थान देकर देवताओं की तरह पूजते हैं। ऐसे देवताओं का नाम क्षेत्र के हिसाब से अलग अलग नाम हो सकते हैं।

इन दोनों वर्गों के अलावा एक देवताओं का वर्ग और भी माना जाता है। इस वर्ग में वो देवता आते हैं इन दोनों वर्गों से हटकर अपने उपासकों एवम क्षेत्र के सभी भक्त लोगों से किसी तीज त्योहार पर्व उत्सवों के मौके पर अपनी सम्पूर्ण सामूहिक या व्यक्तिगत पूजा मांगते हैं और अपने भक्त जनों पर अपनी कृपा दृष्टि बनाये रखते हैं। इन सभी देवताओं  को  वर्गीकरण के हिसाब से उत्तराखंड के कुमाऊँ एवम गढ़वाल मण्डल के लोकदेवताओं को क्षेत्रीय  हिसाब से वर्ग भेद  देखा जाता है   

कुमाऊं मंडल के देवी देवता


कुमाऊं मंडल के विभिन्न क्षेत्रों में देवी- देवताओं  कालीकुमाऊं एवं सोर पिथौरागढ़ के विभिन्न खण्डों में क्षेत्रीय तथा स्थानीय पूजे जाने वाले  देवताओं में गोरिल,चमलदेव, ऐड़ी, सिद्ध, क्षेत्रपाल, भूमिया, रिखेसर, ढेरनाथ, सैंम, हरु, नरसिंह, भनार, मल्लिकार्जुन, खण्डेनाथ,ध्वज सिद्धनाथ, घाणधूरा, घाण, लोढ़िया कालसिण,नौलिया, भेलुवा,देवचूला आदि  देवता हैं  ,इस क्षेत्र के स्थानीय सीमित क्षेत्र एवं वर्ग के द्वारा पूजित देवी- देवताओं में घटकू, हिंगला, रैणसैंणी, अखिलतारिणी, रणकोची, पंचबल्य, चौपटिया, कठाड़ी, भराड़ी, गजार, जिमदार, बेताल,वामन अदि देवता हैं ।

कुमाऊं मंडल में विभिन्न स्थानीय नामों से पूजी जाने वाली  चण्डी, दुर्गा, काली, महाकाली, गौरा, पार्वती, चामुण्डा आदि देवियाँ हैं । पौराणिक देवियों के अतिरिक्त विभिन्न अंचलों एवं क्षेत्रों में विभिन्न नामों से पूजी जाने वाली देवियों में कुछं देवियाँ हैं जिनमे पुण्यागिरी, नन्दा, घड़देवी, गडेलीदेवी, रक्षादेवी, शीतलादेवी, रणचूलादेवी, कोकिलादेवी,कठबुड़ियादेवी, मल्लिकादेवी, कोटवीदेवी, जाखणदेवी, भ्रामरीदेवी, अन्यारीदेवी, उज्यालीदेवी, ब्यानधूरादेवी, गड़देवी, कठपतियादेवी, झूमादेवी, धौलादेवी, अखिलतारिणी,  कोटगाड़ीदेवी, झूलादेवी, स्याईदेवी, चम्पावती, हिंगला, उल्का,  रैंणसैंणी, बानणी, कसार, पाषाण, जयन्ती, , नैथाणादेवी, मानिलादेवी, सूर्यादेवी आदि देवियों की पूजा की जाती है।

गढ़वाल मंडल के देवी देवता

गढ़वाल मंडल के देवताओं में मुख्यतः महादेव शिव ,नरंकार देवता,नरसिह, भैरव, तिमुण्डिया,  धार मसाण,रण मसाण,हीत  देवता, शाण, कलभूत, लांकुड़िया,अघोरनाथ एवम देवियों में ज्वाल्पा देवी, चंद्रवदनी, सुरकण्डा, कुंजापुरी,मैठाणा, नंदादेवी,राजराजेश्वरी,उल्कादेवी,धारीदेवी,दीबामाता,देवी कालिंका ,नागिणि,झाली माली,चन्द्रा, जोगिणी, आन्छरी, गड़देवी समेत 64 जोगिनियों,22 परियों और 16000 आँछरियों की पूजा भी होती है।  रवांई जौनपुर एवम जौनसार भावर में दुर्योधन,कर्ण,सेलकुड़िया,कोलकंदारी,नंदासर, रेणुका,पोखू आदि एवम जौनसार में महासू देवता,चालदा, बौठा, भदराज और नीति माणा में कुबेर,मणि भद्र, घण्टाकर्ण, धूरादेवी  आदि देवी देवताओं को माना जाता है। गढ़वाल के तिहरी रंवाई जौनपुर में भदाण,वीरेश्वर ,रमोला मानीकनाथ,जाख ,पोखू,कर्ण दुर्योधन कंदार देव ,गौरिया ,नरंकार ,सत्यनाथ,सिद्धनाथ ,भदराज,वृषसेन भासर नागरजा,घंडीयाल आदि देवताओं की पूजा की जाती है ।

 

जनजातीय क्षेत्रों के लोकदेवता 

उत्तराखंड के दोनों मंडलों के अपने अपने  जनजातीय क्षेत्रों में पूजे जाने वाले अनेकों देवी देवता हैं  दारमा घाटी पट्टी के लोग अपने स्थानीय देवताओं जैसे संगस,पुज्युरस , लोर गबला आदि की पूजा करते हैं हिंवाल ,साईं थत्याल,धुरमा,रागा पुरब्याल,सैन अन्यारी देवी,भराड़ी देवी कूँ,गबला,विनायक कुंगरी,कोकिला देवी,एवं दारमा में चौदह देवताओं और तीस देवियों की पूजा की जाती है 

बुकसाड़ के बुक्सा जाति के प्रमुख देवता 

थडवाट एवं बुकसाड़ में घर के सामने केवल एक गोल घेरे में गड़े बांस के डंडे पर बंधी ध्वजा या झंडे को महादेव अथवा शिवलिंग का प्रतीक मानकर पूजा जाता है बुकसाड़ की बुक्सा जाति के प्रमुख देवता भूमसेन हैजापीर, जाहरपीर वनदेवी,हिडिम्बा हुलका,अटरिया सुन्दरी ,शीला भुमानी देवी कालिंका जोकि तन्त्र मन्त्रों की आधार मानी जाती है  एवं थडवाट  के प्रमुख देवताओं में ऐड़ी मल,भारामल नारायण भैरव कुस्मेटिया,बुड़ेबाबू आदि और देवियों में पुण्यगिरी,कालिका शीतला,ज्वाला दुर्गा पार्वती आदि देवी देवताओं की पूजा की जाती है 

 सिद्धकोटि वाले  देवता 

सिद्धकोटिक देवतों में प्रमुख  देवता गोरखनाथ,मछेन्द्र नाथ,त्रिलोकीनाथ,चौरंगी नाथ, , नागनाथ, भोलानाथ, गंगनाथ, मलैंनाथ, खण्डनाथ,सिद्धनाथ,बलैनाथ आदि सिद्ध कोटि वाले  देवता है। 

                                                                            धन्यवाद 

                                                           A.K.Gudiyal.Uttarakhandi


Uttarakhand Gyan

i am a blog writer uttarakhand folk lifestyle, folk culture, tradition, dress, ornaments, folk modesty, customs, folk songs, folk dances, rituals, lifestyle, farming, animal husbandry, mutual brotherhood, sense of cooperation and dedication towards each other,

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