उत्तराखंड लोकदेवताओं की प्रकृति एवं पूजा पद्धति के अनुसार वर्गीकरण
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उत्तराखंड लोकदेवताओं का प्रकृति एवं पूजा पद्धति के अनुसार वर्गीकरण |
उत्तराखंड में आम तौर पर पूजा पद्धति के हिसाब से इन देवताओं को तीन वर्गों में बाँटा गया है,जिनमे राजसी प्रवृति ,भूतप्रेत प्रवृति एवं एक और अन्य वर्ग है। यानी इन तीन प्रकार के देवताओं का कुमाओं में माना जाता है या पूजा जाता है । और गढ़वाल मंडल के अनुसार इन्हें दो वर्गों या दो रूपों में पूजा जाता है.जिन्हें रैका और द्युन्का कहा जाता है।
रैन्का वर्ग के देवता
रैन्का वर्ग के देवता सात्विक प्रवृति के होते है जिनकी पूजा दूध, दही, घी, फल,फूल मेवा, मिठाई ,रोली, चन्दन एवं धुप धूपण से की जाती है यह देवता राजसी प्रवृति के होते हैं इसलिए इन देवताओं को राजांगी भी कहा जाता है।
द्युन्का वर्ग के देवता
द्युन्का वर्ग के देवता तामसी प्रकृति के होते हैं, इनकी पूजा तामसिक यानि तन्त्र मन्त्र एवं पशु बलि या मुर्गे की बलि से होती है तो इन्हें भूतांगी वर्गी कहा जाता है । और कुछ ऐसे देवता भी हैं, जो खुद तो पशुबलि नहीं लेते मगर इनके साथ जो गण होते है उनको पशुबलि से पूजा जाता है । कुल मिलाकर जिन को अपने शौर्य और पराक्रम एवं लोक कल्याण के कार्यों के कारण मृत्यु होती है उन्हें देवता रूप में पूजा जाता है और जिनकी किसी हादसे वश,अस्वाभाविक मृत्यु होती है एवं उनकी गति मुक्ति नहीं की जाती ऐसी प्रेतात्माओं को भूत या प्रेत रूप में पूजा जाता है ।
देवताओं की प्रकृति एवं क्रियाकलापों के अनुसार
गढ़वाल मंडल क्षेत्र में इन देवताओं की प्रकृति और इनके क्रिया कलापों के आधार पर इन्हें जो मुख्य वर्गों में बांटा गया है । इस प्रकार से हैं । रैन्का,ड्यूनका,खांदा,किरान्दा ,कबलान्दा, लोचड़ा, बोलन्दा,मायालु ,दिशाबोटी,घतेर, गोना,दुद्धया,डौण्डीया, कच्या, खरण्या, वीर,मसाण आदिको इन वर्ग भेदों में रखा गया है।
गोना वर्गीय देवता
इस वर्ग के देवता सात्विक एवं सौम्य प्रकृति के होते हैं। इनकी आराधना सुख-शान्तिदायक, आरोग्य प एवं दुष्टग्रहों की शान्तिकारक होती है। इनकी पूजा-भेंट में घी, दूध, दही, हलवा, पूड़ी, रोट, नारियल, फल, मेवा, धूप, दीप, चन्दन, आदि समर्पित किया जाता है। इस वर्ग के देवताओं में प्रमुख हैं- नागरजा, घंटाकर्ण, क्षेत्रपाल व कुछ देवियां भी आती हैं ।
घतेर वर्गीय देवता
ये देवता कठोर निर्दयी एवं उग्र, स्वभाव के देवता हैं जो मानव, पशु, कृषि, धन सम्पत्ति को हानि पहुंचाते हैं। कलह,क्लेश , विवाद में घात डालने वाले अपने शत्रुओं को हानि पहुंचाते हैं। इन देवताओं में नरसिंह , भैरव, काली, क्षेत्रपाल जोगनियां, मातृका आदि देवता आते हैं । इनका रूप आतंक, भय, शोक पैदा करने वाला होता है। ये छोटी-छोटी बातों पर भी हानि पहुंचाने को तत्पर रहते हैं। ये रोग, मृत्यु, दुर्घटना एवं कलह क्लेश पैदा करने वाले होते हैं।
किरान्दा वर्गीय देवता
ये देवता उग्र स्वभाव के होता हैं और अपने दुश्मनों का बुरा भी करते हैं, इनकी आवाजें भयावह होती हैं और हल्ला-गुल्ला भी मचाते हैं। जो कि अपने गर्जन से लोगों को भयभीत कर देती हैं। किलकारियां मारते हुए अपनी बात कहकर अपनी पूजा अर्चना करवाते हैं। इन देवताओं में काली और मसाण प्रमुख हैं।
खराण्या वर्गीय देवता
खराण्या देवता जब किसी इन्सान पर प्रकट होते हैं तो अवतरण होते समय इसका पश्वा शरीर पर राख मलता है, तथा इसकी पूजा में इसे राख के लड्डू पेड़े अर्पित किये जाते हैं।
लोचड़ा वर्गीय देवता
ये देवता जिद्दी, हठी और क्रूर स्वभाव के होते हैं। एक बार जिस पर चिपटते हैं उसे आजीवन नहीं छोड़ते। या इनसे बड़ी मुश्किल से पीछा छुटता है । इनका वास श्मशान गंदे ,दरिद्र एवं मलिन स्थलों में होता है। इनमें कलभूत, तेलिंग, लांकुड़िया, डांकुड़िया, अघोरनाथ आदि प्रमुख देवता हैं।
बोलान्दा वर्गीय देवता
ये देवता अपने दुश्मन या कसुरवार व्यक्ति को आवाज देकर प्राणहरण करते हैं या किसी भयंकर रोग का शिकार बना देते हैं। इनमें धारमसाण एवं रण, गाड,मसाण आदि देवता प्रमुख है।
मयालू वर्गीय देवता
ये देवता मृदुल स्वभाव के कृपालु, दयालु होते हैं तथा परोपकार करते हैं। किसी को हानि नहीं पहुंचाते। इनका निवास पवित्र स्थलों एवं शैलशिखरों में होता है। दीन-दुखियों के सहायक होते हैं। इनमें बाला, घण्डियाल, भैरव, वनदेवियां, कुंवारी और कुंवर नाम के देवता प्रमुख हैं। अप्सराओं एवं किशोर अवस्था के देवी-देवता भी इसी वर्ग के देवताओं में आते है।
दिशाबोटी वर्गीय देवता
ये देवता किसी भी अनाथ, विधवा एवं दुःखी महिलाओं के मैती होते हैं। किसी महिला पर यदि कोई विपत्ति आ पड़ती है, तो ये देवता सदैव उसकी सहायता के लिए तैयार रहते हैं। पुकारे जाने पर तत्काल उसकी सहायता करते हैं। ऐसी स्त्रियों को ये अपनी दिशा धियाण या बेटी मानते हैं तथा उसके कहे हुए कार्य को तुरन्त कर डालते हैं। उसके द्वारा गुहार लगाये जाने पर ये उसके शत्रु को मार भी डालते हैं अथवा उसके पशुओं एवं धन-जन को क्षति भी पहुंचा सकते हैं।
खान्दा वर्गीय देवता
ऐसे देवता निर्दयी एवं कठोर स्वभाव के होते हैं। इनकी पुकार होने या पुकारे जाने पर ये विवेकहीन होकर कसूरवार व्यक्ति को जान माल का नुकसान पहुंचाते हैं। समय असमय कभी भी प्रहार कर डालते हैं। इस वर्ग में भूत, मसाण, खबीस, ऐड़ी, भराड़ी आदि प्रमुख देवता आते हैं ।
धन्यवाद
A.K.Gudiyal.Uttarakhandi
