उत्तराखंड में बलि पूजा कब क्यों और कैसे हुई शुरू
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| उत्तराखंड में बलि पूजा कब क्यों और कैसे हुई शुरू |
उत्तर भारत का यह राज्य उत्तराखंड अपनी समृद्ध आध्यात्मिक और सांस्कृतिक विरासत और देवत्व की श्रद्धा और भावना के लिए जाना जाता है, और इसीलिए देवी-देवताओं की पूजा यहाँ के लोगों के जीवन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। राज्य में कई मंदिर और पवित्र स्थल हैं, जिनमें पहले से ही विभिन्न देवी देवताओं की पूजा आराधना अलग अलग ढंग से होती है। जिनमे से उत्तराखण्ड के अधिकतम देवी देवता पशु बलि सहित पूजा मांगते थे। इन पशु बलियों में बकरी, भेड़,सूअर,भैंस एवं मुर्गा आदि की बलि चढ़ाई जाती थी।
पशु बलि पूजा से सम्बन्धित देवी देवता
कुमाऊं एवं गढ़वाल दोनों ही मण्डलों में काली एवं नन्दा भगवती के नाम पर प्रतिवर्ष पशुओं की बलि चढ़ाई जाती थी। जोशीमठ गढ़वाल के प्रसिद्ध नृसिंह देवता के मंदिर के निकट तिमुंडिया देवता के उत्सव में देवता का पस्वा सर्वप्रथम एक बकरे का कलेजा निकाल कर खाता था और उसके बाद उसकी टांगों तथा अन्य अंगों को फाड़ कर खाता था और उसके बाकी बचे-खुचे अंगों को अन्य भक्तगत प्रसाद के रूप में ग्रहण करते थे।जो परम्परा कि शायद अब वर्तमान में है या नहीं इसके बारे में कुछ नहीं कहा जा सकता
दुर्गा चण्डी मन्दिर जौनपुर
टिहरी जिले के जौनपुर स्थित दुर्गा चण्डी के मंदिर के प्रांगण में एक विशेष पर्व एवं नवरार्त्रों की अष्टमी, के अवसर पर एक भैंसे को शराब पिलाकर पहले उसे खूब दौड़ाया जाता था। तथा बाद में उसकी बलि चढ़ा जाती थी। अब यह पशुबलि की परम्परा बहुत कम हो गयी है। और सोर घाटी में असुर देवता को प्रति तीसरे वर्ष भैंसे सहित पांच वलियां भी दी जाती थी। जौनपुर में आयोजित की जाने वाली पंचबलि पूजा में नवरात्रों में आयोजित की जाने वाली 'ठरपूजा' के अन्तिम दिन कालरात्रि को अर्धरात्रि के समय पक्षी, मछली, केकड़ा ,टेडपोल , भैंसा , बकरा, छियाड़ा एवं भुजेला की पंचबलि दी जाती है, और पूजा के समापन पर काली को सुअर एवम द्रोपदी को कुँआरी बकरी की बलि दी जाती थी। इसके अतिरिक्त इस अवसर पर दी जाने वाली अन्य बलियों में अष्टमी कालरात्रि को किये जाने वाले दिशा बंधन में दक्षिण दिशा में मुर्गे व बकरे की, उत्तर में सुअर, छिपकली व खाडू या भेड़ की और पूर्व में कद्दू और भुजेला की तथा पश्चिम में पैठा की बलि दी जाती थी तथा नवमी के दिन सामूहिक रूप से झोटे की बलि दी जाती थी। इसमें झोटे या भैंसे की गर्दनपर हमला करके उसे डंडों से मारते हुए सारे गांव के खेतों में दौड़ाया जाता था और जब वह थक कर गिर जाता था तो उसके सिर को तलवार से काटकर चौंरी में लाकर वहां पर उसके रक्त के छीटे डाले जाते हैं।
गंगोलीहाट का महाकाली पीठ
गंगोलीहाट के महाकाली पीठ के बारे में प्रसिद्ध है कि पहले महाकाली की वार्षिक पूजा जो कि नवरात्रियों की अष्टमी के अवसर पर यहां पास के गाँव के किसी व्यक्ति की बलि दी जाया करती थी । किन्तु नवीं शताब्दी में जब आदि शंकराचार्य जी अपनी कैलाश यात्रा के सन्दर्भ में यहां आये तो लोगों की प्रार्थना सुनने पर उन्होंने महाकाली की मूर्ति को, जो कि मानव बलि की पूजा लिया करती थी, उन्होंने अपने मंत्र शक्तियों से कीलित करके उसका प्रभाव कम कर दिया। तब से यह प्रथा बन्द ही हो गयी थी ।
हाट कालिन्का मन्दिर
गढ़वाल के समान ही कुमाऊं मंडल में भी गंगोलीहाट की हाट कालिन्का एवं अल्मोड़ा तथा नैनीताल की नन्दादेवी के मंदिरों में नंदा अष्टमी के अवसर पर अठवाड़ पूजा में सात बकरियों एवं एक भैंसा की बलि अभी एक-दो दशक पूर्व तक एक आम बात थी।
बालेश्वर मन्दिर
पिथोरागढ़ जिले के थल बालेश्वर मन्दिर में भी कहा जाता है कि एक बार राजा मन्दिर निर्माण कार्य के दौरान जब नींव रखने के बाद दिवार ऊपर उठने से पहले ही गिर जाया करती थी और ऐसा कई बार होता था जिससे राजा बहुत परेशान था लेकिन जब एक रात राजा के सपने में देवता ने आकर कहा कि अगर उस स्थान पर किसी मानव की बलि दी जाय तो तो उस मन्दिर की नींव फिर कभी नहीं गिरेगी यह बात सुनकर राजा ने एक साजिश के दौरान धोखे से किसी मानव को नीव तले रखकर मन्दिर का काम पूरा किया गया था।
चित्तई गोलू मन्दिर घोडाखाल
घोड़ाखाल व चितई के गवैलु या गोलु देवता के मंदिरों मे प्रतिदिन दो चार बकरों की बलि भी चड़ाई जाती थी पिछले कुछ दशकों अनेक साधू संतों ,समाज सुधारक लोगों के प्रयासों से बलिप्रथा पर काफी अंकुश तो लगा परन्तु परम्पराओं,केअनुयायी एवं अन्धविश्वासी लोगों में कहीं कहीं शायद यह परम्परा अब भी जीवंत हो सकती है
देवी शक्तियां और बलिपूजा
बलिप्रथा की शुरुआत सर्वप्रथम तब हो गयी होगी जब मातृदेवी ने महिषासुर नामक राक्षस का वध किया था,या जब चण्डी काली ने राक्षसों का अंत करने के लिए चण्डी का रौद्र रूप धारण किया और जब उसका वह रौद्र रूप जिसे रोकना किसी के वश में नहीं था। तब शिवजी ने खुद जमीन पर लेटकर मातृदेवी माता चंडी को रुकने पर विवश किया था। तब उस समय माता चण्डी अपने हाथ में खप्पर लेकर राक्षसों को काटकर उनके रक्त को खप्पर में भर भर के पी रही थी तभी से मानव मात्र के दिमाग में ऐसी भावना जागी और उनकी यह धारणा बन गयी किसी भी देवी शक्ति को प्रसन्न करने के लिए उसे रक्त का खप्पर भरकर देना ही पड़ेगा ।
मानव बलि प्रथा
मानव बलि देकर देवी को खुश करना, यह बात मानव मात्र के जेहन में इस तरह आई होगी कि चण्डी माता ने राक्षसों के रक्त से अपनी प्यास बुझाई थी तो शायद मानव द्वारा राक्षस के रूप में किसी मानव की बलि देकर शायद देवी शक्तियाँ प्रसन्न हो जाये और हमारे दुःख कष्टों को हर ले, पिछले समयों में यहां पशुबलि दी जाती थी। उत्तराखंड के दोनों ही मंडलों में देव पूजा एवं अन्य ऐतिहासिक घटनाओं के सन्दर्भों में इसका वर्णन भी पाया जाता है।कई निर्माण कार्यों में असफल होने पर यहाँ पर मानव बलि भी दी जाती थी , जिसके कई उदहारण भी हैं जैसे मलेथा की गूल के लिए राजा महीपति शाह के प्रसिद्ध सेनापति माधो सिंह भण्डारी के द्वारा अपने पुत्र की बलि चढ़ाये जाने की ऐतिहासिक घटना तो केवल तीन शतक पुरानी है । चन्द्रवदनी टिहरी के विषय में कहा जाता है कि पहले यहां भी मानव बलि होती थी। इसके बारे में कहा जाता है कि यहां पर एक ऐसा यंत्र था जिसे देखकर व्यक्ति स्वयं अपनी बलि दे डालता था। इसके अलावा पुरानी कथाओं एवं जनश्रुतियों से पता चलता है कि काली,चण्डी आदि के नाम से पूजे जाने वाले देवालयों तथा पुल,सरोवर, एवं जल प्रणाली आदि के निर्माण के अवसर पर इन देवियों को स्थापित करने के लिए मानव बलि भी चढ़ाई जाती थी। और समय के साथ मानव ने मनुष्य जीवन की हत्या करना पाप समझ लिया और मानव की जगह बेजुबान पशुओं को बलि के रूप में इस्तेमाल करने लग गये होंगे,और तभी से पशुबलि की प्रथा की शुरुआत हुई होगी ।
पशु बलि प्रथा
जब मात्रिका देवी ने महिषासुर का वध करके उसके रक्त से अपना तिलक लिया था तभी से मानव मात्र के जेहन में यह बात आ गयी होगी कि महिष का मतलब भैंस होता है तो क्यों न हम भी भैंस की बलि देकर माता को प्रसन्न करें शायद यही सोचकर मानव ने पशु बलि प्रथा की शुरू आत की होगी।
