उत्तराखंड लोकदेवताओं एवम भूत प्रेत की पूजा पद्धति

           उत्तराखंड लोकदेवताओं एवम भूत प्रेत की  पूजा पद्धति



उत्तराखंड लोकदेवताओं एवम भूत प्रेत की  पूजा पद्धति


उत्तराखंड में  देवी-देवताओं के रूप में मान्य इन लौकिक देव शक्तियों के अपने कई रूप एवं श्रेणियां हैं, जिन्हें अधिष्ठातृ देवता, इष्टदेवता, कुल देवता, ग्रामदेवता, कृषि देवता, पशु देवता आदि अनेक रूपों में पूजा जाता है लोगों द्वारा पूजी जाने वाली  इन दिव्य शक्तियों में कुछ वायवीय शक्तियां होती हैं, किन्तु ज्यादातर ऐसी शक्तियां होती हैं जिनका सम्बन्ध इसी सृष्टि के मानव वर्ग से होता है। इसके अलावा एक ओर तो वे महामानवीय आत्माएँ होती हैं जिन्होंने कि मानव जगत के कल्याण एवम उत्थान के लिए अपना जीवन अर्पित किया होता है , जिन्हें लोगों द्वारा  बड़ी  श्रद्धा से याद किया जाता है, किन्तु दूसरी ओर कुछ ऐसी दुष्ट आत्माएं भी होती हैं जो कि अपने जीवनकाल में अपने आतंक के कारण पूजी जाती रही हैं तथा मरने के बाद उनकी प्रेतात्माएँ अपनी भेंट पूजा चाहती हैं और भय के कारण देवता के नाम से पूजी जाती हैं। भूत प्रेत क्यों और कैसे किसी व्यक्ति पर आक्रमण करते हैं इसके बारे में जानने के लिए हमारे पिछले ब्लोग "उत्तराखण्ड में भूतप्रेत की मान्यताएं  पढिये । 

 

लोक देवताओं की प्रकृति एवं आचरण 

उत्तराखंड में पूजे जाने वाले इन लोक देवताओं की प्रकृति एवं आचरण सामान्य रुप से मानवीय प्रकृति एवं आचरण के समान ही होता है। समय-समय पर उनकी अपेक्षित भेंट पूजा न किये जाने अथवा उपेक्षित किये जाने पर वे मानवों के समान ही रुष्ट हो जाते हैं और सम्बद्ध लोगों को अनेक रूपों में परेशान करने लगते हैं। कभी-कभी तो ये अपने पारिवार जनों तथा सगे सम्बन्धी जनों तक सीमित न रहकर भेंट-पूजा प्राप्त करने की इच्छा  से उनकी विवाहिता बेटियों  पर तक अपना  प्रकोप डालते हैं ओर उनसे भी अपनी भेंट-पूजा लेकर ही छोड़ते हैं।


मृत आत्माओं रूपी देवता 

उत्तराखंड में  स्थानीय रूप में पूजे जाने वाले देवी देवताओं से सम्बद्ध उनकी जागर गाथाओं में  इनकी जीवन गाथाओं से ज्ञात होता है कि इनमें से अनेक मृतात्माएं कभी न कभी, किसी न किसी रूप में या तो क्षेत्र विशेष की मानव विभूतियों के रूप में विद्यमान रहीं और उनके जनकल्याण सम्बन्धी सद्गुणों के कारण उन्हें देवताओं का सम्मान प्रदान कर दिया गया। परन्तु  यहां के लोकजीवन में ऐसा भी देखा गया है कि लोगों के द्वारा पूजे जाने वाले  देवी-देवताओं में से अनेक ऐसे भी हैं जो कि अपने जीवन काल में उनके अत्याचारों से त्रस्त जनता के द्वारा पूजे जाते रहे और मरने के बाद  भी इसी भय से पूजे जाते रहे कि कहीं मृतात्मा पहले की तरह ही उन्हें  परेशान न करने लगे, और समय के साथ में यही एक परम्परा का रूप बनता चलता चला  गया। हमारे अनेको लौकिक देवी-देवता एवम अनेक पौराणिक देवी-देवता मानव मन की इसी मानसिकता की प्रवृत्ति की  देन  है। जैसे कि कुमाऊं में उसके एक परम अत्याचारी कत्यूरी शासक, बरमदेव, का देवता के रूप में पूजा जाना। इसके अतिरिक्त लोकदेवता के नाम पर कभी-कभी उन पराशक्तियों का भी समावेश होता है जिनका अस्तित्व मात्र वायवीय होता है। 

देवताओं का दोष या प्रकोप का लगना

उत्तराखंड  की पहाड़ी भाषाओं में देवता के कोप को देवता लगना या दोष कहा जाता है। इसकी पहिचान दुःख कष्ट बीमारी या जन-धन की हानि आदि किसी भी रूप में हो सकती है। मानवों में सामान्य रूप से  किसी बीमारी के रूप में होना, बेहोशी, पागलपन, दौरे पड़ना, शरीर का अकड़ जाना, आंखों की पुतलियों का फिर जाना, मरे हुए शिशु का जन्म, , बच्चों का सूख जाना, असभ्य बातें करना, आदि । इसी प्रकार यह प्रकोप पशुओं के माध्यम से भी प्रकट हो जाता है, जैसे कि गाय के थनों से दूध के स्थान पर रक्त का निकलना, दूध बन्द हो जाना, घास-पानी न खाना अथवा किसी ऐसे रोग से ग्रस्त हो जाना जो कि पशु  डॉक्टर या किसी जानकर के इलाज से बाहर हो तथा जिस पर दवाई का कोई प्रभाव न होता हो अथवा जो दवाइयां देने से और अधिक घातक बन जाता है। ये लक्षण मानव और पशु दोनों पर समान रूप से लागू  हुआ करते हैं। इस प्रकार के देवता के प्रकोप या दोष  से मुक्ति पाने के लिए पहाड़ी समाज द्वारा अपनाया जाने वाला विधि-विधान  सबसे अलग ही होता है।  


रुष्ट देवता का दोष निवारण सम्बन्धी पूजा विधि-विधान 

आमतौर में  सामान्य रूप से देव-प्रकोप की आशंका होने पर सर्वप्रथम उच्चैंणा (याने उस देवता के नाम का एक सिक्का लेकर किया जाता है। जिसका अर्थ होता है एक हरे पत्ते पर कुछ चावल, सवा रुपया या एक सिक्का रख कर उसकी पुड़िया बांध कर पीड़ित व्यक्ति या पशु के सिर के ऊपर इस वचन के साथ तीन बार घुमाया जाता है  कि इस विषय में पुछेरा ,या बकिया से पूछताछ करने पर जिस किसी भी देवता का प्रकोप निकलेगा उस देवता की पूजा अर्चना बलि सहित पूजा के द्वारा सन्तुष्ट कराया जायेगा। अन्यथा किसी डंगरिये को बुलाकर उस के द्वारा  देव अराधना पूर्वक  प्रभावित व्यक्ति को बभूति बंधवा कर एक नियत अवधि के अन्तर्गत पूछताछ करवाने का  वचन दिया जाता है। यदि उस निर्धारित समय में रोगी को आराम हो जाता है या वह पूर्णतया स्वस्थ हो जाता है तो पुछेरा  के पास उस उच्याणा को या बिभूत लगाने की स्थिति में नई दानियों चावल के दानों  को रोगी के ऊपर तीन बार घुमा-फिरा कर ले जाया जाता है। पुछेरा उन चावल के दानों का अपनी दैवीशक्ति से परीक्षण करके पीड़ित व्यक्ति की पीड़ा के स्वरूप, उसके कारणों तथा उसके उपचार पूजा, बलि आदि के विषय में बतलाता है तथा उसके निमित्त जागर लगाने का समय भी निर्धारित करता है। उसके उपरांत जागरी बुलाकर  जागर का आयोजन किया जाता है तथा विधि विधान के अनुसार देवता या व भूत-प्रेत विशेष की पूजा अर्चना एवं बलि भेंट करके पूजा सम्पन्न की जाती है।


भूत प्रेत या किसी ऊपरी हवा या छाया का उपाय

उत्तराखंड में अगर किसी बच्चे या बड़े पर किसी कारण किसी भूत प्रेत का साया पद गया या किसी व्यक्ति के ऊपर किसी ऊपरी हवा का असर पड़ गया तो पहले तो यह कष्ट अपने पूजा स्थान से पूजा के स्थान से धुप  लेकर उस व्यक्ति के माथे पर लगाने से उस आराम मिल जाता है  यह दुख बीमारी छल, जलछाया,ऊपरी  हवा भूत, प्रेत, मशाण द्वारा आक्रमण के परिणाम स्वरूप हुई हो तो उसके लिए झाड़ा-ताड़ा या रखवाली रक्षावली या झाड़ फूंक करना आवश्यक होता है। इसमें 'रखवाली' वाला व्यक्ति डंगरिया या पस्वा उस भूत-प्रेत को सम्बोधित करके स्थानीय भाषा में सम्बन्धित कुछ मंत्रों को जोर-जोर से बोलकर पीड़ित  व्यक्ति के माथे पर बभूति लगाकर छल-छिद्र को भगाने का मन्त्र उच्चारण  करता है। कभी कभी खास प्रकार की  घास-फूंस जला कर या जलती हुई लकड़ी लेकर भी उसे भगाने का मन्त्र उच्चारण किया जाता है। यदि पीड़ित व्यक्ति पर इसका कुछ अनुकूल प्रभाव पड़ता है तो उस प्रक्रिया को दो-तीन बार  किया जाता है। यदि तब भी पीड़ित व्यक्ति को आराम नहीं मिलता तो  तब पुछेरा या बकिया के पास जाकर छल छिद्र की पहचान करने के बाद उसका पूजा विधान पता करके उसकी पूजा का  विधि विधान से सम्बन्धित छल छिद्र की पूजा अर्चना की जाती है। 

                                                           धन्यवाद 
                                               A.K.Gudiyal.Uttarakhandi






Uttarakhand Gyan

i am a blog writer uttarakhand folk lifestyle, folk culture, tradition, dress, ornaments, folk modesty, customs, folk songs, folk dances, rituals, lifestyle, farming, animal husbandry, mutual brotherhood, sense of cooperation and dedication towards each other,

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