उत्तराखंड देवी देवताओं की पूजा के विशिष्ट विधि-विधान

 उत्तराखंड देवताओं की पूजा के विशिष्ट विधि-विधान



उत्तराखंड देवी देवताओं की पूजा के विशिष्ट विधि-विधान


पुरातन काल से वैदिक देवी देवताओं के समान उत्तराखंड लोक देवताओं की न तो किसी शिल्पी मूर्तिकार द्वारा तराशी गयी कोई धातु या पाषाण की मूर्ति या प्रतिमा ही होती हैं और न उनका कोई विशेष रूप। सामान्य तौर पर ये रूप विभिन्न प्राकृतिक तत्व, जैसे नदी, वृक्ष,वनस्पति, पर्वत शिखर,गुफ़ा, जलस्रोत या कोई पत्थर शिला आदि ही इनके प्रतीक हुआ करते हैं। किन्तु लोक देवमण्डल में कुछ लोकदेवता ऐसे भी है जिनकी आराधना सुन्दर सुघड़ शिलाओं, धूनियों धनुष-बाण, गज्जा , ध्वजदण्ड, चाबी, खङग, नाग आदि के प्रतीकों के रूपों में भी की जाती है।इन सभी देवताओं की पूजा विधि,इनके भोग वंचन ,प्रतीक स्वरूप की पूजा ,एवं पूजा अराधना के विभिन्न तौर तरीकों की ,स्थितियां  भिन्न हैं जो  इस प्रकार से होती या पायी जाती हैं।

शिला स्वरूप प्रतीकों  के रूप में देव शक्तियां 

शिलात्मक प्रतीकों के रूप में देवशक्तियों का प्रतिनिधित्व करने वाले देवस्थल गढ़वाल की अपेक्षा कुमाऊँ में अधिक है। इनमें से कुछ इस प्रकार से  हैं। जिनमे फटकशिला गहतोड़ा, असुरदेवता, मोस्टमाणू पिथौरागढ़, हिंगला, कूर्मशिला, पुण्यागिरी चम्पावत, कोटभ्रामरी गरुड़-बागेश्वर, कल्पेश्वर, जाखनदेवी अल्मोड़ा घंटाकर्ण, लटेश्वर पिथौरागढ़, लाखेश्वर लाखामण्डल, कालशिला चमोली, सेममुखीम क्षेत्र के बरगलासेम डूगडूगीसेम में भी शिला पूजन होता है इस शिला पर भगवान कृष्ण के चरण चिन्ह अंकित हैं।

शिला खण्डों के रूप में देव शक्तियां 

शिलाखण्डों के रूप में देवशक्तियों के पूजन की परम्परा न केवल लोकदेवताओं, अपितु पौराणिक देवी-देवताओं,विशेषतः शिव एवम शक्ति आराध्य देव शक्तियों में भी प्रचलित रही है, जैसे गढ़वाल मंडल के प्रसिद्ध पौराणिक देवस्थलों जैसे आदि बदरी, केदार नाथ, मद्महेश्वर, बूढ़ाकेदार, दण्डेश्वर अल्मोड़ा-जागेश्वर आदि शिव से सम्बद्ध अनेक देवस्थल हैं जहां पर केवल लिंग एवं शिला स्वरूप प्रतीकों के माध्यम से ही उनका पूजन होता है।इसी प्रकार कई अन्य देवी-देवता भी हैं जिनकी पूजा आराधना शिला ,यंत्र कुण्ड आदि रूपों में की जाती है,

लोकदेवताओं के पूजा स्वरूप प्रतीक

शिला स्वरूप प्रतीक

 इन्द्रगवन श्रीनगर, वाराही देवी देवीधूरा, कसार देवी अल्मोड़ा गौरजा देवी देवलगढ़, ज्वाला देवी पौड़ी, मठियाणा देवी टिहरी, उल्कादेवी पौड़ी विंध्यवासिनी चमोली आदि देवी शक्तियों की पूजा शिला के रूप में होती है ।

 यंत्र स्वरूप प्रतीक   

यंत्र स्वरूप प्रतीक के रूप में  चन्द्रवदनी देवी  एवं गौरजा देवी सुमाड़ी की पूजा यंत्र प्रतीक रूपी पूजा होती है 

कुंड स्वरूप प्रतीक

महाकाली कालीमठ, कंस मर्दिनी पौड़ी, हिंगला चम्पावत, घटकू चम्पावत आदि देवी श्क्तोयों को कुंड रूप के प्रतीक की पूजा होती है।

धूनी स्वरूप प्रतीक

कुछ  देवताओं की पूजा  आराधना धूनी  स्वरूप प्रतीक के रूप में भी किया जाता है। चम्पावत में गुरु गोरखनाथ की पूजा  आराधना  उनके धूनी  स्वरूप प्रतीक गोरखधूनी, के रूप में तथा गढ़वाल के चमोली जिले में भगवान् त्रिजुगी नारायण की पूजा  आराधना भी उनके धूनी  स्वरूप प्रतीक के रूप में ही की जाती है।

अस्त्र शस्त्र स्वरूप प्रतीक

कुमाऊँ के ऐड़ी देवता का प्रतीक धनुष-बाण है तो टिहरी के जाख देवता की प्रतीक लोहे की कटार एवं क्षेत्रपाल का लोहे का चिपटा, नागदेवता का दो मुहं वाला लोहे का दीपक ,लोहे के धनुष-बाण, गज-त्रिशूल आदि भेटों को स्वीकारने वाले प्रमुख देवता हैं ऐड़ी, एवं जोहार के ल्वारद्यौ को भी लोहे के अस्त्र-शस्त्रों, तलवार, खुकरी, छुरी, त्रिशूल आदि की भेंट चढ़ाई जाती है।

चाबी एवं ध्वज स्तम्भ स्वरूप प्रतीक

चमोली जिले  के बान गांव के ऊपर अजन धार में पूजित द्यौसिंघा देवता का प्रतीक एक लोहे की चाबी है और जोहार के लह्मसेल  देवता का प्रतीक एक ध्वज स्तम्भ माना जाता है और इसी प्रतीक के रूप में इनकी पूजा अराधना होती है ।

विशिष्ट आराधनात्मक विधि-विधान 

उत्तराखण्ड के विभिन्न  क्षेत्रों के लोकदेवताओं  में अनेकों देवताओं  के आराधना  एवं पूजा करने का , विधि-विधान, भेंट में समर्पित की जाने वाली वस्तुएं, उनके पूजा करने के तौर तरीके कुछ अलग अलग एवं विशिष्ट हैं जो निम्न प्रकार से हैं।

 मन्दिर की तरफ पीठ करके पीठ  पूजा 

 गढ़वाल मंडल के उत्तरकाशी जनपद के रवाई क्षेत्र में एक देवता पूषू या पोखू हैं जिसकी आराधना मंदिर की ओर पीठ करके की जाती है वहां न तो दीप प्रज्वलित किया जाता है और न ही पुष्प अर्पण किया जाता है। 'देवता के दर्शन पीठ की तरफ से चलकर होते हैं और उल्टा ही वापस आना होता है ।

दक्षिण पश्चिम मुखीय पूजा    

इसी प्रकार पिथौरागढ़ जनपद के मुख्यालय के निकट में स्थित असुरचूल पहाड़ी के शिखर पर पूजित असुरदेवता के विषय में भी मान्यता है कि उसकी पूजा-आराधना दक्षिण पश्चिम मुख होकर की जाती है।

वृक्ष के ऊपर चढ़कर पूजा  

कुमाऊं मंडल के नैनीताल जिले  के तराई क्षेत्र में सूर्यादेवी के नाम से एक लोकदेवता की आराधना की जाती है, किन्तु यह पूजा-आराधना किसी मन्दिर देवालय या देव स्थान में नहीं, बल्कि  वृक्ष के ऊपर चढ़कर की जाती है ।

देवता का अपने पश्वा या डांगर द्वारा मांस आहार एवं रक्तपान

गढ़वाल में कुछ लोकदेवता ऐसे हैं जो कि अपने पश्वा या डांगर  के माध्यम से अपनी बलिपूजा के पशु के मांस को कच्चा ही खा जाते हैं या बलि के समय उसके गले  पर मुंह लगाकर उसका सारा रक्त पी जाते हैं। इनमे  जोशीमठ  का तिमुण्डिया देवता तथा गर्म रक्तपान करने वालों में, भराड़ी देवी एवं दक्षिणकाली आदि  देवी शक्तियाँ हैं ।

विशिष्ट देवस्थलीय परम्पराएँ

उत्तराखण्ड के अनेक लोकदेवता हैं जिनमें अनेक प्रकार की विशिष्ट देवस्थलीय परम्पराओं का अनुपालन किया जाता है।  लोगों के प्रवेश का अथवा किसी वस्तु को ले जाने या न ले जाने, देवालय की पूजा व्यवस्था में पिथोरागढ़ में वैष्णवी  देवियों के नाम से पूजे जाने वाले कुछ मन्दिरों में कुंवारी कन्याओं को  देवालय की लिपाई पुताई का काम एवं देवी को स्नान कराके उनका श्रृंगार करने के अधिकार की परम्परा  होती है 

देवताओं का भोग,प्रसाद एवं  भोज व्यंजन 

उत्तराखंड के लोक देवकुल में अनेक देवी-देवता ऐसे हैं  और उन सभी देवी देवताओं को भोजन, व्यंजन ,प्रसाद भी अलग अलग तरह से चढ़ता है जो कि सामान्य रूप से किसी अन्य देवी-देवता को नहीं चढ़ाया जाता है।

 रोट भेंट 

जोहार के लोग  जब अपने प्रवास से लौटते हुए रिलाकेट में गोरी नदी के तट पर पहुंचते हैं तो परिवार में सबसे  बूढी  महिला एक रोट पकाकर उसे परिवार के सभी सदस्यों के हाथों से छुआ कर गोरी नदी को भेंट करती है।

खीर का भोग

कुमाऊँ मंडल के चम्पावत जिले  के ग्राम गोलनासेरी के बालेश्वर शिव मंदिर में नित्य केवल खीर का ही भोग लगता है और किसी चीज का नहीं।

गुड़ की भेंट 

कुमाऊं हल्द्वानी में काला सैय्यद एवं गढ़वाल पौड़ी  में डांडा नागराज को गुड़ की भेली का प्रसाद ही भेंट किया जाता है।

मड़वे की रोटी 

 गढ़वाल मंडल के पौड़ी जनपद की लंगूर पट्टी का लंगूरी भैरव , कालनाथ भैरव केवल मड़वे की रोटी का प्रसाद ग्रहण करता है।

सत्तू के पिंड 

कुमाऊं मंडल के जोहार परगने का साद्यो देवता को सत्तू के गोले ही प्रसाद के रूप में अर्पित किये जाते हैं तथा भ्रामरी देवी को गुड़ पापड़ी पूजा में भेंट की जाती है ।

नमकीन खीर

इसी प्रकार पिथौरागढ़ नगर के निकट सिलथाम बस अड्डे के सामने असुरचूल नामक पहाड़ी की चोटी पर पूजित असुर देवता की पूजा में उसके प्रसाद के रूप में अर्पित की जाने वाली खीर में मीठे के बजाए नमक डाला जाता है तथा उसे दक्षिण पश्चिम  की दिशा में  मुँह करके पूजा जाता है।

खिचड़ी,बाडी,फाणु 

जखौल के समेश या सोमेसू को खिचड़ी का भोग लगाया जाता है। और कुछ देवताओं को बारीक़ दानेदार चावलों का भात ,बाड़ी खिचड़ी,फाणु आदि की पूजा भी दी जाती है।

घास-पाती की भेंट 

 गढ़वाल श्रीनगर में उसके चतुर्दिक स्थापित भैरव (शिव) के अन्यतम देवालय, 'घसिया महादेव' में उन्हें घास-पात की ही भेंट चढ़ाई जाती है। वस्तुतः यहां घास-पात की भेंट चढ़ाये जाने के कारण ही इन्हें 'घसिया महादेव' कहा जाता है।

गाय अर्पण 

उत्तरकाशी जनपद के रवांई जौनपुर के देवगण तीर्थ एवं देवती मंदिर के पबासी महासू देवता को भेंट में गाय अर्पित की जाती हैं। जिन्हें देव वन के घने जंगलों में छोड़ दिया जाता है। कई वर्षों में अपनी यात्रा के बाद जब देवता अपने तीर्थस्थल देव वन में जाते हैं तो इन्हीं गायों के दूध से उन्हें स्नान कराया जाता है। यहां के लागों की मान्यता है कि ये गायें देवता के प्रभाव से घने जंगलों में भी जंगली पशुओं से सुरक्षित रहती हैं।

राख के लड्डू व एक तरफा सिकी इकतली रोटी  

गढ़वाल में अनेक श्मशान स्थानीय देवता ऐसे हैं जिन्हें भेंट में छिपकली,मछली , मेंढ़क,केकड़ा  टेड्पोल गिरगिट, राख के लड्डू, एक ओर सिकी रोटी जैसे वस्तुएं भेंट की जाती हैं। टिहरी क्षेत्र में खराण्या वर्गीय देवताओं को भोग में राख के लड्डू चढ़ाये जाते हैं।

लकड़ी की भेंट व राख का प्रसाद 

चमोली जनपद में स्थित त्रिजुगीनारायण तथा चम्पावत में स्थित गोरखधूनी ऐसे देवस्थल हैं जहां पर लकड़ की भेंट चढ़ाई जाती है तथा राख का प्रसाद लिया जाता है।

मादक पदार्थों की भेंट 

लोकदेवताओं में कुछ देवी-देवता ऐसे भी हैं जो मदिरा, बीड़ी, सिगरेट आदि मादक पदार्थों की भेंट भी लिया करते हैं। इनमें से मांस-मदिरा लेने वालों में प्रमुख हैं- असुरदेवता पिथौरागढ़, भैरव, काली दक्षिणकाली, तथा बीड़ी सिगरेट का प्रसाद ग्रहण करने वालों में  है कालू सैय्यद हल्द्वानी, नैनीताल, कंडोलिया पौड़ी, गढ़वाल  इन सभ देवताओं को मादक पदार्थों की भेंट चदायी जाती है ।

मांस आधारित  भेंट 


 कुछ समय पहले जोहार के सांई देवता को 'सिल्दू' का प्रसाद ही चढ़ाया जाता है जो कि बलि चढ़ाये गये बकरे के कलेजे एवं उसकी आंतों को साफ करके उनमें फाफर के आटे को भर कर तैयार किया जाता था । इसी प्रकार गढ़वाल के जनजातीय क्षेत्रों के देवता सिरगुल के सम्बन्ध में भी देखा जाता है कि उसे बलिपशु के कलेजे तथा साफ की गयी अंतड़ियों को भून कर तैयार किये गये पदार्थ का प्रसाद चढ़ाया जाता है। 

                                                                                       धन्यवाद 
                                                                        A.K.Gudiyal.Uttarakhandi 


 


 









है।


 







Uttarakhand Gyan

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