उत्तराखंड लोकजीवन की वेषभूषा एवम पहनावा
![]() |
| उत्तराखंड लोकजीवन की वेषभूषा एवम पहनावा |
जैसे कि आप जानते है कि हम ब्लॉग के माध्यम से अपने लेखों में उत्तराखंड लोकजीवन के हर पहलुओं की जानकारी दे रहे हैं, आज के ब्लॉग में उत्तराखंड लोकजीवन के इतिहास में यहां के निवासी अपने शरीर को ढकने के लिए किस तरह के वस्त्रों का उपयोग करते थे,एवं महिला एवम पुरुषों की कैसी वेषभूषा थी । उनके अभावग्रस्त जीवन मे वे लोग किस प्रकार अपने शरीर को ठण्ड एवम गर्मी से बचाते थे जबकि उस समय के लोगों के पास रोटी कपड़ा और आवास की बहुत परेशानियाँ थी।
![]() |
| उत्तराखंड लोकजीवन की वेषभूषा एवम पहनावा |
आपको हम बता दे कि किसी भी देश या राज्य के निवासियों की वेशभूषा उस क्षेत्र के वातावरण जलवायु,एंव उनकी जीवन पद्धति पर निर्भर करता है । इसी संदर्भ में उत्तराखंड के निवासियों की भी एक विशेष एवम परम्परागत वेशभूषा रही होगी,यहां के क्षेत्रीय पर्यावरण से नियंत्रित होती रही होगी ,उत्तराखंड जैसे भौगोलिक भिन्नताओं वाले क्षेत्र में उत्तराखंड लोकजीवन शैली का काफी ज्ञान ब्रिटिश काल मे आये हुए विदेशी पर्यटकों की टिप्पणियों से भी मिलता है।
![]() |
| उत्तराखंड लोकजीवन की वेषभूषा एवम पहनावा |
उत्तराखण्ड लोकजीवन में यहां के निवासी पुरुष आम तौर पर सूती नोकदार टोपी ऊनी गोल टोपी, मिरजई, एवम फतुई पहनते थे, एवम महिलाएं धोती,और छीट की अंगिया और सर्दियों में ऊनी कम्बल,औऱ भाँग से रेशों से तैयार गाती पहनती थी,और सर्दियों में पुरुष मिरजई और जाड़े के दिनों में ऊनी या सूती पायजामा पहना करते थे महिलाएं ऊन का लावा जिसके दोनों सिरों को चांदी की पिन या तार से अटकाया करते थे, कमर पर ऊन के पट्टू का कमरबंध,बांधे रहती थी।सिर पर झुलका एवम टांगों पर ऊनी पायजामा सिर पर लाल,नीली टोपी,और लावे के नीचे छींट का घाघरा,और ऊपर भाग में ऊनी सूती या मखमली अंगिया पहनी जाती थी। उत्तराखंड के कई जनजातीय क्षेत्रों में जहां पर ठंड ज्यादा होती थी तो यहां के लोग मूल रूप से काला घाघरा,कुर्ता,मोटा कसा हुआ ऊनी वस्त्र पहनते थे।
![]() |
| उत्तराखंड लोकजीवन की वेषभूषा एवम पहनावा |
नारी परिधान में घाघरा,पिछौड़ा या पिछौडी,आँगड़ी या अंगिया एक प्रकार से जैकेट की तरह पूरी बाजू वाला कमर तक लम्बा होता था। जिसमे अंदर एक अस्तर लगा होता था। आगे की तरफ दोनों पल्लों को बंद करने के लिए बटन लगे होते थे । आगे की तरफ दोनों तरफ दो जेब होती है आँगड़ी या अंगिया मोटे कपड़े ,मखमल,ऊन या सनील से बनते थे । बाकी बच्चों के परिधानों में जहां तक हमें ज्ञान है ,बच्चों के परिधान कुर्ता/ कमीज़,सलदरास, या सन्तरास, झगुली,या फ्रॉक कनटोपी ,गनौती या बट्टी जिसको बच्चों के गले मे एक कपड़े के अंदर अजवाइन, मेथी और हल्दी बाँधा जाता था। जिससे छोटे बच्चों को अधिक ठण्ड से बचाव हो सके। इस तरह से उत्तराखंड लोकजीवन में बच्चों से लेकर बडे बुजर्गों एवम महिलाओं की वेशभूषा और पहनावे होते थे ।
![]() |
| उत्तराखंड लोकजीवन की वेषभूषा एवम पहनावा |
सैनिक सेवाओं में नौकरियाँ मिल जाने के बाद यहां पुरुषों के पहनाव में काफी अंतर आता गया लोग पैंट कोट बूट आदि पहनने लगे लेकिन महिलाओं के पहनावे में काफी समय तक बदलाव नहीं आया काफी समय बाद में कुछ परिवर्तन आने के बाद यहां की महिलाएं गाती वाली धोती और ब्लाउज पहनने लगे और पुरुष लोग कुर्ता पायजामा फतुई,पैंट कमीज़ आदि पहनने लगे। गाँव की उम्र दराज महिलाएं धोती ,अंगड़ा,ब्लाउज के साथ कमर में पगड़ा या साफा बांधते थे।
तो ये था हमारा आज का ब्लॉग जिसमे हमने उत्तराखंड लोकजीवन की वेषभूषा एवम पहनावा के बारे में विस्तार से वर्णन किया, आशा है कि आपको ये ब्लॉग अवश्य ही पसंद आया होगा । उत्तराखंड लोकजीवन से संबंधित हमारे सभी ब्लॉगों को पढते रहिये और हमें फॉलो भी अवश्य करें।
धन्यवाद
A.K Gudiyal Uttarakhandi



.jpeg)
