![]() |
| उत्तराखंड लोकजीवन के आभूषण |
हमारे पिछले ब्लॉग में आपने उत्तराखंड लोकजीवन का पहनावा एवम महिला पुरुष की वेशभूषा के बारे में पढ़ा, जहां पहनावे और वेशभूषा की बात आती है, तो साज श्रृंगार के बगैर तो पहनावा भी अधूरा सा लगता है। इसलिए आज के ब्लॉग में हम उत्तराखंड लोकजीवन के पारंपरिकआभूषणों की जानकारी देने वाले हैं। और जहां तक आभूषण और श्रृंगार की बात आती है तो इसका सीधा सम्बन्ध नारी वर्ग से होता है। जहां तक नारी के सौंदर्य की बात है तो उसे प्रकृति ने कई प्राकृतिक सौन्दर्यो से नवाजा है। फिर भी नारी और प्रकृति सजी सँवरी ही अच्छी लगती है।उत्तराखंड की नारियां भी अन्य क्षेत्र की महिलाओं की तरह साज श्रृंगार के लालायित रहती थी। परंतु पर्याप्त पैसे न होने के कारण इनकी यह इच्छा भी दिन भर घर परिवार के कामों में व्यस्त रहते हुए दब जाती थी ।
आधुनिकता से पहले उत्ताखण्डी आभूषण
![]() |
| उत्तराखंड लोकजीवन के आभूषण |
![]() |
| उत्तराखंड लोकजीवन के आभूषण |
![]() |
| उत्तराखंड लोकजीवन के आभूषण |
उत्तराखंड लोकजीवन में जब साज श्रृंगार के साधनों एवम धातुओं से बने आभूषणों की शुरुआत नहीं हुई थी उस समय भी वे लोग अनेक प्रकार की फूल पत्तियों, सीपियों, मूंगे ,मोतियों एवम हड्डियों आदि से अपना साज श्रृंगार करते थे । उत्ताखण्डी महिलाएं केवल उस समय आभूषण पहनती थी, जब कि कोई परम्परागत,लोकगीतों,एवम सांस्कृतिक गीतों का आयोजन किया जा रहा हो। इन्हीं लोकगीतों में इन आभूषणों का परिचय जानने को मिलता है। जिसमे ,माथे की विन्दी,कानों के झुमके,बालियां,तुंगेला, नाक की नथुली,,बुलाक,गले का सुता या हंसुला,हाथों के धगुले,पैरों के झाँवर, उंगलियों की मूंदड़ी, गले मे चांदी के सिक्कों का हार,चांदी की लड़ीदार जंजीर,और मूंगे की माला इत्यादि उस समय समृद्धि एवम सम्पन्नता के आधार पर आभूषणों का इस्तेमाल किया जाता था।
मध्य काल में उत्ताखण्डी आभूषण
माथे का टीका, शीशफूल,वेणीफूल,कनफूल,हाथों के कंगन,पैरों की पाजेब,विछुवे,गले का मंगलसूत्र, गुलोबन्द, चूड़ियां आदि आभूषणों से पूर्व यहाँ पर कानों की झुपझुपी झुमके,पैरों की अमीरती,चैंनपट्टी,हाथों के ठोके, गले का हमेल, कानों की मुरखलियाँ,पैरों की झाँवर आदि कई प्रकार के आभूषणों का उल्लेख मिलता है। उत्तराखंड लोकजीवन में नारी एवम पुरुष दोनों वर्ग ही आभूषण पहनते थे, पर केवल हाथों एवम कानों में । बाकी आभूषणों का चलन काफी बाद में आया। यहां के पारंपरिक आभूषण के विषय मे लोकगाथाओं में जो आभूषण मिलते हैं उनमें नथुली,मुरखले,चांदी की सिक्के वाली माला कलाई की पहुँचियाँ, पैरों के विछुवे,हाथों की मूंदड़ी, आदि के उल्लेखों से भरे आज की कई लोक गाथाएं सुनने को मिलती हैं।
नाक में पहने जाने वाले आभूषण
![]() |
| उत्तराखंड लोकजीवन के आभूषण |
![]() |
| उत्तराखंड लोकजीवन के आभूषण |
मांगलिक अवसरों उत्सवों में पहने जाने वाले पारम्परिक आभूषणों में बुलाक को नाक के दोनों छेदों के मध्य में पहना जाने वाला सोने का आभुषण होता है,इसके अलावा सोने के तार पर बनी छोटी सी नथ जिस पर सजावट के लिए छोटे छोटे मोती लगे होते थे एवम इस मीना कारी भी होती थी। इसके अलावा नाक में पहनी जाने वाली फूली होती थी जो बायीं नाक में पहना जाने वाला अर्धचन्द्राकार सोने का आभूषण होता था।
कानों में पहने जाने वाले आभूषण
![]() |
| उत्तराखंड लोकजीवन के आभूषण |
![]() |
| उत्तराखंड लोकजीवन के आभूषण |
![]() |
| उत्तराखंड लोकजीवन के आभूषण |
कानों के आभूषणों में बालियां एवम मूंदे ,मुरखलियाँ आदि सोने के आभूषण होते थे जोकि केवल सम्पन्न लोग ही पहन सकते थे। इसमे बालियां सोने और चांदी दोनों प्रकार की होती थी। कानों के झुमके चांदी के बने त्रिभुज के आकार का आभूषण होता था। कान के ऊपरी हिस्से में दोनों कानों के छिद्रों में फंसाने के लिए एक हुक से बना होता था और उस हुक से बंधा हुआ एक धागा जोकि कान के ऊपर से झुमके को सहारा देता था जिससे वजन के कारण कान न फ़टे । इस त्रिभुज की आकृति की पट्टी से 5-6 पतली जंजीरें जिनके सिरों ओर छोटे छोटे घुंगरू से बंधे होते थे ।
गले में पहने जाने वाले आभूषण![]() |
| उत्तराखंड लोकजीवन के आभूषण |
![]() |
| उत्तराखंड लोकजीवन के आभूषण |
![]() |
| उत्तराखंड लोकजीवन के आभूषण |
गले में पहने जाने वाला पहला आभूषण हंसुला होता था, जोकि लगभग 200 ग्राम से लेकर एक एक किलो तक का होता था। इसके अलावा सुतिया जिसे दुबड़ा भी कहा जाता था। उसके बाद गुलोबन्द का चलन आया गुलोबन्ध गले मे पहने जाने वाला सोने का आभूषण है। गुलोबन्द और नथ का प्रचार आज भी काफी होता है एक आभूषण और था जोकि चांदी के सिक्कों चवन्नी अठन्नी की शक्ल में इन पर कुंडे लगे होते थे और इनको एक मोटे धागे में पिरोकर बनाया जाता था जिसे हमेल कहा जाता था। इसका प्रयोग सम्पन्न परिवार की महिलाएं ही कर पाती थी। और मूंगे की माला आम साधारण लोग पहना करते थे। जोकि अब अतीत की यादें बनकर रह गयी हैं।
कमर में पहने जाने वाला आभूषण
![]() |
| उत्तराखंड लोकजीवन के आभूषण |
![]() |
| उत्तराखंड लोकजीवन के आभूषण |
मणिमेखला के नाम से जाने जाने वाला और प्राचीन समय से चला आ रहा हैं। यह आभूषण काफी भारी भरकम इस आभूषण को तगड़ी भी कहा जाता था । और कमर में पहना जाता था । क्योंकि यह ज्यादा लम्बा ,भारी और उलझनों वाला आभूषण था और कामकाज करते समय महिलाओं को काफी असुविधा के कारण इसका इस्तेमाल कम होता चला गया।
हाथों में पहने जाने वाले आभूषण
![]() |
| उत्तराखंड लोकजीवन के आभूषण |
![]() |
| उत्तराखंड लोकजीवन के आभूषण |
![]() |
| उत्तराखंड लोकजीवन के आभूषण |
उत्तराखंड का परम्परागत आभूषण चांदी के बने मोटे मोटे धगुले होते थे । और पूरी कलाइयों को ढकने वाला यह आभूषण ठोका के नाम से जाना जाता था ,इसके साथ एक और आभूषण होता था जिसे पौंची कहा जाता था सोने और चांदी से बनाया जाने वाला यह आभूषण इसको भी कलाइयों में ही पहना जाता था। उंगलियों में पहने जाने वाले इन आभूषणों को अंगूठी, मुंदड़ी, मुद्रिका कहा जाता था यह आभूषण सोने चांदी ताम्बा पीतल गिलट आदि धातुओं की बनी होती थी।
पैरों में पहने जाने वाले आभूषण
![]() |
| उत्तराखंड लोकजीवन के आभूषण |
![]() |
| उत्तराखंड लोकजीवन के आभूषण |
उत्तराखंड लोकजीवन में इनकी जीवन पद्ध्ति के अनुकूल ही आधुनिक आभूषणों के प्रचलन से पूर्व यहां के लोग झाँवर पहनते थे जो कि हाथ के कड़ों की तरह चांदी या गिलट से बने अंदर से खोखले होते थे जिसमे चांदी की छोटी छोटी गोलियां या कंकड़ डाले हुए होते थे जो चलते समय छन छन की मधुर आवाज किया करते थे।,पाजेब पैरों में पहनी जाती थी जो कि चांदी की लड़ियों या जंजीरों से लगभग एक इंच चौड़ी पट्टी वाला आभूषण होता था जिसमे पट्टी के नीचे की ओर छोटे छोटे घुंघुरू लगे होते थे ये भी चलते समय मधुर आवाज करते थे ,इसके अलावा पाजेब का एक छोटा रूप होता था जिसे पायल कहा जाता था। जिसमे केवल एक लड़ी होती थी जिसमे शायद घुंघुरू नहीं होते थे। और दोनों पैरों की उंगलियों में पहने जाने वाले छोटे छोटे आभूषण बिछुआ नाम से जाने जाते थे।बाक़ी,ताबीज़,चरेऊ,माला,मंगलसूत्र तो अब भी काफी प्रचलन में हैं।
पुरुष वर्ग के आभूषण में बहुत समय हाथों में रत्न जड़ित अंगुण्ठिका,भुजबंध,केयूर कुंडल,मुक्ताहार,और यहां के पुरुषों के आभूषण केवल नगजडित अंगूठी होती थी जो कि सोने चांदी,ताम्बा,एवम गिलट आदि की बनी होती थी। पिछली पीढ़ी के पुरुषों के कानों में मुंदडे,मुर्खली पहनने का रिवाज था । ये आभूषण सोने चांदी के बने होते थे।इन आभूषणों को केवल सम्पन्न लोग ही पहनते थे।
बच्चों के पहने जाने वाले आभूषण
![]() |
| उत्तराखंड लोकजीवन के आभूषण |
![]() |
| उत्तराखंड लोकजीवन के आभूषण |
नवजात बालक के नामकरण संस्कार के दिन से ही शिशुओं को अलंकृत किया जाता था इन आभूषणों में हँसुली, धगुली,कमर ज्योडी या करधनी जोकि पतली चांदी की जंजीर और जंजीर में घुंघुरू लगे होते हैं खासकर लड़कियों के आभूषणों में पैरों की पायल,सीपियों,कौड़ियों की माला एवम शेर या बाघ दांत या नाखून से बनी ताबीज़ कन्या के गले मे बांधी जाती थी, किंतु अब केवल पायल का प्रचलन रह गया है बाकी आभूषण तो इतिहास के पन्नों में उलझ कर रह गए हैं।
तो ये था हमारा आज का ब्लॉग जिसमे हमने उत्तराखंड लोकजीवन की वेषभूषा एवम पहनावा के बारे में विस्तार से वर्णन किया, आशा है कि आपको ये ब्लॉग अवश्य ही पसंद आया होगा । उत्तराखंड लोकजीवन से संबंधित हमारे सभी ब्लॉगों को पढते रहिये, और हमें फॉलो भी अवश्य करें।
धन्यवाद
A.K Gudiyal Uttarakhandi





.jpeg)



.jpeg)
.jpeg)




.jpeg)
.jpeg)

.jpeg)
